भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 751
  • उत्तरभाग * ७४९

उमादेवीको नमस्कार करता हूँ। जो अप्रमेय हैं—जिनके सौन्दर्य आदि दिव्य गुणोंका माप नहीं है तथा जो परम कान्तिमती हैं एवं जो सदा भगवान् शङ्करके पार्श्वभागमें रहती हैं और समस्त भुवनोंको देखा करती हैं, उन पार्वतीदेवीको मैं नमस्कार करता हूँ। दीनजनोंकी रक्षा जिनके लिये मनोरञ्जनका कार्य है; जो मान और आनन्द देती हैं तथा जो विद्याओं और मधुर एवं मङ्गलमयी वाणीकी नायिका और सिद्धिकी स्वामिनी हैं, उन पार्वतीजीको मैं प्रणाम करता हूँ। भवानी! आप सांसारिक तापके महान् भयका निवारण करनेवाली हैं। अन्न, वस्त्र और आभूषण आदि एकमात्र आपके ही उपभोग हैं। शिवे! आप मुझे वह श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान कीजिये जो कहीं भी कुण्ठित न होनेवाली हो तथा जिसके द्वारा हम समस्त पापोंको लाँघ जायँ। शिवे! आपकी उपमा कैसे और कहाँ दी जाय ? सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि आपके लिये खिलवाड़ है। कल्याणमय भगवान् शिव आपके पति हैं। साक्षात् भगवान् विष्णु आपके सेवक हैं। लक्ष्मी, शची और सौभाग्यवती सरस्वती आपकी दासियाँ हैं तथा आप स्वयं ही वसु (रत्न, धन, सुवर्ण आदि) देनेवाली हैं।'

पुरोहित वसु कहते हैं—महामुनि जैमिनिने उपर्युक्त स्तुतिके द्वारा इस प्रकार भगवान् शङ्करका स्तवन करके प्रेमाश्रुपूर्ण नयनोंसे देखते हुए सभापति भगवान् शिवको प्रणाम किया। उन्होंने बारम्बार भगवान् शिवके ताण्डव नृत्यरूप मङ्गलमय अमृतका पान करके सम्पूर्ण कामनाएँ पा लीं और अन्तमें शिवगणोंका आधिपत्य प्राप्त कर लिया। जो प्रतिदिन इस स्तोत्रके एक श्लोक, आधे श्लोक, एक पाद अथवा आधे पादको भी धारण करता है, वह शिवलोकमें जाता है। शुभे ! जहाँ भगवान् शिवने ताण्डवनृत्य किया था, वह स्थल पवित्रसे भी परम पवित्र तीर्थ बन गया। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य मुक्त हो जाता है। जो श्रेष्ठ मानव वहाँ पितरोंका श्राद्ध करता है, वह अपने पूर्वजोंको स्वर्गलोक पहुँचा देता है। जो उस तीर्थमें ब्राह्मणको गौ, सुवर्ण, भूमि, शय्या, वस्त्र, छाता, अन्न और पान (पीनेयोग्य वस्तु) देता है, उसका वह समस्त दान अक्षय होता है।

परशुरामजीके द्वारा गोकर्णक्षेत्रका उद्धार तथा उसका माहात्म्य

मोहिनी बोली—गुरुदेव! आपके द्वारा कहे हुए पुण्डरीकपुरके माहात्म्यको मैंने सुना। अब मुझे गोकर्णतीर्थका माहात्म्य बताइये।

पुरोहित वसुने कहा—मोहिनी ! पश्चिम समुद्रके तटपर 'गोकर्णतीर्थ' है, जिसका विस्तार दो कोसका है। वह दर्शनमात्रसे भी मोक्ष देनेवाला है। देवि ! जब सगरके पुत्रोंने क्रमशः पृथ्वी खोद डाली तो वहाँतक समुद्र बढ़ आया और उसने आसपासकी तीस योजन विस्तृत तीर्थ, क्षेत्र और वनोंसहित भूमिको जलसे आप्लावित कर दिया। तब वहाँके रहनेवाले देवता, असुर और मनुष्य सब-के-सब वह स्थान छोड़कर सह्य आदि पर्वतोंपर जा बसे। तब गोकर्ण नामक उत्तम तीर्थ समुद्रके भीतर छिप गया। तब श्रेष्ठ मुनियोंने इस बातका विचार करके गोकर्णतीर्थके उद्धारमें मन लगाया। पर्वतपर ठहरे हुए वे सब महात्मा आपसमें सलाह करके महेन्द्रपर्वतपर रहनेवाले परशुरामजीके दर्शनके लिये वहाँ गये। उनकी यह यात्रा गोकर्णतीर्थके उद्धारकी इच्छासे हुई थी। महेन्द्रपर्वतपर आरूढ़ हो महर्षियोंने परशुरामजीका आश्रम देखा। वेदमन्त्रोंके उच्चघोषसे वह सारा आश्रम गूँज उठा था। महर्षियोंने प्रसन्नचित्त होकर उस समय उस आश्रममें प्रवेश किया। परशुरामजी ब्रह्मासनपर कोमल एवं काला मृगचर्म बिछाकर सुखपूर्वक बैठे थे। ऋषियोंने शान्तभावसे बैठे हुए तपस्वी परशुरामको देखा। महर्षियोंने उनको