भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 753, कुल 770 में से

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पृष्ठ 753
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उन गोकर्णनाथ महादेवके दर्शनसे सारे पाप मनुष्यको तत्काल छोड़कर चले जाते हैं। जिसके स्मरण करनेमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है, वह गोकर्ण नामक क्षेत्र सब तीर्थोंका निकेतन है। जो वहाँ काम-क्रोधादि दोषोंसे रहित होकर निवास करते हैं, वे थोड़े ही समयमें सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं। सती मोहिनी! उस तीर्थमें किये हुए दान, होम, जप, श्राद्ध, देवपूजन तथा ब्राह्मण-समादर आदि कर्म अन्य तीर्थोंकी अपेक्षा कोटिगुने होकर फल देते हैं।


श्रीराम-लक्ष्मणका संक्षिप्त चरित्र तथा लक्ष्मणाचलका माहात्म्य

**मोहिनी बोली—**पुरोहितजी! गोकर्णतीर्थका पापनाशक माहात्म्य मैंने सुना; अब लक्ष्मणतीर्थका माहात्म्य बतानेकी कृपा करें।

**पुरोहित वसुने कहा—**प्राचीन कालकी बात है, ब्रह्मा आदि देवताओंके प्रार्थना करनेपर साक्षात् लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु ही राजा दशरथसे चार स्वरूपोंमें प्रकट हुए। वे ही राम-लक्ष्मण आदि नामोंसे प्रसिद्ध हुए। देवि! तत्पश्चात् कुछ कालके अनन्तर मुनीश्वर विश्वामित्र अयोध्यामें आये। उन्होंने अपने यज्ञकी रक्षाके लिये श्रीराम और लक्ष्मणको राजासे माँगा। तब राजा दशरथने मुनिके शापसे डरकर अपने प्राणोंसे भी प्रिय पुत्र श्रीराम और लक्ष्मणको उन्हें सौंप दिया। तब वे दोनों भाई मुनीश्वर विश्वामित्रके यज्ञमें जाकर उसकी रक्षा करने लगे। श्रीरामने ताड़कासहित सुबाहुको मारकर मारीचको मानवास्त्रसे दूर फेंक दिया; फिर मुनिने उनका बड़ा सत्कार किया। तदनन्तर विश्वामित्रजी उन्हें राजा विदेहके नगरमें ले गये। वहाँ महाराज जनकने विश्वामित्रजीका भलीभाँति सत्कार करके उनसे पूछा—'महर्षे! ये दोनों बालक किस क्षत्रिय-कुल-नरेशके पुत्र हैं?' तब मुनिवर विश्वामित्रने राजा जनकको यह बताया कि 'ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण महाराज दशरथके पुत्र हैं।' यह सुनकर विदेहराज जनक बड़े प्रसन्न हुए। फिर महर्षि विश्वामित्र जनकसे बोले—'इन्हें वह धनुष दिखाओ जो महादेवजीकी धरोहर है और सीताके स्वयंवरके लिये तोड़नेकी शर्तके साथ रखा गया है।' विश्वामित्रजीका यह वचन सुनकर राजा जनकने तत्काल तीन सौ सेवकोंद्वारा उस धनुषको मँगवाकर आदरपूर्वक उन्हें दिखाया। श्रीरामने महादेवजीके उस धनुषको उसी क्षण बायें हाथसे उठा लिया और उसपर प्रत्यञ्चा चढ़ाकर खींचते हुए सहसा उसे तोड़ डाला। इससे मिथिला-नरेशको बड़ी