भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 754

७५२ * संक्षिप्त नारदपुराण *

प्रसन्नता हुई। उन्होंने श्रीराम और लक्ष्मणकी पूजा करके उन्हें वैदिक विधिके अनुसार अपनी दोनों कन्याएँ दे दीं। मुनिवर विश्वामित्रसे यह जानकर कि राजा दशरथके दो पुत्र और हैं, जनकने उन पुत्रोंके साथ महाराजको बुलवाया और अपने भाईकी दो पुत्रियोंका उन दोनों भाइयोंके साथ ब्याह कर दिया। तदनन्तर मिथिलानरेशके द्वारा भलीभाँति सम्मानित हो मुनिकी आज्ञा ले अपने चारों विवाहित पुत्रोंके साथ महाराज दशरथ अयोध्यापुरीके लिये प्रस्थित हुए। मार्गमें श्रीरामचन्द्रजीने भृगुपति परशुरामजीके गर्वको शान्त किया और पिता तथा भाइयोंके साथ वे बहुत वर्षोंतक आनन्दपूर्वक रहे।

तदनन्तर राजा दशरथ यह देखकर कि मेरे पुत्र श्रीराम जाननेयोग्य सभी तत्त्वोंको जान चुके हैं, उन्हें प्रसन्नतापूर्वक युवराजपदपर अभिषिक्त करनेके लिये उद्यत हुए। यह जानकर राजाकी सबसे अधिक प्रियतमा छोटी रानी कैकेयीने हठपूर्वक रामके राज्याभिषेकको रोका और अपने पुत्र भरतके लिये उस अभिषेकको पसंद किया। शुभे! तब माता कैकेयीकी प्रसन्नताके लिये पिताकी आज्ञा ले, श्रीरामचन्द्रजी अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मणके साथ चित्रकूट पर्वतपर चले गये और वहीं मुनिवेष धारण करके उन्होंने कुछ कालतक निवास किया।

इधर भरतजी पिताके मरनेका समाचार सुनकर अपने नानाके घरसे अयोध्या आये। यहाँ उन्हें मालूम हुआ कि पिताजी 'हा राम ! हा राम !'-की रट लगाते हुए परलोकवासी हुए हैं; तब भरतजीने कैकेयीको धिक्कार देकर श्रीरामचन्द्रजीको लौटा लानेके लिये वनको प्रस्थान किया; किंतु वहाँसे श्रीरामने भरतको अपनी चरण-पादुका देकर अयोध्या लौटा दिया। श्रीराम क्रमशः अत्रि, सुतीक्ष्ण तथा अगस्त्यके आश्रमोंपर गये। इन सब स्थानोंमें बारह वर्ष बिताकर श्रीरघुनाथजी भाई और पत्नीके साथ पञ्चवटीमें गये और वहाँ रहने लगे। जनस्थानमें शूर्पणखा नामकी राक्षसी रहती थी। श्रीरामकी प्रेरणासे लक्ष्मणने उसकी नाक काटकर उसे विकृत बना दिया। तब उस राक्षसीसे प्रेरित होकर युद्धके लिये आये हुए चौदह हजार राक्षसोंसहित खर, दूषण और त्रिशिराको श्रीरामचन्द्रजीने नष्ट कर दिया। यह समाचार सुनकर राक्षसोंका राजा रावण वहाँ आया। उसने मारीचको सुवर्णमय मृगके रूपमें दिखाकर उसके पीछे दोनों भाइयोंको आश्रमसे दूर हटा दिया और सीताको हर लिया। उस समय जटायुने उसका मार्ग रोका, परंतु रावण उसे मारकर सीताको लंकामें ले गया। दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण जब लौटकर आश्रमपर आये तो सीताका हरण हो चुका था। अब वे सब ओर उनकी खोज करने लगे। मार्गमें जटायुको गिरा देख उसके मरनेपर दोनों भाइयोंने उसका दाह-संस्कार किया। फिर कबन्धको मारकर शबरीपर कृपा की। वहाँसे ऋष्यमूक पर्वतपर आये। तत्पश्चात् हनुमान्‌जीके कहनेसे अपने मित्र वानरराज सुग्रीवके शत्रु बालिका वध करके श्रीरामने सुग्रीवको