भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 755
  • उत्तरभाग * ७५३

राजा बनाया। फिर सुग्रीवकी आज्ञासे सीताकी खोजके लिये सब ओर वानर गये। हनुमान् आदि वानर सीताको ढूँढ़ते हुए दक्षिण समुद्रके तटपर गये। वहाँ सम्पातिके कहनेसे उन्हें यह निश्चय हो गया कि सीताजी लंकामें हैं।

तदनन्तर अकेले हनुमान्‌जी समुद्रके दूसरे तटपर बसी हुई लंकापुरीमें गये और वहाँ रामप्रिया सती सीताको उन्होंने देखा तथा श्रीरामचन्द्रजीकी अँगूठी उन्हें देकर अपने प्रति उनके मनमें विश्वास उत्पन्न किया; फिर उन दोनों भाइयोंका कुशल-समाचार सुनाकर उनसे चूड़ामणि प्राप्त की। तदनन्तर अशोकवाटिकाको उजाड़कर सेनासहित अक्षकुमारको मारा और मेघनादके बन्धनमें आकर रावणसे वार्तालाप किया। तत्पश्चात् सम्पूर्ण लंकापुरीको जलाकर पुनः मिथिलेश-नन्दिनी सीताका दर्शन किया और उनकी आज्ञा ले समुद्र लाँघकर श्रीरामचन्द्रजीसे उनका समाचार निवेदन किया।

सीता राक्षसराज रावणके निवासस्थानमें रहती हैं—यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी भी वानर-सेनाके साथ समुद्रके तटपर पहुँचे। फिर समुद्रकी ही अनुमति लेकर उन्होंने महासागरपर पर्वतीय शिलाखण्डोंसे पुल बाँधा और उसके द्वारा दूसरे तटपर पहुँचकर सेनाकी छावनी डाली। तदनन्तर अपने छोटे भाई विभीषणके समझानेपर भी रावणको यह बात नहीं रुची कि सीता अपने पतिको वापस दे दी जाय। रावणने विभीषणको लातसे मारा और विभीषण श्रीरामचन्द्रजीकी शरणमें गये। तब श्रीरामचन्द्रजीने लंकाको चारों ओरसे घेर लिया। तदनन्तर रावणने क्रमशः अपने मन्त्रियों, अमात्यों, पुत्रों और सेवकोंको युद्धके लिये भेजा; किंतु वे सब श्रीराम-लक्ष्मण तथा कपीश्वरोंद्वारा नष्ट कर दिये गये। लक्ष्मणने इन्द्रविजयी मेघनादको तीखे बाणोंसे मार डाला। इधर श्रीरामने भी कुम्भकर्ण तथा रावणको मौतके घाट उतार दिया। इसके बाद श्रीरामने अपनी प्रियतमा सीताकी अग्निपरीक्षा ली और विभीषणको राक्षसोंका आधिपत्य, लंका तथा एक कल्पकी आयु देकर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करके सुग्रीव और