भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 760
७५८* संक्षिप्त नारदपुराण *

प्रिय होता है। शक्तिभेद-तीर्थमें स्नान करके बड़े भयंकर संकटोंसे छुटकारा मिल जाता है। जो मनुष्य ॐकारेश्वर आदि लिङ्गोंकी विधिपूर्वक पूजा करता है, वह भगवान् महेश्वरके प्रसादसे सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। देवि! महाकालवनमें शिवलिङ्गोंकी कोई नियत संख्या नहीं है। जहाँ-कहीं भी विद्यमान शिवलिङ्गका पूजन करके मनुष्य भगवान् शङ्करका प्रिय होता है। अवन्तीके प्रत्येक कल्पमें भिन्न-भिन्न नाम होते हैं। यथा—कनकभृङ्गा, कुशस्थली, अवन्तिका, पद्मावती, कुमुद्वती, उज्जयिनी, विशाला और अमरावती। जो मनुष्य शिप्रा नदीमें स्नान करके भगवान् महेश्वरका पूजन करता है, वह महादेवजी तथा महादेवीकी कृपासे सम्पूर्ण कामनाओंको पा लेता है। जो वामनकुण्डमें स्नान करके 'विष्णुसहस्रनामस्तोत्र' के द्वारा सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी भगवान् श्रीधर (विष्णु) -की स्तुति करता है, वह इस पृथिवीपर साक्षात् श्रीहरिके समान है। जो देवप्रयाग-सरोवरमें स्नान करके भगवान् माधवकी आराधना करता है, वह भगवान् माधवकी भक्ति पाकर विष्णुधाममें जाता है। जो अन्तर्गृहकी यात्रामें विघ्नेश, भैरव, उमा, रुद्रादित्य तथा अन्यान्य देवताओंकी श्रद्धापूर्वक प्राप्त उपचारोंसे पूजा करता है, वह स्वर्गलोकका भागी होता है। भामिनि! रुद्रसरोवर आदि स्थलोंमें जो अन्य बहुत-से तीर्थ हैं उन सबमें भगवान् शङ्करकी पूजा करके मनुष्य सुखी होता है। वहाँके आठ तीर्थोंमें स्नान करके मानव महाकालवनकी यात्राका साङ्गोपाङ्ग फल पाता है। इस प्रकार अवन्तीपुरीका यह सब माहात्म्य तुम्हें बताया गया है। इसे सुनकर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।


मथुराके भिन्न-भिन्न तीर्थोंका माहात्म्य

मोहिनी बोली— पुरोहितजी! मैंने अवन्तीका माहात्म्य सुना, जो मनुष्योंके पाप दूर करनेवाला है। अब मैं मथुराका माहात्म्य सुनना चाहती हूँ।

पुरोहित वसुने कहा— मोहिनी! सुनो, मैं मथुराके कल्याणकारी वैभवका वर्णन करता हूँ, जहाँ ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेपर साक्षात् भगवान् अवतीर्ण हुए हैं। वहाँ प्रकट होकर भगवान् नन्दके गोकुलमें गये और वहीं रहकर उन्होंने गोपोंके साथ सब लीलाएँ कीं। वनोंमें तथा मथुरामें जो तीर्थ हैं, उनका तुमसे इस समय वर्णन करता हूँ, सुनो। पहला मधुवन है, जहाँ स्नान करनेवाला श्रेष्ठ मानव देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका तर्पण करके विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। दूसरा उत्तम तालवन है, जहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करनेवाला मानव कृतकृत्य होता है। तीसरा कुमुदवन है, जहाँ स्नान करके मनुष्य मनोवाञ्छित भोगोंको पाता है और इहलोक तथा परलोकमें आनन्दित होता है। चौथेका नाम काम्यवन है; उसमें बहुत-से तीर्थ हैं; वहाँकी यात्रा करनेवाला पुरुष विष्णुलोकका भागी होता है। भद्रे! वहाँ जो विमलकुण्ड है, वह सब तीर्थोंमें उत्तम-से-उत्तम है; वहाँ दान करनेवाला मनुष्य वैकुण्ठधाम पाता है। पाँचवाँ बहुलावन है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है; वहाँ स्नान करनेवाला मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। छठा भद्रवन नामक वन है, जहाँ स्नान करनेवाला मानव भगवान् श्रीकृष्णके प्रसादसे सब कल्याण-ही-कल्याण देखता है। वहाँ सातवाँ खदिरवन है, जिसमें स्नान करनेमात्रसे मनुष्य भगवान् विष्णुके परम पदको प्राप्त कर लेता है। आठवाँ