भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 763
  • उत्तरभाग * ७६१

मनुष्य वहाँ मूलवेशका चिन्तन करते हुए स्नान करता है, वह नित्यविहारी श्यामसुन्दरके वैभवका कुछ चमत्कार देखता है। जहाँ श्रीकृष्णका तत्त्व जानकर इन्द्रने उन गोविन्ददेवका चिन्तन किया था, उस स्थानको गोविन्द-कुण्ड कहते हैं। वहाँ स्नान करके भी मनुष्य गोविन्दको पा लेता है। जहाँ एक होकर भी अनेक रूप धारण करके कुञ्जविहारी श्यामसुन्दरने गोपाङ्गनाओंके साथ रासलीला की थी, उसका भी वैसा ही माहात्म्य है। जहाँ नन्द आदि गोपोंने भगवान् श्रीकृष्णका वैभव देखा था, वह यमुनाजीके जलमें तत्त्वप्रकाश नामक तीर्थ कहा है। जहाँ गोपोंने कालियमर्दनकी लीला देखी थी, वह भी पुण्यतीर्थ बताया गया है, जो मनुष्योंके पापका नाश करनेवाला है। जहाँ स्त्री, बालक, गोधन और बछड़ोंसहित गोपोंको श्रीकृष्णने दावानलसे मुक्त किया, वह पुण्यतीर्थ स्नानमात्रसे सब पापोंका नाश करनेवाला है। जहाँ भगवान् श्रीकृष्णने घोड़ेका रूप धारण करनेवाले केशी नामक दैत्यको खेल-ही-खेलमें मार डाला था, वहाँ स्नान करनेवाला मानव विष्णुधामको पाता है। जहाँ भगवान्‌ने दुष्ट वृषाभासुरको मारा था, वह पुण्यतीर्थ अरिष्टकुण्डके नामसे विख्यात है, जो स्नान करनेमात्रसे मुक्ति देनेवाला है। जहाँ भगवान्‌ने शयन, भोजन, विचरण, श्रवण, दर्शन तथा विलक्षण कर्म किया, वह पुण्य क्षेत्र है, जो स्नानमात्रसे दिव्य गति प्रदान करनेवाला है। जहाँ पुण्यात्मा पुरुषोंने भगवान्‌का श्रवण, चिन्तन, दर्शन, नमस्कार, आलिङ्गन, स्तवन और प्रार्थना की है, वह भी उत्तम गति देनेवाला तीर्थ है। जहाँ श्रीराधाने अत्यन्त कठोर तपस्या की थी, वह श्रीराधाकुण्ड स्नान, दान और जपके लिये परम पुण्यमय तीर्थ है। वत्स-तीर्थ, चन्द्रसरोवर, अप्सरातीर्थ, रुद्रकुण्ड तथा कामकुण्ड—ये भगवान् श्रीहरिके उत्तम निवासस्थान हैं। विशाला, अलकनन्दा, मनोहर कदम्बखण्ड, विमलतीर्थ, धर्मकुण्ड, भोजन-स्थल, बलस्थान, बृहत्सानु (बरसाना), संकेतस्थान, नन्दिग्राम (नन्दगाँव), किशोरीकुण्ड, कोकिलवन, शेषशायी तीर्थ, क्षीरसागर, क्रीडादेश, अक्षयवट, रामकुण्ड, चीरहरण, भद्रवन, भाण्डीरवन, बिल्ववन, मानसरोवर, पुष्पपुलिन, भक्तभोजन, अक्रूरघाट, गरुडगोविन्द तथा बहुलावन—यह सब वृन्दावन नामक क्षेत्र है, जो सब ओरसे पाँच योजन विस्तृत है। वह परम पुण्यमय तीर्थ पुण्यात्मा पुरुषोंसे सेवित है और दर्शनमात्रसे ही मोक्ष देनेवाला है। वह अत्यन्त दुर्लभ है। देवतालोग भी उसका दर्शन चाहते हैं। वहाँकी आन्तरिक लीलाका दर्शन करनेमें देवतालोग तपस्यासे भी समर्थ नहीं हो पाते। जो सब ओरकी आसक्तियोंका त्याग करके वृन्दावनकी शरण लेते हैं, उनके लिये तीनों लोकोंमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है। जो वृन्दावनके नामका भी उच्चारण करता है, उसकी भी नन्दनन्दन श्रीकृष्णके प्रति सदा भक्ति बनी रहती है। पवित्र वृन्दावनके नर, नारी, वानर, कृमि, कीट-पतङ्ग, खग, मृग, वृक्ष और पर्वत भी निरन्तर श्रीराधाकृष्णका उच्चारण करते रहते हैं। जो श्रीकृष्णकी मायासे मोहित हैं और जिनका चित्त कामरूपी मलसे मलिन हो रहा है, ऐसे पुरुषोंको स्वप्नमें भी वृन्दावनका दर्शन दुर्लभ है। जिन पुण्यात्मा पुरुषोंने श्रीवृन्दावनका दर्शन किया है, उन्होंने अपना जन्म सफल कर लिया। वे श्रीहरिके कृपापात्र हैं। विधिनन्दिनि! बहुत कहने-सुननेसे क्या लाभ, मुक्तिकी इच्छा रखनेवाले लोगोंको भव्य एवं पुण्य वृन्दावनका सेवन करना चाहिये। सदा वृन्दावनका दर्शन करना चाहिये, सदा वहाँकी यात्रा करनी चाहिये तथा सदैव उसका सेवन और ध्यान करना चाहिये।