संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 762, कुल 770 में से
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दक्षिण बोधिनी-तीर्थ है, जहाँ स्नान करके पितरोंको पिण्डदान देनेवाला पुरुष उन्हें स्वर्गलोकमें पहुँचा देता है। उससे दक्षिण कोटि-तीर्थ है, जहाँ स्नान करनेसे मानव सब पापोंसे छूटकर विष्णुलोक पाता है। विश्रामघाटके उत्तर भागमें असिकुण्ड-तीर्थ है, जहाँ स्नान करनेवाला मनुष्य वैष्णवपद प्राप्त कर लेता है। उससे उत्तर संयमन-तीर्थ है, जहाँ स्नान और दान करनेसे मनुष्यको यमलोकका दर्शन नहीं होता। उससे उत्तर घण्टाभरण नामक ब्रह्मलोक है, जो स्नान करनेमात्रसे समस्त पापोंका नाश करनेवाला और ब्रह्मलोककी प्राप्ति करानेवाला तीर्थ है। उससे उत्तर परम उत्तम सोम-तीर्थ है, जहाँ गोता लगानेवाला श्रेष्ठ मानव पापरहित हो चन्द्रलोकमें जाता है। उससे उत्तर प्राचीसरस्वती-तीर्थ है, जिसमें स्नान करनेमात्रसे मनुष्य वाणीका अधीश्वर होता है। उससे उत्तर दशाश्वमेध-तीर्थ है, जहाँ स्नान करनेसे अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है। जो मनुष्य वहाँ गोपर्ण नामक शिवकी विधिपूर्वक पूजा करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको पाकर अन्तमें शिवलोकमें सम्मानित होता है। उससे उत्तर अनन्त-तीर्थ है, | जहाँ स्नान करनेवाला मानव मथुराके चौबीस तीर्थोंका फल पाता है। महाभागे! मथुरामें साक्षात् विष्णु चतुर्व्यूहरूपसे विराजमान हैं, जो मथुरावासियोंको मोक्ष प्रदान करते हैं। उन चार व्यूहोंमें पहली वाराह-मूर्ति है, दूसरी नारायणमूर्ति है, तीसरी वामन-मूर्ति है और चौथी हलधर-मूर्ति है। जो मनुष्य चतुर्व्यूहरूपधारी भगवान्का दर्शन करके उनकी विधिपूर्वक पूजा करता है, वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है। रङ्गेश्वर, भूतेश्वर, महाविद्या तथा भैरवका विधिपूर्वक दर्शन और पूजन करके मनुष्य तीर्थयात्राका फल पाता है। चतुःसामुद्रिक-कूप, कुब्जा-कूप, गणेश-कूप तथा श्रीकृष्णगङ्गामें स्नान करके मनुष्य पापमुक्त हो जाता है। शुभानने! समस्त मथुरा-मण्डलके अधिपति हैं भगवान् केशव, जो सम्पूर्ण क्लेशोंका नाश करनेवाले हैं। पवित्र मथुरा-मण्डलमें जिसने भगवान् केशवका दर्शन नहीं किया, उसका जन्म व्यर्थ है। मथुरामें और भी असंख्य तीर्थ हैं, उनमें स्नान करके वहाँ रहनेवाले ब्राह्मण पुरोहितको कुछ दान करना चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता।
वृन्दावन-क्षेत्रके विभिन्न तीर्थोंके सेवनका माहात्म्य
मोहिनी बोली— मथुरा और द्वादश वनोंका माहात्म्य मैंने सुना। अब कुछ वृन्दावनका रहस्य भी बताइये।
पुरोहित वसुने कहा— देवि! मुझसे वृन्दावनका रहस्य सुनो। मथुरामण्डलमें स्थित श्रीवृन्दावन जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओंसे परे, चिन्मय तुरीयांश रूप है। वह गोपीवल्लभ श्यामसुन्दरकी एकान्त लीलाओंका निगूढ़ स्थल है; जहाँ सखीस्थलके समीप गिरिराज गोवर्धन शोभा पाता है। वृन्दावन वृन्दा देवीका तपोवन है। वह नन्दगाँवसे लेकर | यमुनाके किनारे-किनारे दूरतक फैला हुआ है। यमुनाके सुरम्य तटपर रमणीय तथा पवित्र वृन्दावन सुशोभित है। वृन्दावनमें भी कुसुमसरवर परम पुण्यमय स्थल है। उसके मनोहर तटपर वृन्दा देवीका अत्यन्त सुखदायक आश्रम है, जहाँ मध्याह्नकालमें सखाओंके साथ श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण नित्य विश्राम करते हैं।
मोहिनी! जहाँ भगवान्ने तुम्हारे पिताको तत्त्वका साक्षात्कार कराया था, वह पुण्यस्थान वृन्दावनमें ब्रह्मकुण्डके नामसे प्रसिद्ध है। जो