भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 766

७६४ * संक्षिप्त नारदपुराण *


है, उससे प्रसन्न होकर मैं तुम्हें कोई वर दूँगा। तुम इच्छानुसार कोई वर माँगो।' जगद्विधाता ब्रह्माजीके द्वारा ऐसा कहनेपर विप्रवर वसुने उन्हें प्रणाम करके वृन्दावनवासका वर माँगा।

मुनीश्वरो! यह सुनकर जगत्की सृष्टि करनेवाले शरणागतक्लेशहारी ब्रह्माजी चारों मुखोंसे मुसकराते हुए बोले—'तथास्तु—ऐसा ही हो।' वसुका मन प्रसन्न हो गया। उन्होंने विधाताको प्रणाम करके वृन्दावनको प्रस्थान किया और वहाँ एकाग्रचित्त हो वे तपस्या करने लगे। तपस्या करते-करते ब्राह्मण वसुके पाँच हजार वर्ष व्यतीत हो गये। इससे संतुष्ट होकर साक्षात् भगवान् श्यामसुन्दर अपने दो-तीन प्रिय सखाओंके साथ आकर उन श्रेष्ठ द्विजसे बोले—'विप्रवर! मैं तुम्हारी तपस्यासे संतुष्ट हूँ। बोलो, क्या चाहते हो?' तब वसुने उठकर भगवान्‌को साष्टाङ्ग प्रणाम किया। वे बोले—'देव! मैं सदा वृन्दावनमें निवास करना चाहता हूँ।' द्विजवरो! तदनन्तर श्रीकृष्णने उन्हें मनोवाञ्छित वर दिया। फिर वसुने उन्हें प्रणाम किया और भगवान् पुनः अन्तर्धान हो गये।

तभीसे ब्राह्मण वसु इच्छानुसार रूप धारण करके भगवान् श्रीकृष्णकी वृन्दावनीय लीलाओंका चिन्तन करते हुए वहाँ सदा निवास करते हैं।

एक दिनकी बात है, विप्रवर वसु भगवान्‌का चिन्तन करते हुए यमुनाजीके किनारे बैठे हुए थे। इतनेमें ही उन्होंने देखा—ब्रह्माजीके पुत्र नारदजी वृन्दावनमें आये हुए हैं। अपने परमगुरु नारदजीको देखकर उन्होंने नमस्कार किया और भगवद्भक्ति बढ़ानेवाले नाना प्रकारके धर्म पूछे। उनके इस प्रकार पूछनेपर अध्यात्मदर्शी नारदजीने उनसे भगवान् विष्णुके भावी चरित्रके विषयमें सब बातें इस प्रकार कहीं—'ब्रह्मन्! एक दिन मैं कैलासवासी भगवान् शङ्करका दर्शन करने और वृन्दावनके भावी रहस्यके विषयमें पूछनेके लिये उनके समीप गया था। जिन्होंने अपनी महिमासे समस्त ब्रह्माण्डमण्डलको व्यास कर रखा है; सिद्धसमुदायसे घिरे हुए उन देवेश महेश्वरको प्रणाम करके मैंने अपना कल्याणमय अभीष्ट प्रश्न उनके सामने रखा। तब महादेवजी मुसकराते हुए मुझसे बोले—'ब्रह्मकुमार! तुमने भगवान् श्रीहरिके भविष्य चरित्रके विषयमें जो बात पूछी है, उसे मैं बता रहा हूँ। एक समय मैंने गोलोकमें रहनेवाली सुरभिका दर्शन किया और गोमाता सुरभिसे भविष्यके विषयमें प्रश्न किया। मेरे प्रश्नके उत्तरमें सुरभिने श्रीहरिके भविष्य चरित्रके विषयमें इस प्रकार कहा—'महेश्वर! इस समय राधाके साथ भगवान् श्रीकृष्ण इस गोलोकधाममें सुखपूर्वक रहते हैं और गोपों तथा गोपियोंको सुख देते हैं। शिव! वे किसी समय भूलोकके भीतर मथुरा-मण्डलमें प्रकट हो वृन्दावनमें अद्भुत लीला करेंगे। तत्पश्चात् ब्रह्माजीके द्वारा भूभारहरणके लिये प्रार्थना करनेपर श्रीहरि भी पृथ्वीपर वासुदेवरूपसे प्रकट होंगे। वसुदेवके घरमें जन्म लेकर, यादवनन्दन श्रीकृष्ण पीछे कंसासुरके भयसे नन्दके व्रजमें चले जायँगे। वहाँ जाकर