संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 765, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरभाग * ७६३
इस संसारमें जन्म नहीं होता। भगवान्के निवाससे गोवर्धन पर्वत परम पवित्र हो गया है।
सुभगे! तुम्हीं बताओ। इस पृथ्वीपर श्रीकृष्णकी विविध क्रीडाओंसे सुशोभित यमुनाका रमणीय पुलिन वृन्दावनके सिवा और कहाँ है ? इसलिये सब प्रकारसे प्रयत्न करके दूसरे पवित्र तथा पुण्यदायक वनों, नदियों और पर्वतोंको छोड़कर मनुष्योंको सदा वृन्दावनका सेवन करना चाहिये। जहाँ यमुना-जैसी पुण्यदायिनी नदी हैं, जहाँ गिरिराज गोवर्धन-जैसा पुण्यमय पर्वत है, उस वृन्दावनसे बढ़कर पावन वन इस पृथ्वीपर दूसरा कौन है ? उस वृन्दावनमें मोरपंखका मुकुट धारण किये, कनेरके फूलोंसे कानोंका शृङ्गार किये, नटवर-वेषधारी श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण गोपों, गौओं तथा गोपाङ्गनाओंके साथ नित्य विचरण करते हैं। उनकी वंशीकी मधुर ध्वनिके सामने हंसीका मधुर कलरव फीका लगता है। वैजयन्ती-माला उनके सारे अङ्गोंको घेरे रहती है। जहाँ स्वभावसे ही क्रूर जीव-जन्तु अपना सहज वैर छोड़कर अकारण स्नेह करनेवाले सुहृदोंकी भाँति रहते हुए भगवत्सुखका ही आश्रय लेते हैं, उस वृन्दावनमें जाकर, जैसे जीव भगवान्को पा ले, उस प्रकार भगवत्सुखका अनुभव करके जो फिर वृन्दावनको छोड़कर कहीं अन्यत्र चला जाता है, वह श्रीकृष्णकी मायाकी पिटारीरूप इस जगत्में क्या कहीं भी सुखी हो सकता है ? वह वृन्दावनधाम समस्त वसुधाका पुण्यरूप है। उसका आश्रय लेकर मेरा चित्त इस अज्ञानान्धकारमय जगत्को नीचे करके स्वयं सदाके लिये सबके ऊपर स्थित है। भगवान् गोपीनाथ यहाँ पग-पगपर प्रेमसे द्रवितचित्त हो नीच-ऊँचका विचार नहीं करते; अपने सब भक्तोंका उद्धार कर ही देते हैं। जो व्रजके गोपों, गोपियों, खगों, मृगों, पर्वतों, गौओं, भूभागों तथा धूलकणोंका भी दर्शन एवं स्मरण करके उन्हें प्रणाम करता है, उसके प्रेमपाशमें आबद्ध हो भगवान् श्रीकृष्ण उस भक्तके अन्तःकरणमें अपने प्रति दास्यभावका उदय करा देते हैं; उन व्रजराज श्यामसुन्दरके सिवा दूसरा कौन देवता सेवनके योग्य हो सकता है ? मोहिनी! यह वृन्दावनका माहात्म्य तुम्हें संक्षेपसे बताया गया है। संसार-भयसे डरे हुए पापहीन मनुष्योंको सदा इस वृन्दावनका ही श्रवण, कीर्तन, स्मरण तथा ध्यान करना चाहिये। जो मनुष्य पवित्रभावसे वृन्दावनके माहात्म्यका श्रवण करता है, वह भी निःसंदेह साक्षात् विष्णुरूप ही है।
पुरोहित वसुका भगवत्कृपासे वृन्दावन-वास, देवर्षि नारदके द्वारा शिव-सुरभि-संवादके रूपमें भावी श्रीकृष्णचरितका वर्णन
**पुरोहित वसु कहते हैं—**देवि! महाभागे! यह जो तीर्थोंका उत्तम माहात्म्य बताया है, उसे तुम सब तीर्थोंमें घूमकर प्राप्त करो।
**सूतजी बोले—**ब्राह्मणो! मोहिनीसे ऐसा कहकर उसके पुरोहित वसु उसके द्वारा बारंबार किये हुए सत्कार और पूजाको स्वीकार करके ब्रह्मलोकको चले गये। वहाँ जगत्स्रष्टा विधाता ब्रह्माजीके समीप जाकर उन्होंने प्रणाम किया और मोहिनीका सम्पूर्ण वृत्तान्त कह सुनाया। ब्राह्मण वसुका वचन सुनकर ब्रह्माजी प्रसन्न हो गये और बोले—'वत्स! तुमने बड़े पुण्यका कार्य किया है। तुमने मुझे मोहिनीका उत्तम वृत्तान्त बताया