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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ
  • उत्तरभाग * ७६३

इस संसारमें जन्म नहीं होता। भगवान्‌के निवाससे गोवर्धन पर्वत परम पवित्र हो गया है।

सुभगे! तुम्हीं बताओ। इस पृथ्वीपर श्रीकृष्णकी विविध क्रीडाओंसे सुशोभित यमुनाका रमणीय पुलिन वृन्दावनके सिवा और कहाँ है ? इसलिये सब प्रकारसे प्रयत्न करके दूसरे पवित्र तथा पुण्यदायक वनों, नदियों और पर्वतोंको छोड़कर मनुष्योंको सदा वृन्दावनका सेवन करना चाहिये। जहाँ यमुना-जैसी पुण्यदायिनी नदी हैं, जहाँ गिरिराज गोवर्धन-जैसा पुण्यमय पर्वत है, उस वृन्दावनसे बढ़कर पावन वन इस पृथ्वीपर दूसरा कौन है ? उस वृन्दावनमें मोरपंखका मुकुट धारण किये, कनेरके फूलोंसे कानोंका शृङ्गार किये, नटवर-वेषधारी श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण गोपों, गौओं तथा गोपाङ्गनाओंके साथ नित्य विचरण करते हैं। उनकी वंशीकी मधुर ध्वनिके सामने हंसीका मधुर कलरव फीका लगता है। वैजयन्ती-माला उनके सारे अङ्गोंको घेरे रहती है। जहाँ स्वभावसे ही क्रूर जीव-जन्तु अपना सहज वैर छोड़कर अकारण स्नेह करनेवाले सुहृदोंकी भाँति रहते हुए भगवत्सुखका ही आश्रय लेते हैं, उस वृन्दावनमें जाकर, जैसे जीव भगवान्‌को पा ले, उस प्रकार भगवत्सुखका अनुभव करके जो फिर वृन्दावनको छोड़कर कहीं अन्यत्र चला जाता है, वह श्रीकृष्णकी मायाकी पिटारीरूप इस जगत्‌में क्या कहीं भी सुखी हो सकता है ? वह वृन्दावनधाम समस्त वसुधाका पुण्यरूप है। उसका आश्रय लेकर मेरा चित्त इस अज्ञानान्धकारमय जगत्‌को नीचे करके स्वयं सदाके लिये सबके ऊपर स्थित है। भगवान् गोपीनाथ यहाँ पग-पगपर प्रेमसे द्रवितचित्त हो नीच-ऊँचका विचार नहीं करते; अपने सब भक्तोंका उद्धार कर ही देते हैं। जो व्रजके गोपों, गोपियों, खगों, मृगों, पर्वतों, गौओं, भूभागों तथा धूलकणोंका भी दर्शन एवं स्मरण करके उन्हें प्रणाम करता है, उसके प्रेमपाशमें आबद्ध हो भगवान् श्रीकृष्ण उस भक्तके अन्तःकरणमें अपने प्रति दास्यभावका उदय करा देते हैं; उन व्रजराज श्यामसुन्दरके सिवा दूसरा कौन देवता सेवनके योग्य हो सकता है ? मोहिनी! यह वृन्दावनका माहात्म्य तुम्हें संक्षेपसे बताया गया है। संसार-भयसे डरे हुए पापहीन मनुष्योंको सदा इस वृन्दावनका ही श्रवण, कीर्तन, स्मरण तथा ध्यान करना चाहिये। जो मनुष्य पवित्रभावसे वृन्दावनके माहात्म्यका श्रवण करता है, वह भी निःसंदेह साक्षात् विष्णुरूप ही है।


पुरोहित वसुका भगवत्कृपासे वृन्दावन-वास, देवर्षि नारदके द्वारा शिव-सुरभि-संवादके रूपमें भावी श्रीकृष्णचरितका वर्णन

**पुरोहित वसु कहते हैं—**देवि! महाभागे! यह जो तीर्थोंका उत्तम माहात्म्य बताया है, उसे तुम सब तीर्थोंमें घूमकर प्राप्त करो।

**सूतजी बोले—**ब्राह्मणो! मोहिनीसे ऐसा कहकर उसके पुरोहित वसु उसके द्वारा बारंबार किये हुए सत्कार और पूजाको स्वीकार करके ब्रह्मलोकको चले गये। वहाँ जगत्स्रष्टा विधाता ब्रह्माजीके समीप जाकर उन्होंने प्रणाम किया और मोहिनीका सम्पूर्ण वृत्तान्त कह सुनाया। ब्राह्मण वसुका वचन सुनकर ब्रह्माजी प्रसन्न हो गये और बोले—'वत्स! तुमने बड़े पुण्यका कार्य किया है। तुमने मुझे मोहिनीका उत्तम वृत्तान्त बताया

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है, उससे प्रसन्न होकर मैं तुम्हें कोई वर दूँगा। तुम इच्छानुसार कोई वर माँगो।' जगद्विधाता ब्रह्माजीके द्वारा ऐसा कहनेपर विप्रवर वसुने उन्हें प्रणाम करके वृन्दावनवासका वर माँगा।

मुनीश्वरो! यह सुनकर जगत्की सृष्टि करनेवाले शरणागतक्लेशहारी ब्रह्माजी चारों मुखोंसे मुसकराते हुए बोले—'तथास्तु—ऐसा ही हो।' वसुका मन प्रसन्न हो गया। उन्होंने विधाताको प्रणाम करके वृन्दावनको प्रस्थान किया और वहाँ एकाग्रचित्त हो वे तपस्या करने लगे। तपस्या करते-करते ब्राह्मण वसुके पाँच हजार वर्ष व्यतीत हो गये। इससे संतुष्ट होकर साक्षात् भगवान् श्यामसुन्दर अपने दो-तीन प्रिय सखाओंके साथ आकर उन श्रेष्ठ द्विजसे बोले—'विप्रवर! मैं तुम्हारी तपस्यासे संतुष्ट हूँ। बोलो, क्या चाहते हो?' तब वसुने उठकर भगवान्‌को साष्टाङ्ग प्रणाम किया। वे बोले—'देव! मैं सदा वृन्दावनमें निवास करना चाहता हूँ।' द्विजवरो! तदनन्तर श्रीकृष्णने उन्हें मनोवाञ्छित वर दिया। फिर वसुने उन्हें प्रणाम किया और भगवान् पुनः अन्तर्धान हो गये।

तभीसे ब्राह्मण वसु इच्छानुसार रूप धारण करके भगवान् श्रीकृष्णकी वृन्दावनीय लीलाओंका चिन्तन करते हुए वहाँ सदा निवास करते हैं।

एक दिनकी बात है, विप्रवर वसु भगवान्‌का चिन्तन करते हुए यमुनाजीके किनारे बैठे हुए थे। इतनेमें ही उन्होंने देखा—ब्रह्माजीके पुत्र नारदजी वृन्दावनमें आये हुए हैं। अपने परमगुरु नारदजीको देखकर उन्होंने नमस्कार किया और भगवद्भक्ति बढ़ानेवाले नाना प्रकारके धर्म पूछे। उनके इस प्रकार पूछनेपर अध्यात्मदर्शी नारदजीने उनसे भगवान् विष्णुके भावी चरित्रके विषयमें सब बातें इस प्रकार कहीं—'ब्रह्मन्! एक दिन मैं कैलासवासी भगवान् शङ्करका दर्शन करने और वृन्दावनके भावी रहस्यके विषयमें पूछनेके लिये उनके समीप गया था। जिन्होंने अपनी महिमासे समस्त ब्रह्माण्डमण्डलको व्यास कर रखा है; सिद्धसमुदायसे घिरे हुए उन देवेश महेश्वरको प्रणाम करके मैंने अपना कल्याणमय अभीष्ट प्रश्न उनके सामने रखा। तब महादेवजी मुसकराते हुए मुझसे बोले—'ब्रह्मकुमार! तुमने भगवान् श्रीहरिके भविष्य चरित्रके विषयमें जो बात पूछी है, उसे मैं बता रहा हूँ। एक समय मैंने गोलोकमें रहनेवाली सुरभिका दर्शन किया और गोमाता सुरभिसे भविष्यके विषयमें प्रश्न किया। मेरे प्रश्नके उत्तरमें सुरभिने श्रीहरिके भविष्य चरित्रके विषयमें इस प्रकार कहा—'महेश्वर! इस समय राधाके साथ भगवान् श्रीकृष्ण इस गोलोकधाममें सुखपूर्वक रहते हैं और गोपों तथा गोपियोंको सुख देते हैं। शिव! वे किसी समय भूलोकके भीतर मथुरा-मण्डलमें प्रकट हो वृन्दावनमें अद्भुत लीला करेंगे। तत्पश्चात् ब्रह्माजीके द्वारा भूभारहरणके लिये प्रार्थना करनेपर श्रीहरि भी पृथ्वीपर वासुदेवरूपसे प्रकट होंगे। वसुदेवके घरमें जन्म लेकर, यादवनन्दन श्रीकृष्ण पीछे कंसासुरके भयसे नन्दके व्रजमें चले जायँगे। वहाँ जाकर

मोहिनीका सब तीर्थोंमें घूमकर यमुनामें प्रवेशपूर्वक दशमीके अन्तभागमें स्थित होना तथा नारदपुराणके पाठ एवं श्रवणकी महिमा

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श्रीहरि अपने निकट आयी हुई बालघातिनी पूतनाको प्राणहीन कर देंगे। दानव चक्रवात (तृणावर्त)-को तथा देवपीडक महाकाय वत्सासुरको भी मौतके घाट उतार देंगे। कालियनागका दमन करके उसे यमुनासे उजाड़ देंगे। दुःसह धेनुकासुरको मारकर बकासुर और अघासुरके भी प्राण हर लेंगे। दाव, प्रदाव तथा प्रलम्बासूरका भी वध करेंगे। ब्रह्मा, इन्द्र, वरुण तथा मतवाले कुबेर-पुत्रोंका भी दर्प चूर्ण करके श्रीहरि वृषासुरका वध करेंगे। तदनन्तर मथुरामें जाकर धनुष तोड़कर श्रेष्ठ हाथी कुवलयापीडका वध करेंगे। तत्पश्चात् चाणूर आदि मल्लों और अपने मामा कंसको भी श्रीकृष्ण मार गिरायेंगे। फिर कैदमें पड़े हुए माता-पिताको मुक्त करके कालयवनको मारकर वे जरासन्धके भयसे द्वारकामें जा बसेंगे। तदनन्तर भगवान् श्रीहरि क्रमशः रुक्मिणी, सत्यभामा, सत्या, जाम्बवती, केकयराजकुमारी भद्रा, लक्ष्मणा, मित्रवृन्दा तथा कालिन्दीके साथ विवाह करेंगे। फिर भौमासुरको मारकर सोलह हजार स्त्रियोंका पाणिग्रहण करेंगे। इसके बाद पौण्ड्रक, शिशुपाल, दन्तवक्त्र, विदूरथ और शाल्वको मारकर बलभद्ररूपसे द्विविद बंदर और बल्वलका संहार करेंगे। फिर षट्पुरवासी दैत्योंके साथ वज्रनाभ, सुनाभ और वरदानसे बढ़े हुए त्रिशरीर दैत्यका वध करेंगे। शिवजी! फिर पृथ्वीका भार उतारनेको उत्सुक हो श्रीकृष्ण कौरव और पाण्डवपक्षके वीरोंको परस्पर एक-दूसरेको निमित्त बनाकर मार डालेंगे। इसी प्रकार यदुवंशियोंको यदुवंशियोंसे आपसमें ही लड़ाकर श्रीहरि अपने कुलका संहार कर डालेंगे और अपने अनुगामी बलरामजीके साथ फिर अपने परम धाममें चले जायेंगे। शम्भो ! इस प्रकार मैंने श्रीहरिके भविष्य चरित्रका वर्णन किया है। जाओ, जब भूतलपर भगवान् अवतार लेंगे, उस समय तुम वह सब कुछ देखोगे।' ब्रह्मकुमार नारद! सुरभिका वह वचन सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई और मैं पुनः अपने स्थानपर आ गया। वही बात मैंने तुम्हें भी बतायी है। समय आनेपर तुम भी गोकुलपति श्रीकृष्णके चरित्रका अवलोकन करोगे।' वसुजी ! त्रिशूलधारी भगवान् शङ्करका यह वचन सुनकर मेरा रोम-रोम हर्षसे खिल उठा है। मैं वीणा बजाकर भगवान्के गुण गाता और उसीमें मस्त रहता हुआ इस आतुर जगत्‌को आनन्द प्रदान करता रहता हूँ। द्विजश्रेष्ठ ! यह भविष्यमें होनेवाली बात है, जो मैंने तुझे बतायी है।'

सूतजी कहते हैं— विप्रवर वसुसे ऐसा कहकर देवर्षि नारदजी वीणा बजाते और यदुनन्दन श्रीकृष्णका चिन्तन करते हुए वहाँसे चले गये। ब्राह्मणो ! व्रजमें नारदजीका वह वचन सुनकर विप्रवर वसुका चित्त प्रसन्न हो गया और वे भावी श्रीकृष्णलीलाके दर्शनके लिये उत्सुक हो सदा वृन्दावनमें रहने लगे।


मोहिनीका सब तीर्थोंमें घूमकर यमुनामें प्रवेशपूर्वक दशमीके अन्तभागमें स्थित होना तथा नारदपुराणके पाठ एवं श्रवणकी महिमा

ऋषि बोले— साधु सूतजी! आपने भगवान् श्रीकृष्णके अमृतमय चरित्रका वर्णन किया और उसे हमने सुना। अतः आपकी कृपासे हम सब कृतार्थ हो गये। वसुके ब्रह्मलोक चले जानेपर ब्रह्मपुत्री मोहिनीने पीछे कौन-कौन-सा कार्य किया, यह हमें बतानेकी कृपा करें।

सूतजीने कहा— महर्षियो! आप सब लोग मोहिनीका शुभ चरित्र सुनें। विप्रवर वसुने जिस प्रकार उपदेश दिया था, उसीके अनुसार विधि-पूर्वक तीर्थयात्रा करनेके लिये ब्रह्मपुत्री मोहिनी

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गङ्गाजीके तटपर गयी। वहाँ जाकर विधि-नन्दिनीने गङ्गा आदि तीर्थोंमें स्नान करके सब कार्य विधिपूर्वक सम्पन्न किया और हर्षमें भरकर उसने वहाँके महात्मा ब्राह्मणोंका सत्सङ्ग किया। पुरोहित वसुने जिस तीर्थकी जैसी विधि बतायी थी, उसी प्रकार उसका सेवन करती हुई वह तीर्थोंमें घूमने लगी। उन तीर्थोंमें वह विष्णु आदि देवताओंकी पूजा करती और ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके दान देती थी। गयामें जाकर उसने पतिको विधिपूर्वक पिण्डदान किया; फिर काशीमें विश्वनाथजीकी पूजा करके वह पुरुषोत्तम-क्षेत्रमें गयी। उस क्षेत्रमें जगन्नाथजीका प्रसाद भोजन करके शुद्ध शरीर हो वहाँसे लक्ष्मणपर्वतपर गयी। वहाँ विधिपूर्वक लक्ष्मणजीकी पूजा करके सेतु-तीर्थमें जाकर उसने रामेश्वर शिवका पूजन किया और महेन्द्रपर्वतपर जाकर भृगुनन्दन परशुरामजीकी वन्दना की। तत्पश्चात् शिवजीके क्षेत्र गोकर्णमें जाकर गोकर्णनाथ भगवान् शिवका पूजन किया। ब्राह्मणो! तदनन्तर उन श्रेष्ठ द्विजोंके साथ उसने प्रभासको प्रस्थान किया और वहाँ स्नान करके देवता आदिका तर्पण करनेके पश्चात् उस तीर्थकी यात्रा पूरी करके द्वारकामें भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन किया। उसके बाद वह कुरुक्षेत्रमें गयी। वहाँ भी विधिपूर्वक यात्रा सम्पन्न करके महारानी मोहिनीने गङ्गाद्वारको प्रस्थान किया और उस तीर्थमें शास्त्रोक्त विधिके अनुसार स्नान, दान आदि कार्य किये। तदनन्तर कामोदाका दर्शन और नमस्कार करके वह बड़ी प्रसन्नताके साथ बदरिकाश्रम-तीर्थको गयी। वहाँ नर-नारायण ऋषिकी पूजा करके उसने बड़ी उतावलीके साथ कामाक्षी देवीका दर्शन करनेके लिये वहाँकी यात्रा की। उस तीर्थमें सिद्धनाथको प्रणाम करके (आदियात्रा पूर्ण करनेके पश्चात्) वहाँसे अयोध्या आयी। वहाँ सरयूमें स्नान करके उसने विधिपूर्वक सीतापति श्रीरामचन्द्रजीकी पूजा की और वहाँसे मध्ययात्रा प्रारम्भ करके वह अमरकण्टक पर्वतपर गयी। वहाँ नर्मदाके स्रोतके समीप ॐकारेश्वर महादेवकी पूजा, सेवा और दर्शन करके मोहिनीने माहिष्मतीपुरीकी यात्रा की। वहाँके त्र्यम्बकेश्वरका पूजन करके वह त्रिपुष्कर-तीर्थमें आयी। तीनों पुष्करोंमें विधिपूर्वक अनेक प्रकारके दान दे वह सब तीर्थोंमें उत्तम मथुरा-पुरीको गयी। वहाँ बीस योजनकी आभ्यन्तरिक यात्रा सम्पन्न करके मथुरापुरीकी परिक्रमाके पश्चात् उसने चार व्यूहोंका दर्शन किया। तदनन्तर बीस तीर्थोंमें स्नान करके पुनः प्रदक्षिणा की। वहाँ मथुराके ब्राह्मणोंको समस्त अलंकारोंसे अलंकृत दस हजार गौएँ दान दीं और उन्हें उत्तम अन्न भोजन कराकर भक्तिविह्वल चित्तसे नमस्कार करनेके पश्चात् विदा किया। फिर यमुनाके तटपर जा बैठी। तदनन्तर मोहिनी पापनाशिनी यमुनादेवीके जलमें समा गयी और फिर आजतक नहीं निकली। उसने दशमी तिथिके अन्तिम भागमें अपना आसन जमा लिया। यदि सूर्योदयकालमें एकादशीका दशमीसे

उत्तरभाग ७६७

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वेध हो तो स्मृतिके अनुसार चलनेवाले गृहस्थोंके पास पहुँचकर मोहिनी उनके व्रतको दूषित कर देती है। इसी प्रकार अरुणोदयकालमें दशमीवेध होनेपर वह वैदिकोंके और निशीथकालमें दशमीसे वेध होनेपर वैष्णवोंके निकट पहुँचकर वह उनके व्रतको दूषित करती है। अतः ब्राह्मणो ! जो मनुष्य मोहिनीके वेधसे रहित एकादशीको उपवास करके द्वादशीको भगवान् विष्णुकी पूजा करता है, वह निश्चय ही वैकुण्ठधाममें जाता है। विप्रवरो ! इस प्रकार मैंने मोहिनीका चरित्र सुनाया है।

नारदमहापुराणका यह उत्तरभाग भोग तथा मोक्ष देनेवाला है। यह मैंने तुम्हें सुना दिया। इसमें पद-पदपर मनुष्योंके लिये भगवान् श्रीहरिकी भक्तिका साधन होता है। जो मनुष्य भक्तिभावसे इसका श्रवण करता है, वह वैकुण्ठधामको जाता है। सभी पुराणोंका यह सनातन बीज है। द्विजवरो ! इस पुराणमें परम बुद्धिमान् पराशरनन्दन व्यासजीने प्रवृत्ति और निवृत्ति धर्मका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। नारदीय पुराण अलौकिक चरित्रसे भरा हुआ है। व्यासजीने मुझसे कहा था कि जिस-किसी व्यक्तिको इसका उपदेश नहीं देना चाहिये। पूर्वकालमें महाभाग सनकादि मुनियोंने विद्वान् नारदजीके समक्ष यह पुराणसंहिता प्रकाशित की थी। हंसस्वरूपी भगवान् श्रीहरिने जब शाश्वत ब्रह्मका उपदेश किया था, उसी समय उन्होंने इन सनकादिको इस विस्तृत विज्ञानसे युक्त नारद-पुराणका भी उपदेश कर दिया था। वही यह नारदमहापुराण है, जिसे अध्यात्मदर्शी साक्षात् भगवान् नारदने मुनिवर वेदव्यासको रहस्यसहित सुनाया था। अब मैंने इस रहस्यमय पुराणको आप लोगोंके समक्ष प्रकाशित किया है। पृथ्वीपर यह परम दुर्लभ है। जो मनुष्य सदा इसका श्रवण एवं पाठ करते हैं, उनके लिये यह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-चारों पुरुषार्थ देनेवाला है। इसके पाठ अथवा श्रवणसे ब्राह्मण वेदोंका भण्डार होता है, क्षत्रिय इस भूतलपर विजय पाता है, वैश्य धन-धान्यसे सम्पन्न होता है तथा शूद्र सब प्रकारके दुःखोंसे छूट जाता है। भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायनने इस संहिताका सम्पादन किया है। इसके सुननेपर सब प्रकारके संदेहोंका निवारण हो जाता है। यह सकाम भक्त पुरुषों तथा निष्काम पुरुषोंको भी मोक्ष देनेवाला है। ब्राह्मणो ! नैमिषारण्य, पुष्कर, गया, मथुरा, द्वारका, नर-नारायणाश्रम, कुरुक्षेत्र, नर्मदा तथा पुरुषोत्तमक्षेत्र आदि पुण्यक्षेत्रोंमें जाकर जो मनुष्य हविष्यान्न-भोजन और भूमि-शयन करते हुए अनासक्त और जितेन्द्रिय-भावसे इस संहिताका पाठ करता है, वह भवसागरसे मुक्त हो जाता है। जैसे व्रतोंमें एकादशी, नदियोंमें गङ्गा, वनोंमें वृन्दावन, क्षेत्रोंमें कुरुक्षेत्र, पुरियोंमें काशीपुरी, तीर्थोंमें मथुरा तथा सरोवरोंमें पुष्कर श्रेष्ठ है, उसी प्रकार समस्त पुराणोंमें यह नारदपुराण श्रेष्ठ है। गणेशजीके भक्त, सूर्यदेवताके उपासक, विष्णुभक्त, शक्तिके उपासक तथा शिव-भक्त और सकाम अथवा निष्काम-ये सभी इस पुराणके अधिकारी हैं। स्त्री हो या पुरुष, वह जिस-जिस कामनाका चिन्तन करते हुए आदरपूर्वक इस पुराणको सुनता या सुनाता है, वह उस-उस कामनाको निश्चय ही प्राप्त कर लेता है। नारदीय पुराणके अनुशीलनसे रोगसे पीड़ित मनुष्य रोगमुक्त हो जाता है। भयातुर मनुष्य निर्भय होता है और विजयकी इच्छावाला मनुष्य अपने शत्रुओंपर विजय पाता है।

जो सृष्टिके प्रारम्भमें रजोगुणद्वारा इस विश्वकी रचना करते हैं, मध्यमें सत्त्वगुणद्वारा इसका पालन करते हैं और अन्तमें तमोगुणद्वारा इस जगत्को ग्रस लेते हैं, उन सर्वात्मा परमेश्वरको नमस्कार है। जिन्होंने ऋषि, मनु, सिद्ध, लोकपाल एवं ब्रह्मा आदि प्रजापतियोंकी रचना की है, उन

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ब्रह्मात्माको नमस्कार है। जहाँसे वाणी निवृत्त हो जाती है और जहाँतक मन पहुँच नहीं पाता, वही रूपरहित सच्चिदानन्दघन परमात्माका स्वरूप जानना चाहिये। जिनकी सत्यतासे यह जगत् सत्य-सा प्रतीत होता है, जो निर्गुण तथा अज्ञानान्धकारसे परे हैं, उन विचित्ररूप परमात्माको मैं नमस्कार करता हूँ। जो अजन्मा परमात्मा आदि, मध्य और अन्तमें भी एक एवं अविनाशी होते हुए भी नाना रूपोंमें प्रकाशित हो रहे हैं, उन निरञ्जन भगवान्‌की मैं वन्दना करता हूँ। जिन निरञ्जन परमात्मासे यह चराचर जगत् उत्पन्न हुआ है, जिनमें यह स्थित है और जिनमें ही इसका लय होता है, वही सत्य तथा अद्वैत ज्ञान है। इन्हींको शिवोपासक शिव कहते हैं और सांख्यवेत्ता विद्वान् प्रधान कहते हैं। ब्राह्मणो! योगी जिन्हें पुरुष कहते हैं, मीमांसक लोग कर्म मानकर जिनकी उपासना करते हैं, वैशेषिक मतावलम्बी जिन्हें विभु और शक्तिका चिन्तन करनेवाले जिन्हें चिन्मयी आद्याशक्ति कहते हैं, नाना प्रकारके रूप और क्रियाओंके चरम आश्रय उन अद्वितीय ब्रह्माकी मैं वन्दना करता हूँ*। भगवान्‌की भक्ति मनुष्योंको भगवत्स्वरूपकी प्राप्ति करानेवाली है। उसे पाकर पशुके सिवा दूसरा कौन होगा, जो अन्य किसी लाभकी इच्छा करता हो। ब्राह्मणो! जो मनुष्य भगवान्‌से विमुख होकर संसारमें आसक्त होते हैं, उन्हें सत्सङ्गके सिवा और किसी उपायसे इस भवरूपी गहन वनसे छुटकारा नहीं मिलता। विप्रवरो! साधुपुरुष उत्तम आचारवाले, सर्वलोकहितैषी तथा दीन जनोंपर कृपा रखनेवाले होते हैं। वे अपनी शरणमें आये हुए लोगोंका उद्धार कर देते हैं। मुनियो! संसारमें आप लोग साधुपुरुषोंके द्वारा सम्मान पानेयोग्य और परम धन्य हैं; क्योंकि आप भगवान् वासुदेवकी नूतन पल्लवोंसे युक्त कीर्तिलताका बारंबार सेवन करते हैं। आप लोगोंने समस्त कारणोंके भी कारण तथा जगत्का मङ्गल करनेवाले साक्षात् भगवान् श्रीहरिका मुझे स्मरण दिलाया है, इसलिये मैं भी धन्य और अनुगृहीत हूँ॥ ॐ ॥

॥ उत्तर भाग सम्पूर्ण ॥

॥ श्रीनारदमहापुराण समाप्त ॥


* शिवं शैवा वदन्त्येनं प्रधानं सांख्यवेदिनः। योगिनः पुरुषं विप्राः कर्म मीमांसका जनाः ॥
विभुं वैशेषिकाद्याश्च चिच्छक्तिं शक्तिचिन्तकाः । ब्रह्माद्वितीयं तद्वन्दे नानारूपक्रियास्पदम् ॥
(ना० उत्तर० ८२ । ५६-५७)