भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 768, कुल 770 में से

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पृष्ठ 768

७६६ * संक्षिप्त नारदपुराण *

गङ्गाजीके तटपर गयी। वहाँ जाकर विधि-नन्दिनीने गङ्गा आदि तीर्थोंमें स्नान करके सब कार्य विधिपूर्वक सम्पन्न किया और हर्षमें भरकर उसने वहाँके महात्मा ब्राह्मणोंका सत्सङ्ग किया। पुरोहित वसुने जिस तीर्थकी जैसी विधि बतायी थी, उसी प्रकार उसका सेवन करती हुई वह तीर्थोंमें घूमने लगी। उन तीर्थोंमें वह विष्णु आदि देवताओंकी पूजा करती और ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके दान देती थी। गयामें जाकर उसने पतिको विधिपूर्वक पिण्डदान किया; फिर काशीमें विश्वनाथजीकी पूजा करके वह पुरुषोत्तम-क्षेत्रमें गयी। उस क्षेत्रमें जगन्नाथजीका प्रसाद भोजन करके शुद्ध शरीर हो वहाँसे लक्ष्मणपर्वतपर गयी। वहाँ विधिपूर्वक लक्ष्मणजीकी पूजा करके सेतु-तीर्थमें जाकर उसने रामेश्वर शिवका पूजन किया और महेन्द्रपर्वतपर जाकर भृगुनन्दन परशुरामजीकी वन्दना की। तत्पश्चात् शिवजीके क्षेत्र गोकर्णमें जाकर गोकर्णनाथ भगवान् शिवका पूजन किया। ब्राह्मणो! तदनन्तर उन श्रेष्ठ द्विजोंके साथ उसने प्रभासको प्रस्थान किया और वहाँ स्नान करके देवता आदिका तर्पण करनेके पश्चात् उस तीर्थकी यात्रा पूरी करके द्वारकामें भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन किया। उसके बाद वह कुरुक्षेत्रमें गयी। वहाँ भी विधिपूर्वक यात्रा सम्पन्न करके महारानी मोहिनीने गङ्गाद्वारको प्रस्थान किया और उस तीर्थमें शास्त्रोक्त विधिके अनुसार स्नान, दान आदि कार्य किये। तदनन्तर कामोदाका दर्शन और नमस्कार करके वह बड़ी प्रसन्नताके साथ बदरिकाश्रम-तीर्थको गयी। वहाँ नर-नारायण ऋषिकी पूजा करके उसने बड़ी उतावलीके साथ कामाक्षी देवीका दर्शन करनेके लिये वहाँकी यात्रा की। उस तीर्थमें सिद्धनाथको प्रणाम करके (आदियात्रा पूर्ण करनेके पश्चात्) वहाँसे अयोध्या आयी। वहाँ सरयूमें स्नान करके उसने विधिपूर्वक सीतापति श्रीरामचन्द्रजीकी पूजा की और वहाँसे मध्ययात्रा प्रारम्भ करके वह अमरकण्टक पर्वतपर गयी। वहाँ नर्मदाके स्रोतके समीप ॐकारेश्वर महादेवकी पूजा, सेवा और दर्शन करके मोहिनीने माहिष्मतीपुरीकी यात्रा की। वहाँके त्र्यम्बकेश्वरका पूजन करके वह त्रिपुष्कर-तीर्थमें आयी। तीनों पुष्करोंमें विधिपूर्वक अनेक प्रकारके दान दे वह सब तीर्थोंमें उत्तम मथुरा-पुरीको गयी। वहाँ बीस योजनकी आभ्यन्तरिक यात्रा सम्पन्न करके मथुरापुरीकी परिक्रमाके पश्चात् उसने चार व्यूहोंका दर्शन किया। तदनन्तर बीस तीर्थोंमें स्नान करके पुनः प्रदक्षिणा की। वहाँ मथुराके ब्राह्मणोंको समस्त अलंकारोंसे अलंकृत दस हजार गौएँ दान दीं और उन्हें उत्तम अन्न भोजन कराकर भक्तिविह्वल चित्तसे नमस्कार करनेके पश्चात् विदा किया। फिर यमुनाके तटपर जा बैठी। तदनन्तर मोहिनी पापनाशिनी यमुनादेवीके जलमें समा गयी और फिर आजतक नहीं निकली। उसने दशमी तिथिके अन्तिम भागमें अपना आसन जमा लिया। यदि सूर्योदयकालमें एकादशीका दशमीसे

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