संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 769, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरभाग * ७६७
वेध हो तो स्मृतिके अनुसार चलनेवाले गृहस्थोंके पास पहुँचकर मोहिनी उनके व्रतको दूषित कर देती है। इसी प्रकार अरुणोदयकालमें दशमीवेध होनेपर वह वैदिकोंके और निशीथकालमें दशमीसे वेध होनेपर वैष्णवोंके निकट पहुँचकर वह उनके व्रतको दूषित करती है। अतः ब्राह्मणो ! जो मनुष्य मोहिनीके वेधसे रहित एकादशीको उपवास करके द्वादशीको भगवान् विष्णुकी पूजा करता है, वह निश्चय ही वैकुण्ठधाममें जाता है। विप्रवरो ! इस प्रकार मैंने मोहिनीका चरित्र सुनाया है।
नारदमहापुराणका यह उत्तरभाग भोग तथा मोक्ष देनेवाला है। यह मैंने तुम्हें सुना दिया। इसमें पद-पदपर मनुष्योंके लिये भगवान् श्रीहरिकी भक्तिका साधन होता है। जो मनुष्य भक्तिभावसे इसका श्रवण करता है, वह वैकुण्ठधामको जाता है। सभी पुराणोंका यह सनातन बीज है। द्विजवरो ! इस पुराणमें परम बुद्धिमान् पराशरनन्दन व्यासजीने प्रवृत्ति और निवृत्ति धर्मका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। नारदीय पुराण अलौकिक चरित्रसे भरा हुआ है। व्यासजीने मुझसे कहा था कि जिस-किसी व्यक्तिको इसका उपदेश नहीं देना चाहिये। पूर्वकालमें महाभाग सनकादि मुनियोंने विद्वान् नारदजीके समक्ष यह पुराणसंहिता प्रकाशित की थी। हंसस्वरूपी भगवान् श्रीहरिने जब शाश्वत ब्रह्मका उपदेश किया था, उसी समय उन्होंने इन सनकादिको इस विस्तृत विज्ञानसे युक्त नारद-पुराणका भी उपदेश कर दिया था। वही यह नारदमहापुराण है, जिसे अध्यात्मदर्शी साक्षात् भगवान् नारदने मुनिवर वेदव्यासको रहस्यसहित सुनाया था। अब मैंने इस रहस्यमय पुराणको आप लोगोंके समक्ष प्रकाशित किया है। पृथ्वीपर यह परम दुर्लभ है। जो मनुष्य सदा इसका श्रवण एवं पाठ करते हैं, उनके लिये यह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-चारों पुरुषार्थ देनेवाला है। इसके पाठ अथवा श्रवणसे ब्राह्मण वेदोंका भण्डार होता है, क्षत्रिय इस भूतलपर विजय पाता है, वैश्य धन-धान्यसे सम्पन्न होता है तथा शूद्र सब प्रकारके दुःखोंसे छूट जाता है। भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायनने इस संहिताका सम्पादन किया है। इसके सुननेपर सब प्रकारके संदेहोंका निवारण हो जाता है। यह सकाम भक्त पुरुषों तथा निष्काम पुरुषोंको भी मोक्ष देनेवाला है। ब्राह्मणो ! नैमिषारण्य, पुष्कर, गया, मथुरा, द्वारका, नर-नारायणाश्रम, कुरुक्षेत्र, नर्मदा तथा पुरुषोत्तमक्षेत्र आदि पुण्यक्षेत्रोंमें जाकर जो मनुष्य हविष्यान्न-भोजन और भूमि-शयन करते हुए अनासक्त और जितेन्द्रिय-भावसे इस संहिताका पाठ करता है, वह भवसागरसे मुक्त हो जाता है। जैसे व्रतोंमें एकादशी, नदियोंमें गङ्गा, वनोंमें वृन्दावन, क्षेत्रोंमें कुरुक्षेत्र, पुरियोंमें काशीपुरी, तीर्थोंमें मथुरा तथा सरोवरोंमें पुष्कर श्रेष्ठ है, उसी प्रकार समस्त पुराणोंमें यह नारदपुराण श्रेष्ठ है। गणेशजीके भक्त, सूर्यदेवताके उपासक, विष्णुभक्त, शक्तिके उपासक तथा शिव-भक्त और सकाम अथवा निष्काम-ये सभी इस पुराणके अधिकारी हैं। स्त्री हो या पुरुष, वह जिस-जिस कामनाका चिन्तन करते हुए आदरपूर्वक इस पुराणको सुनता या सुनाता है, वह उस-उस कामनाको निश्चय ही प्राप्त कर लेता है। नारदीय पुराणके अनुशीलनसे रोगसे पीड़ित मनुष्य रोगमुक्त हो जाता है। भयातुर मनुष्य निर्भय होता है और विजयकी इच्छावाला मनुष्य अपने शत्रुओंपर विजय पाता है।
जो सृष्टिके प्रारम्भमें रजोगुणद्वारा इस विश्वकी रचना करते हैं, मध्यमें सत्त्वगुणद्वारा इसका पालन करते हैं और अन्तमें तमोगुणद्वारा इस जगत्को ग्रस लेते हैं, उन सर्वात्मा परमेश्वरको नमस्कार है। जिन्होंने ऋषि, मनु, सिद्ध, लोकपाल एवं ब्रह्मा आदि प्रजापतियोंकी रचना की है, उन