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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

उत्तरभाग

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करने लगा। भामिनि! जलमें सोये हुए विराट् पुरुषके बोलने आदि व्यवहारकी सिद्धिके लिये मुख आदि अङ्ग तथा भिन्न-भिन्न अवयव प्रकट हुए। उस पुरुषकी नाभिसे एक कमल उत्पन्न हुआ जो सहस्रों सूर्योंसे भी अधिक प्रकाशमान था। उस कमलसे सम्पूर्ण जगत्‌के प्रपितामह स्वयम्भू ब्रह्माजी उत्पन्न हुए। उन्होंने तीव्र तपस्या करके परम पुरुष परमात्माकी आज्ञा ले लोकों और लोकपालोंकी रचना की। ब्रह्माजीने कटि आदि नीचेके अङ्गोंसे सात पातालोंकी और ऊपरके अङ्गोंसे भूः आदि सात लोकोंकी सृष्टि की। इन चौदह भुवनोंसे युक्त ब्रह्माण्ड बताया गया है। ब्रह्माजीने इस चतुर्दशभुवनात्मक ब्रह्माण्डमें समस्त चराचर भूतोंकी सृष्टि की है। ब्रह्माजीके मनसे चार सनकादि महात्मा उत्पन्न हुए हैं। देवि! ब्रह्माजीके शरीरसे भृगु आदि पुत्र उत्पन्न हुए हैं, जिन्होंने इस जगत्‌को बढ़ाया है।

पुरोहित वसु कहते हैं—महाभागे! वे जो निरञ्जन, सच्चिदानन्दस्वरूप, ज्योतिर्मय, जनार्दन भगवान् श्रीकृष्ण हैं, उनका लक्षण सुनो। वे सर्वव्यापी हैं और ज्योतिर्मय गोलोकके भीतर नित्य निवास करते हैं। एकमात्र श्रीकृष्ण ही दृश्य तथा अदृश्यरूपधारी परब्रह्म हैं। मोहिनी! गोलोकमें गौएँ, गोप और गोपियाँ हैं। वहाँ वृन्दावन, सैकड़ों शिखरोंवाला गोवर्धन पर्वत, विरजा नदी, नाना वृक्ष, भाँति-भाँतिके पक्षी आदि वस्तुएँ विद्यमान हैं। विशिनन्दिनि! जबतक प्रकृति जागती है तबतक गोलोकमें सर्वव्यापी भगवान् श्रीकृष्ण प्रत्यक्षरूपसे ही विराजमान होते हैं। प्रलयकालमें गौएँ आदि सो जाती हैं, अतः वे परमात्माको नहीं जान पातीं। वे परमात्मा तेजःपुञ्जके भीतर कमनीय शरीर धारण करके किशोररूपसे विराजमान होते हैं। उनके श्रीअङ्गोंकी कान्ति मेघके समान श्याम है। उन्होंने रेशमी पीताम्बर धारण कर रखा है। उनके दो हाथ हैं। हाथमें मुरली सुशोभित है। वे भगवान् किरीट-कुण्डल आदिसे विभूषित हैं। श्रीराधा उन्हें प्राणोंसे भी अधिक प्यारी हैं। श्रीराधिकाजी उनकी आराधिका हैं। उनका वर्ण सुवर्णके समान उद्भासित होता है। देवी श्रीराधा प्रकृतिसे परे स्थित सच्चिदानन्दमयी हैं। वे दोनों भिन्न-भिन्न देह धारण करके स्थित हैं, तो भी उनमें कोई भेद नहीं है। उनका स्वरूप नित्य है। जैसे दूध और उसकी धवलता, पृथ्वी और उसकी गन्ध एक और अभिन्न हैं उसी प्रकार वे दोनों प्रिया-प्रियतम एक हैं। जो कारणका भी कारण है उसका निर्देश नहीं किया जा सकता। जो वेदके लिये भी अनिर्वचनीय है उसका वर्णन कदापि सम्भव नहीं है।

इन्द्रद्युम्न-सरोवरमें स्नानकी विधि, ज्येष्ठ मासकी पूर्णिमाको श्रीकृष्ण, बलराम तथा सुभद्राके अभिषेकका उत्सव

पुरोहित वसु कहते हैं—ब्रह्मपुत्री मोहिनी! वहाँसे उस तीर्थमें जाय जो अश्वमेधयज्ञके अङ्गसे उत्पन्न हुआ है। उसका नाम है इन्द्रद्युम्न-सरोवर। वह पवित्र एवं शुभ तीर्थ है। बुद्धिमान् पुरुष वहाँ जाकर पवित्रभावसे आचमन करे और मन-ही-मन भगवान् श्रीहरिका ध्यान करके जलमें उतरे। उस समय इस मन्त्रका उच्चारण करे—

अश्वमेधाङ्गसम्भूत तीर्थ सर्वाघनाशन।
स्नानं त्वयि करोम्यद्य पापं हर नमोऽस्तु ते॥
(ना० उत्तर० ६०। ३)

‘अश्वमेधयज्ञके अङ्गसे प्रकट हुए तथा सम्पूर्ण पापोंके विनाशक तीर्थ! आज मैं तुम्हारे जलमें स्नान करता हूँ। मेरे पाप हर लो। तुमको नमस्कार है।’

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इस प्रकार मन्त्रका उच्चारण करके विधिपूर्वक स्नान करे और देवताओं, ऋषियों, पितरों तथा अन्यान्य लोगोंका तिल और जलसे तर्पण करके मौनभावसे आचमन करे। फिर पितरोंको पिण्डदान दे भगवान् पुरुषोत्तमका पूजन करे। ऐसा करनेवाला मानव दस अश्वमेधयज्ञोंका फल पाता है। इस प्रकार पञ्चतीर्थका सेवन करके एकादशीको उपवास करे। जो मनुष्य ज्येष्ठ शुक्ला पूर्णिमाको भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन करता है वह पूर्वोक्त फलका भागी होकर दिव्यलोकमें क्रीड़ा करके उस परम पदको प्राप्त होता है, जहाँसे पुनः लौटकर नहीं आता। पृथ्वीपर जितने तीर्थ, नदी, सरोवर, पुष्करिणी, तालाब, बावड़ी, कुआँ, हद और समुद्र हैं, वे सब ज्येष्ठके शुक्लपक्षकी दशमीसे लेकर पूर्णिमातक एक सप्ताह प्रत्यक्षरूपसे पुरुषोत्तम-तीर्थमें जाकर रहते हैं। यह उनका सदाका नियम है। सती मोहिनी ! इसीलिये वहाँ स्नान, दान, देव-दर्शन आदि जो कुछ पुण्यकार्य उस समय किया जाता है, वह अक्षय होता है। मोहिनी! ज्येष्ठ मासके शुक्लपक्षकी दशमी तिथि दस प्रकारके पापोंको हर लेती है। इसीलिये उसे 'दशहरा' कहा गया है। जो उस दिन उत्तम व्रतका पालन करते हुए बलराम, श्रीकृष्ण एवं सुभद्रादेवीका दर्शन करता है वह सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकमें जाता है। जो मनुष्य फाल्गुनकी पूर्णिमाके दिन एकचित्त हो पुरुषोत्तम श्रीगोविन्दको झूलेपर विराजमान देखता है वह उनके धाममें जाता है। सुलोचने! जिस दिन विषुव-योग हो, वह दिन प्राप्त होनेपर विधिपूर्वक पञ्चतीर्थका सेवन करके बलराम, श्रीकृष्ण और सुभद्राका दर्शन करनेवाला मनुष्य समस्त यज्ञोंका दुर्लभ फल पाता है और सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकमें जाता है। जो वैशाखके शुक्लपक्षमें तृतीयाको श्रीकृष्णके चन्दनचर्चित स्वरूपका दर्शन करता है, वह उनके धाममें जाता है। ज्येष्ठ मासकी पूर्णिमाको यदि वृषराशिके सूर्य और ज्येष्ठा नक्षत्रका योग हो तो उसे 'महाज्येष्ठी' पूर्णिमा कहते हैं। उस समय मनुष्योंको प्रयत्नपूर्वक पुरुषोत्तम-क्षेत्रकी यात्रा करनी चाहिये। मोहिनी! महाज्येष्ठी पर्वको श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्राका दर्शन करके मनुष्य बारह यात्राओंका फल पाता है। प्रयाग, कुरुक्षेत्र, नैमिषारण्य, पुष्कर, गया, हरिद्वार, कुशावर्त, गङ्गासागर-सङ्गम, कोकामुख-शूकरतीर्थ, मथुरा, मरुस्थल, शालग्रामतीर्थ, वायुतीर्थ, मन्दराचल, सिन्धुसागरसङ्गम, पिण्डारक, चित्रकूट, प्रभास, कनखल, शङ्खोद्धार, द्वारका, बदरिकाश्रम, लोहकूट, सर्वपापमोचन-अश्वतीर्थ, कर्दमाल, कोटितीर्थ, अमरकण्टक, लोलार्क, जम्बूमार्ग, सोमतीर्थ, पृथूदक, उत्पलावर्तक, पृथुतुङ्ग, कुब्जतीर्थ, एकाम्रक, केदार, काशी, विरज, कालञ्जर, गोकर्ण, श्रीशैल, गन्धमादन, महेन्द्र, मलय, विन्ध्य, पारियात्र, हिमालय, सह्य, शुक्तिमान्, गोमान्, अर्बुद, गङ्गा, यमुना, सरस्वती, गोमती तथा ब्रह्मपुत्र आदि तीर्थमें जो पुण्य होता है और महाभागे! गोदावरी, भीमरथी, तुङ्गभद्रा, नर्मदा, तापी, पयोष्णी, कावेरी, क्षिप्रा, चर्मण्यवती, वितस्ता (झेलम), चन्द्रभागा (चनाव), शतद्रू (शतलज), बाहुदा, ऋषिकुल्या, मरुद्वृधा, विपाशा (व्यास), दृषद्वती, सरयू, आकाशगङ्गा, गण्डकी, महानदी, कौशिकी (कोसी), करतोया, त्रिस्त्रोत्रा, मधुवाहिनी तथा महानदी वैतरणी और अन्यान्य नदियाँ, जिनका नाम यहाँ नहीं लिया गया है, वे सभी पुण्यमें श्रीकृष्णदर्शनकी समानता नहीं कर सकती। सूर्य-ग्रहणके समय स्नान और दानसे जो फल होता है, महाज्येष्ठी पर्वको भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करके मनुष्य उसी फलको प्राप्त कर लेता है।

वहाँ एक सजल कूप है जो बड़ा ही पवित्र और सर्वतीर्थमय है। ज्येष्ठकी पूर्णिमाको उसमें

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पातालगङ्गा, भोगवती निश्चितरूपसे प्रत्यक्ष हो जाती हैं। अतः मोहिनी! ज्येष्ठकी पूर्णिमाको श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्राको स्नान करानेके लिये सुवर्ण आदिके कलशोंमें उस कूपसे जल निकाला जाता है। इसके लिये एक सुन्दर मञ्च बनवाकर उसे पताका आदिसे अलंकृत किया जाता है। वह सुदृढ़ और सुखपूर्वक चलने योग्य बना होता है। वस्त्र और फूलोंसे उसे सजाया जाता है। वह खूब विस्तृत होता है और धूपसे सुवासित किया जाता है। उसपर श्रीकृष्ण और बलरामको स्नान करानेके लिये पीत वस्त्र बिछाया जाता है। उसे सजानेके लिये मोतियोंके हार लटकाये जाते हैं। भाँति-भाँतिके वाद्योंकी ध्वनि होती रहती है। सती! उस मञ्चपर एक ओर भगवान् श्रीकृष्ण और दूसरी ओर भगवान् बलराम विराजते हैं। बीचमें सुभद्रादेवीको पधराकर जय-जयकार और मङ्गलघोषके साथ स्नान कराया जाता है। मोहिनी! उस समय ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और अन्य जातिके लाखों स्त्री-पुरुष उन्हें घेरे रहते हैं। गृहस्थ, स्नातक, संन्यासी और ब्रह्मचारी सभी मञ्चपर विराजमान भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामको स्नान कराते हैं। सुन्दरी! पूर्वोक्त सभी तीर्थ अपने पुष्पमिश्रित जलोंसे पृथक्-पृथक् भगवान्‌को स्नान कराते हैं। उस समय मुनिलोग वेद-पाठ और मन्त्रोच्चारण करते हैं। सामगानके साथ भाँति-भाँतिकी स्तुतियोंके पुण्यमय शब्द होते रहते हैं। आकाशमें यक्ष, विद्याधर, सिद्ध, किन्नर, अप्सराएँ, देव, गन्धर्व, चारण, आदित्य, वसु, रुद्र, साध्य, विश्वेदेव, मरुद्गण, लोकपाल तथा अन्य लोग भी भगवान् पुरुषोत्तमकी स्तुति करते हैं—'देवदेवेश्वर! पुराणपुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है। जगत्पालक भगवान् जगन्नाथ! आप सृष्टि, स्थिति और संहार करनेवाले हैं। जो त्रिभुवनको धारण करनेवाले, ब्राह्मणभक्त, मोक्षके कारणभूत और समस्त मनोवाञ्छित फलोंके दाता हैं, उन भगवान्‌को हम प्रणाम करते हैं*।' मोहिनी! इस प्रकार आकाशमें खड़े हुए देवता श्रीकृष्ण, महाबली बलराम और सुभद्रादेवीकी स्तुति करते हैं। देवताओंके बाजे बजते और शीतल वायु चलती है। उस समय आकाशमें उमड़े हुए मेघ पुष्पमिश्रित जलकी वर्षा करते हैं। मुनि, सिद्ध और चारण जय-जयकार करते हैं। तत्पश्चात् इन्द्र आदि समस्त देवता, ऋषि, पितर, प्रजापति, नाग तथा अन्य स्वर्गवासी मङ्गल सामग्रियोंके साथ विधि और मन्त्रयुक्त अभिषेकोपयोगी द्रव्य लेकर भगवान्‌का अभिषेक करते हैं।


अभिषेककालमें देवताओं‌द्वारा जगन्नाथजीकी स्तुति, गुण्डिचा-यात्राका माहात्म्य तथा द्वादश यात्राकी प्रतिष्ठाविधि

**पुरोहित वसु कहते हैं—**ब्रह्मपुत्री मोहिनी! उस समय इस प्रकार श्रीकृष्ण, बलराम तथा सुभद्राका अभिषेक करके प्रसन्नतासे भरे हुए महाभाग देवगण उनकी स्तुति करते हैं।

**देवता कहते हैं—**सम्पूर्ण लोकोंका पालन करनेवाले जगन्नाथ! आपकी जय हो, जय हो। पद्मनाभ! धरणीधर! आदिदेव! आपकी जय हो। वासुदेव! दिव्य मत्स्यरूप धारण करनेवाले परमेश्वर!


* नमस्ते देवदेवेश पुराणपुरुषोत्तम ॥
सर्गस्थित्यन्तकृद्देव लोकनाथ जगत्पते। त्रैलोक्यशरणं देवं ब्रह्मण्यं मोक्षकारणम्॥
तं नमस्यामहे भक्त्या सर्वकामफलप्रदम्। (ना० उत्तर० ६०। ५३–५५)

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आपकी जय हो। देवश्रेष्ठ! समुद्रमें शयन करनेवाले माधव! योगेश्वर! आपकी जय हो। विश्वमूर्ते! चक्रधर! श्रीनिवास! आपकी जय हो। कच्छपावतार! आपकी जय हो। शेषशायिन्! धर्मवास! गुणनिधान! आपकी जय हो। शान्तिकर! ज्ञानमूर्ते! भाववेद्य! मुक्तिकर! आपकी जय हो, जय हो। विमलदेह! सत्त्वगुणके निवासस्थान! गुणसमूह! आपकी जय हो, जय हो। निर्गुणरूप! मोक्षसाधक! आपकी जय हो। लोकशरण! लक्ष्मीपते! कमलनयन! सृष्टिकर! आपकी जय हो, जय हो। आपका श्रीविग्रह तीसीके फूलकी भाँति श्याम एवं सुन्दर है; आपकी जय हो। आपका श्रीअङ्ग शेषनागके शरीरपर शयन करता है; आपकी जय हो। भक्तिभावन! आपकी जय हो, जय हो। परमशान्त! आपकी जय हो। नीलाम्बरधारी बलराम! आपकी जय हो। सांख्यवन्दित! आपकी जय हो। पापहारी हरे! आपकी जय हो। जगन्नाथ श्रीकृष्ण! आपकी जय हो। बलरामजीके अनुज! आपकी जय हो। मनोवाञ्छित फल देनेवाले देव! आपकी जय हो। वनमालासे आवृत वक्षवाले नारायण! आपकी जय हो। विष्णो! आपकी जय हो। आपको नमस्कार है।

इस प्रकार स्तुति करके इन्द्र आदि देवता, सिद्ध, चारण, गन्धर्व तथा अन्य स्वर्गवासी मन-ही-मन बड़े प्रसन्न होते हैं। वे तन्मय चित्तसे श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रादेवीका दर्शन, स्तवन एवं नमस्कार करके अपने-अपने निवासस्थानको चले जाते हैं। पुष्करतीर्थमें सौ बार कपिला गौका दान करनेसे अथवा सौ कन्याओंका दान करनेसे जो फल कहा गया है उसीको मनुष्य मञ्चपर विराजमान श्रीकृष्णका दर्शन करनेसे पा लेता है। सबका आतिथ्यसत्कार करनेसे, विधिपूर्वक वृषोत्सर्ग करनेसे, ग्रीष्मऋतुमें जलदान देनेसे, चान्द्रायण करनेसे, एक मासतक निराहार रहनेसे तथा सब तीर्थोंमें जाकर व्रत और दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह सब मञ्चपर विराजमान सुभद्रासहित श्रीकृष्ण और बलरामका दर्शन करनेसे मिल जाता है। अतः स्त्री हो या पुरुष सबको उस समय पुरुषोत्तमका दर्शन करना चाहिये। मोहिनी! भगवान् श्रीकृष्णके स्नान किये हुए शेष जलसे यदि विधिपूर्वक अभिषेक किया जाय तो वन्ध्या, मृतवत्सा, दुर्भगा, ग्रहपीड़िता, राक्षसगृहीता तथा रोगिणी स्त्रियाँ तत्काल शुद्ध हो जाती हैं। और सुप्रभे! जिन-जिन मनोरथोंको वे चाहती हैं उन सबको शीघ्र प्राप्त कर लेती हैं। अतः जलशायी भगवान् श्रीकृष्णके स्नानावशेष जलसे अपने सम्पूर्ण अङ्गोंको सींचना चाहिये। जो लोग स्नानके पश्चात् दक्षिणाभिमुख जाते हुए भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करते हैं वे ब्रह्महत्या आदि पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। पृथ्वीके सम्पूर्ण तीर्थोंकी यात्रा करनेका जो फल कहा गया है तथा गङ्गाद्वार, कुब्जाम्र तथा कुरुक्षेत्रमें एवं पुष्कर आदि अन्य तीर्थोंमें सूर्यग्रहणके समय स्नान करनेसे जो फल बताया गया है एवं वेद, शास्त्र, पुराण, महाभारत तथा संहिता आदि ग्रन्थोंमें पुण्यकर्मका जो फल बताया गया है, उसे मनुष्य दक्षिणाभिमुख जाते हुए श्रीकृष्ण, बलराम तथा सुभद्राका दर्शनमात्र करके पा लेता है।

भगवान् श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा—ये रथपर विराजमान होकर जब गुण्डिचा* मण्डपकी यात्रा करते हैं उस समय जो उनका दर्शन करते हैं, वे श्रीहरिके धाममें जाते हैं। गुण्डिचा-यात्राके समय फाल्गुनकी पूर्णिमाको विषुव योगमें जो


* गुण्डिचा नामक उद्यान-मन्दिर, जो पुरीमें इन्द्रद्युम्नसरोवरके तटपर स्थित है। इसके गुण्डिचा, गुडिवा आदि नाम भी मिलते हैं।

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सूर्योपस्थानके पश्चात् पुण्यमयी वेदमाता गायत्रीका एक सौ आठ बार जप करे। साथ ही सूर्यदेवतासम्बन्धी अन्य मन्त्रोंका जप करके तीन बार परिक्रमाके पश्चात् सूर्यदेवको प्रणाम करे। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन तीन वर्णोंके लिये वेदोक्त विधिसे स्नान और जपका विधान है। वरारोहे ! स्त्री और शूद्रोंके स्नान और जप वैदिक विधिसे रहित होते हैं।

इसके बाद भक्तिभावसे मन्दिरमें स्थित श्रीपुरुषोत्तमके समीप जाय। वहाँ हाथ-पैर धोकर विधिपूर्वक आचमन करके भगवान्‌को पहले घीसे स्नान करावे, उसके बाद दूधसे। तत्पश्चात् मधुगन्धोदक एवं तीर्थचन्दनके जलसे उन्हें स्नान कराकर दो श्रेष्ठ वस्त्र भक्तिपूर्वक भगवान्‌को पहनावे। चन्दन, अगुरु, कर्पूर तथा कुंकुमका लेप लगावे। फिर कमलके फूलोंसे पराभक्तिपूर्वक भगवान् पुरुषोत्तमकी पूजा करे। इस प्रकार भोग और मोक्ष देनेवाले मनुष्य एक बार पुरुषोत्तमपुरीकी यात्रा करता है वह विष्णुलोकमें जाता है। ब्रह्मपुत्री ! जब वहाँकी बारह यात्राएँ पूर्ण हो जायें उस समय विधिपूर्वक उसकी प्रतिष्ठा (उद्यापन) करनी चाहिये, जो सब पापोंका नाश करनेवाली है। ज्येष्ठ मासके शुक्लपक्षमें एकादशी तिथिको एकाग्रचित्तसे किसी पवित्र जलाशयपर जाकर आचमन करे और इन्द्रियसंयमपूर्वक पवित्र भावसे सब तीर्थोंका आवाहन करके भगवान् नारायणका ध्यान करते हुए शास्त्रीय पद्धतिसे स्नान करे। स्नानके पश्चात् विधिपूर्वक देवताओं, ऋषियों, अपने पितरों तथा अन्य लोगोंका उनके नाम और गोत्रका उच्चारण करते हुए तर्पण करे। फिर जलसे निकलकर दो स्वच्छ वस्त्र पहने और विधिसे आचमन करके जगन्नाथ श्रीहरिकी पूजा करके उनके समक्ष अगुरु, पवित्र गुग्गुल तथा अन्य सुगन्धित पदार्थों एवं घृतके साथ धूप जलाये। फिर अपनी शक्तिके अनुसार घीसे भक्तिपूर्वक दीपक जलाकर रखे। मोहिनी ! एकाग्रचित्त होकर गायके घी अथवा तिलके तेलसे बारह दीपक और जलाकर रखे। तदनन्तर नैवेद्यके रूपमें खीर, पूआ, पूड़ी, बड़ा, लड्डू, खाँड और फल निवेदन करे। इस प्रकार पञ्चोपचारसे श्रीपुरुषोत्तमकी पूजा करके 'ॐ नमः पुरुषोत्तमाय'—इस मन्त्रका एक सौ आठ बार जप करे। तत्पश्चात् दण्डकी भाँति पृथ्वीपर पड़कर भगवान्‌को प्रार्थना द्वारा प्रसन्न करे। फिर एकाग्रचित्त हो भगवान्‌के ऊपर भाँति-भाँतिके पुष्पोंसे एक सुन्दर एवं विचित्र शोभायुक्त

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मण्डलाकार पुष्पमण्डप बनावे और भगवच्चिन्तन करते हुए रातमें जागरण करे। भगवान् वासुदेवकी कथा और गीतका भी आयोजन करे। इस प्रकार विद्वान् पुरुष भगवान्‌का ध्यान, पाठ और स्तवन करते हुए रात बितावे। तदनन्तर निर्मल प्रभात-काल आनेपर द्वादशीको बारह ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। वे ब्राह्मण स्नातक, वेदोंके पारगामी, इतिहास-पुराणके ज्ञाता, श्रोत्रिय और जितेन्द्रिय होने चाहिये। इसके बाद स्वयं भी विधिपूर्वक स्नान करके धुला हुआ वस्त्र पहने और इन्द्रियसंयमपूर्वक भक्तिभावसे पहलेकी भाँति वहाँ विराजमान पुरुषोत्तमको स्नान करावे; फिर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, उपहार आदि नाना प्रकारके उपचारोंसे तथा प्रणाम, परिक्रमा, जप, स्तुति, नमस्कार और मनोहर गीत-वाद्योंद्वारा भगवान् जगन्नाथकी पूजा करे। भगवत्पूजनके पश्चात् ब्राह्मणोंकी भी पूजा करे। उनके लिये बारह गौएँ दान करके भक्तिपूर्वक सुवर्ण, छतरी, जूते और काँसपात्र आदि समर्पित करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको खीरसहित पक्वान्न भोजन करावे। उन भोज्यपदार्थोंमें गुड़ और शक्करका मेल होना चाहिये। जब ब्राह्मण लोग भोजन करके भलीभाँति तृप्त एवं प्रसन्नचित्त हो जायँ, तब उनके लिये जलसे भरे हुए बारह घट दान करे। उन घड़ोंके साथ लड्डु और यथाशक्ति दक्षिणा भी होनी चाहिये। ब्रह्मपुत्री! तत्पश्चात् विष्णुतुल्य ज्ञानदाता गुरुकी पूर्ण भक्तिके साथ पूजा करनी चाहिये। विद्वान् पुरुष उन्हें सुवर्ण, वस्त्र, गौ, धान्य, द्रव्य तथा अन्य मनोवाञ्छित वस्तुएँ देकर उनकी पूजा सम्पन्न करे; फिर नमस्कार करके निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करे—

सर्वव्यापी जगन्नाथः शङ्खचक्रगदाधरः।
अनादिनिधनो देवः प्रीयतां पुरुषोत्तमः॥
(ना० उत्तर० ६१।७४)

'शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले सर्वव्यापी, अनादि और अनन्त देवता जगदीश्वर भगवान् पुरुषोत्तम मुझपर प्रसन्न हों।'

यों कहकर गुरु एवं ब्राह्मणोंकी आदरपूर्वक तीन बार परिक्रमा करे; फिर चरणोंमें भक्तिपूर्वक सिर नवाकर आचार्यसहित ब्राह्मणोंको विदा करे। तत्पश्चात् गाँवकी सीमातक भक्तिपूर्वक उन ब्राह्मणोंके साथ-साथ जाय और उन्हें नमस्कार करके लौटे। फिर स्वजनों और बान्धवोंके साथ स्वयं भी मौन होकर भोजन करे। ऐसा करके स्त्री हो या पुरुष वह एक हजार अश्वमेध और सौ राजसूय-यज्ञोंका फल पाता है एवं सूर्यतुल्य विमानके द्वारा विष्णुलोकको जाता है। इस प्रकार मैंने तुम्हें श्रीपुरुषोत्तमक्षेत्रकी यात्राका फल बताया है, जो मनुष्योंको भोग और मोक्ष देनेवाला है।


प्रयाग-माहात्म्यके प्रसङ्गमें तीर्थयात्राकी सामान्य विधिका वर्णन

**वसिष्ठजी कहते हैं—**भूपाल! भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले इस पुरुषोत्तम-माहात्म्यको सुनकर ब्रह्मपुत्री मोहिनीने अपने पुरोहित विप्रवर वसुसे पुनः प्रश्न किया।

**मोहिनी बोली—**विप्रवर! मैंने पुरुषोत्तमतीर्थका अद्भुत माहात्म्य सुना। सुव्रत! अब प्रयागका भी माहात्म्य कहिये।

**पुरोहित वसुने कहा—**भद्रे! सुनो, मैं तीर्थयात्राकी विधि बतलाता हूँ, जिसका आश्रय लेनेपर मनुष्य यात्राका शास्त्रोक्त फल पा सकता है। तीर्थयात्रा पुण्यकर्म है। इसका महत्त्व यज्ञोंसे भी बढ़कर है। बहुत दक्षिणावाले अग्निष्टोमादि यज्ञोंका अनुष्ठान करके भी मनुष्य उस फलको नहीं पाता, जो तीर्थयात्रासे सुलभ होता है। जो अनजानमें भी कभी यहाँ तीर्थयात्रा कर लेता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न हो स्वर्गलोकमें

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प्रतिष्ठित होता है। उसे सदा धन-धान्यसे भरा हुआ स्थान प्राप्त होता है। वह भोगसम्पन्न और सदा ऐश्वर्य-ज्ञानसे परिपूर्ण होता है। उसने नरकसे अपने पितरों और पितामहोंका उद्धार कर दिया। जिसके हाथ, पैर और मन अपने वशमें हैं तथा जो विद्या, तपस्या और कीर्तिसे सम्पन्न है, वही तीर्थके पूर्ण फलका भागी होता है। जो प्रतिग्रहसे दूर रहता है और जो कुछ मिल जाय, उसीसे संतुष्ट होता है तथा जिसमें अहंकारका सर्वथा अभाव है, वह तीर्थके फलका भागी होता है। जो संकल्परहित प्रवृत्तिशून्य, स्वल्पाहारी, जितेन्द्रिय तथा सब प्रकारकी आसक्तियोंसे युक्त है, वह तीर्थके फलका भागी होता है। धीर पुरुष श्रद्धा और एकाग्रतापूर्वक यदि तीर्थोंमें भ्रमण करता है तो वह पापी होनेपर भी उस पापसे शुद्ध हो जाता है। फिर जो शुद्ध कर्म करनेवाला है, उसके लिये तो कहना ही क्या है? अश्रद्धालु, पापपीड़ित, नास्तिक, संशयात्मा और केवल युक्तिवादी—ये पाँच प्रकारके मनुष्य तीर्थ-फलके भागी नहीं होते। पापी मनुष्योंके तीर्थमें जानेसे उनके पापकी शान्ति होती है। जिनका अन्तःकरण शुद्ध है, ऐसे मनुष्योंके लिये तीर्थ यथोक्त फलको देनेवाला है। जो काम, क्रोध और लोभको जीतकर तीर्थमें प्रवेश करता है, उसे उस तीर्थयात्रासे कोई भी वस्तु अलभ्य नहीं रहती। जो यथोक्त विधिसे तीर्थयात्रा करते हैं, सम्पूर्ण द्वन्द्वोंको सहन करनेवाले वे धीर पुरुष स्वर्गगामी होते हैं। गङ्गा आदि तीर्थोंमें मछलियाँ निवास करती हैं, पक्षीगण देवालयमें वास करते हैं; किंतु उनके चित्त भक्तिभावसे रहित होनेके कारण तीर्थसेवन तथा श्रेष्ठ देवमन्दिरमें रहनेसे कोई फल नहीं पाते। अतः हृदयकमलमें भावका संग्रह करके एकाग्रचित्त हो तीर्थोंका सेवन करना चाहिये।

मुनीश्वरोंने तीन प्रकारकी तीर्थयात्रा बतायी है—कृत, प्रयुक्त तथा अनुमोदित। ब्रह्मचारी बालक संयमपूर्वक गुरुकी आज्ञामें संलग्न रहकर उक्त तीनों प्रकारकी तीर्थयात्राको विधिपूर्वक सम्पन्न कर लेता है। (अर्थात् ब्रह्मचर्यपालन, इन्द्रियसंयम तथा गुरु-सेवनसे उसको गुरुकुलमें ही तीर्थयात्राका पूरा फल मिल जाता है।) जो कोई भी पुरुष तीर्थयात्राको जाय, वह पहले घरमें ही रहकर पूर्ण संयमका अभ्यास करे और पवित्र एवं सावधान होकर भक्तिभावसे विनम्र हो गणेशजीकी पूजा करे। तत्पश्चात् देवताओं, पितरों, ब्राह्मणों तथा साधुपुरुषोंका भी अपने वैभव और शक्तिके अनुसार प्रयत्नपूर्वक सत्कार करे। बुद्धिमान् ब्राह्मण तीर्थयात्रासे लौटनेपर भी पुनः पूर्ववत् देवताओं, पितरों और ब्राह्मणोंका पूजन करे। ऐसा करनेपर उसे तीर्थसे जिस फलकी प्राप्ति बतायी गयी है, वह सब यहाँ प्राप्त होता है। प्रयागमें, तीर्थयात्रामें तथा माता-पिताकी मृत्यु होनेपर अपने केशोंका मुण्डन करा देना चाहिये। ऐसा कोई कारण न होनेपर व्यर्थ ही सिर न मुड़ाये। जो गया जानेको उद्यत हो, वह विधिपूर्वक श्राद्ध करके तीर्थयात्रीका वेश बना ले और अपने समूचे गाँवकी परिक्रमा करे। उसके बाद प्रतिदिन किसीसे प्रतिग्रह न लेकर पैदल यात्रा करे। गया जानेवाले पुरुषको पग-पगपर अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है। जो ऐश्वर्यके अभिमानसे अथवा लोभ या मोहसे किसी सवारी* द्वारा यात्रा करता है, उसकी वह तीर्थयात्रा


* मूलमें 'यान' शब्द आया है, अपने यहाँ 'यान' उस सवारीके लिये प्रयुक्त हुआ करता है जो किसी-न-किसी जीवद्वारा खींची या ढोयी जाती है। जैसे नरयान, अश्वयान, वृषभयान आदि। मूलमें आगे इन्हींका नाम लेकर दोष कहा गया है। अतः वर्तमान रेलगाड़ी या मोटरके लिये निषेध नहीं मानना चाहिये। फिर भी जो सर्वथा पैदल यात्रा कर सके, उसीकी यात्रा सर्वोत्तम कही जायगी।

७२२ * संक्षिप्त नारदपुराण *


निष्फल है। इसलिये सवारीका त्याग करे। गोयान (बैलगाड़ी आदि)-पर तीर्थमें जानेसे गोवधका पाप कहा गया है। अश्वयान (घोड़े या एक्के-ताँगे आदि)-पर जानेसे वह यात्रा निष्फल होती है। तथा नरयान (पालकी, रिक्शा आदि)-पर जानेसे तीर्थका आधा फल मिलता है; किंतु पैदल चलनेसे चौगुने फलकी प्राप्ति होती है। वर्षा और धूप आदिमें छाता लगाकर डंडा हाथमें लेकर चले और कंकड़ तथा काँटोंमें शरीरको कष्टसे बचानेकी इच्छासे मनुष्य सदा जूता पहनकर चले। जो दूसरेके धनसे तीर्थयात्रा करता है, उसे पुण्यका सोलहवाँ अंश प्राप्त होता है तथा जो दूसरे कार्यके प्रसंगसे तीर्थमें जाता है, उसे उसका आधा फल मिलता है। तीर्थमें ब्राह्मणकी कदापि परीक्षा न करे। वहाँ याचकरूपसे आये हुए ब्राह्मणको भी भोजन कराना चाहिये, ऐसा मनुका कथन है। तीर्थमें किया हुआ श्राद्ध पितरोंके लिये तृप्तिकारक बताया गया है। समयमें या असमयमें मनुष्य जब भी तीर्थमें पहुँचे तभी उसे तीर्थश्राद्ध और पितृतर्पण अवश्य करना चाहिये।

पृथ्वीपर जो तीर्थ हैं, वे साधारण भूमिकी अपेक्षा अधिक पुण्यमय क्यों हैं? इसका कारण सुनो—जैसे शरीरके कुछ अवयव प्रधान माने गये हैं, उसी प्रकार पृथ्वी, जल और तेजके प्रभावसे तथा मुनियोंके संगठनसे तीर्थोंको अधिक पवित्र कहा गया है। देवि! जो गङ्गाजीके समीप जाकर मुण्डन नहीं कराता, उसका समस्त शुभ कर्म नहीं किये हुएके समान हो जाता है। सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गाजीके समीप जानेपर कल्पभरके पापोंका संग्रह मनुष्यके केशोंका आश्रय लेकर स्थित होता है। अतः उन केशोंका त्याग कर देना चाहिये। मनुष्यके जितने नख और रोएँ गङ्गाजीके जलमें गिरते हैं, उतने सहस्र वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। सती मोहिनी! जिसके पिता जीवित हैं, वह विधिज्ञ पुरुष तीर्थमें जानेपर क्षौर तो करावे, परंतु मूँछ न मुड़ावे।


प्रयागमें माघ-मकरके स्नानकी महिमा तथा वहाँके भिन्न-भिन्न तीर्थोंका माहात्म्य

पुरोहित वसु कहते हैं—मोहिनी! सुनो, अब मैं प्रयागके वेदसम्मत माहात्म्यका वर्णन करता हूँ, जहाँ स्नान करके मानव सर्वथा शुद्ध हो जाता है। गङ्गामें जहाँ-कहीं भी स्नान किया जाय, यह कुरुक्षेत्रके समान पुण्यदायिनी है। उससे दसगुना पुण्य देनेवाली गङ्गा वह बतायी गयी है, जहाँ वह विन्ध्यपर्वतसे संयुक्त होती है। काशीकी उत्तरवाहिनी गङ्गा विन्ध्यपर्वतके निकटवर्तिनी गङ्गासे सौगुनी पुण्यदायिनी कही गयी है। काशीसे भी सौ गुना पुण्य वहाँ बताया गया है, जहाँ गङ्गा यमुनासे मिलती है। वह भी जहाँतक पश्चिमवाहिनी हैं, वहाँ उसमें सहस्रगुना पुण्य प्राप्त होता है। देवि! पश्चिमवाहिनी गङ्गा दर्शनमात्रसे ही ब्रह्महत्या आदि पापोंका निवारण करनेवाली है। देवि! पश्चिमाभिमुखी गङ्गा यमुनाके साथ मिली हैं। वे सौ कल्पोंका पाप हर लेती हैं। माघ मासमें तो वे और भी दुर्लभ हैं। भद्रे! पृथ्वीपर वे अमृतरूप कही जाती हैं। गङ्गा और यमुनाके सङ्गमका जल 'वेणी'के नामसे प्रसिद्ध है, जिसमें माघ मासमें दो घड़ीका स्नान देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। सती! पृथ्वीपर जितने तीर्थ तथा जितनी पुण्यपुरियाँ हैं, वे मकर राशिपर सूर्यके रहते हुए माघ मासमें वेणीमें स्नान करनेके लिये आती हैं। शुभे! ब्रह्मपुत्री मोहिनी! ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, रुद्र, आदित्य, मरुद्गण, गन्धर्व, लोकपाल, यक्ष, किन्नर, गुह्यक, अणिमादि गुणोंसे युक्त अन्यान्य तत्त्वदर्शी पुरुष, ब्रह्माणी, पार्वती, लक्ष्मी, शची, मेधा, अदिति, रति, समस्त देवपत्नियाँ, नागपत्नियाँ तथा

  • उत्तरभाग * ७२३

समस्त पितृगण—ये सब-के-सब माघ मासमें त्रिवेणी-स्नानके लिये आते हैं। सत्ययुगमें तो उक्त सभी तीर्थ प्रत्यक्षरूप धारण करके आते थे, किंतु कलियुगमें वे छिपे रूपसे आते हैं। पापियोंके सङ्गदोषसे काले पड़े हुए सम्पूर्ण तीर्थ प्रयागमें माघ मासमें स्नान करनेसे श्वेत वर्णके हो जाते हैं।

मकरस्थे रवौ माघे गोविन्दाच्युत माधव ॥
स्नानेनानेन मे देव यथोक्तफलदो भव।
(ना० उत्तर० ६३। १३-१४)

‘गोविन्द ! अच्युत ! माधव ! देव ! मकर राशिपर सूर्यके रहते हुए माघ मासमें त्रिवेणीके जलमें किये हुए मेरे इस स्नानसे संतुष्ट हो आप शास्त्रोक्त फल देनेवाले हों।’

—इस मन्त्रका उच्चारण करके मौनभावसे स्नान करे। ‘वासुदेव, हरि, कृष्ण और माधव’ आदि नामोंका बार-बार स्मरण करे। मनुष्य अपने घरपर गरम जलसे साठ वर्षोंतक जो स्नान करता है, उसके समान फलकी प्राप्ति सूर्यके मकर राशिपर रहते समय एक बारके स्नानसे हो जाती है। बाहर बावड़ी आदिमें किया हुआ स्नान बारह वर्षोंके स्नानका फल देनेवाला है। पोखरेमें स्नान करनेपर उससे दूना और नदी आदिमें स्नान करनेपर चौगुना फल प्राप्त होता है। देवकुण्डमें वही फल दसगुना और महानदीमें सौगुना होता है। दो महानदियोंके संगममें स्नान करनेपर चार सौ गुने फलकी प्राप्ति होती है; किंतु सूर्यके मकर राशिपर रहते समय प्रयागकी गङ्गामें स्नान करनेमात्रसे वह सारा फल सहस्रगुना होकर मिलता है—ऐसा बताया गया है। इस प्रयाग तीर्थको पूर्वकालमें ब्रह्माजीने प्रकट किया था। जिसके गर्भमें सरस्वती छिपी हैं, वह श्वेत और श्याम जलकी धारा ब्रह्मलोकमें जानेका मार्ग है। हिमालयकी घाटियोंमें जो तीर्थ हैं, उनमें माघ मासका स्नान सब पापोंका नाश करनेवाला है। सब मासोंमें उत्तम माघ मास यदि बदरीवनमें प्राप्त हो तो वह मोक्ष देनेवाला है। नर्मदाके जलमें माघका स्नान पापनाशक, दुःखहारी, सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंका दाता तथा रुद्रलोककी प्राप्ति करानेवाला कहा गया है। सरस्वतीके जलमें वह सब पापराशियोंका नाशक तथा सम्पूर्ण लोकोंके सुखोंकी प्राप्ति करानेवाला बताया गया है। गङ्गाका जल यदि माघ मासमें सुलभ हो तो वह पापरूपी ईंधनको जलानेके लिये दावानल, गर्भवासके कष्टका नाश करनेवाला तथा विष्णुलोक एवं मोक्षकी प्राप्ति करानेवाला बताया गया है।

सरयू, गण्डकी, सिन्धु, चन्द्रभागा, कौशिकी, तापी, गोदावरी, भीमा, पयोष्णी, कृष्णवेणी, कावेरी, तुङ्गभद्रा तथा अन्य जो समुद्रगामिनी नदियाँ हैं, उनमें स्नान करनेवाला मनुष्य पापरहित हो स्वर्गलोकमें जाता है। नैमिषारण्यमें माघ-स्नान करनेसे भगवान् विष्णुका सारूप्य प्राप्त होता है। पुष्करमें नहानेसे ब्रह्माका सामीप्य मिलता है। विधिनन्दिनि ! गोमतीमें माघ नहानेसे फिर जन्म नहीं होता। हेमकूट, महाकाल, ॐकार, नीलकण्ठ तथा अर्बुद तीर्थमें माघ मासका स्नान रुद्रलोककी प्राप्ति करानेवाला माना गया है। देवि ! सूर्यके मकर राशिपर रहते समय सम्पूर्ण सरिताओंके संगममें माघ-स्नान करनेसे सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति होती है। स्वर्गवासी देवता सदा यह गाया करते हैं कि ‘क्या प्रयागमें कभी माघ मास हमें मिलेगा, जहाँ स्नान करनेवाले मानव फिर कभी गर्भकी वेदनाका अनुभव नहीं करते और भगवान् विष्णुके समीप स्थित होते हैं।’ जल और वायु पीकर रहने, पत्ते चबाने, देह सुखाने, दीर्घकालतक घोर तपस्या करने और योग साधनेसे मनुष्य जिस गतिको प्राप्त होते हैं, उसे प्रयागके स्नानमात्रसे ही पा लेते हैं। प्रयागमण्डलका विस्तार पाँच योजन है। सुभगे ! वहाँ तीन कुण्ड हैं। उनके बीचमें

७२४ * संक्षिप्त नारदपुराण *


गङ्गा हैं। प्रयागमें प्रवेश करनेमात्रसे पापोंका तत्काल नाश हो जाता है। जो पवित्र है, वह मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर, हिंसासे दूर हो यदि श्रद्धापूर्वक स्नान करता है तो पापमुक्त होता और परम पदको प्राप्त करता है। नैमिष, पुष्कर, गोतीर्थ, सिन्धुसागरसंगम, गया, धेनुक और गङ्गासागरसंगम—ये तथा और भी जो बहुत-से पुण्यमय पर्वत हैं, वे सब मिलकर तीन करोड़ दस हजार तीर्थ प्रयागमें विद्यमान हैं। सूर्यपुत्री यमुनादेवी तीनों लोकोंमें विख्यात हैं। वे लोकपावनी यमुना प्रयागमें गङ्गासे मिली हैं। गङ्गा और यमुनाके बीचका भू-भाग पृथ्वीपर सर्वोत्तम माना गया है। सुन्दरी! तीनों लोकोंमें प्रयागसे बढ़कर परम पवित्र तीर्थ नहीं है। प्रयाग परम पद-स्वरूप है। उसका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाते हैं।

अतः सम्पूर्ण देवताओंसे सुरक्षित प्रयागतीर्थमें जाकर जो ब्रह्मचर्यका पालन तथा देवता और पितरोंका तर्पण करते हुए एक मासतक वहाँ निवास करता है, वह जहाँ-कहीं भी रहकर सम्पूर्ण मनोवाञ्छित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। गङ्गा और यमुनाका संगम सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात है। वहाँ शक्तिपूर्वक स्नान करनेसे जिसके-जिसके मनमें जो-जो कामना होती है। उसकी वह कामना अवश्य पूर्ण हो जाती है। हरिद्वार, प्रयाग और गङ्गासागरसंगममें स्नान करनेमात्रसे मनुष्य अपनी रुचिके अनुसार ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवके धाममें चला जाता है। सुलोचने! माघ मासमें सितासितसंगमके जलमें जो स्नान किया जाता है, वह सौ कोटि कल्पोंमें भी कभी पुनरावृत्तिका अवसर नहीं देता। जो सत्यवादी तथा क्रोधको जीतनेवाला है, जो उच्चकोटिकी अहिंसाका आश्रय ले चुका है, जो धर्मका अनुसरण करनेवाला, तत्त्वज्ञ, गौ-ब्राह्मणके हितमें तत्पर रहनेवाला है तथा गङ्गा-यमुनाके सङ्गममें स्नान करनेवाला है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।

वहाँ प्रतिष्ठानपुर (झूँसी)-में एक अत्यन्त विख्यात कूप है। वहाँ मनको संयममें रखकर स्नान करनेके पश्चात् देवताओं और पितरोंका तर्पण करे और ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए क्रोधको जीते। इस प्रकार जो तीन रात वहाँ निवास करता है, वह सब पापोंसे शुद्धचित्त हो अश्वमेध-यज्ञका फल पाता है। प्रतिष्ठानसे उत्तर और भागीरथीसे पूर्व 'हंस-प्रतपन' नामक लोकविख्यात तीर्थ है। वहाँ स्नान करनेमात्रसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है और जबतक चन्द्रमा और सूर्य रहते हैं, तबतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। तदनन्तर वासुकिनागसे उत्तर भोगवतीके पास जाकर दशाश्वमेधतीर्थ है। वह परम उत्तम माना गया है। वहाँ स्नान करके मनुष्य अश्वमेध-यज्ञका फल पाता है और इहलोकमें धनाढ्य, रूपवान्, दक्ष, दाता एवं धार्मिक होता है। चारों वेदोंका स्वाध्याय करनेवाले पुरुषोंको

उत्तरभाग ७२५

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जो पुण्य प्राप्त होता है, सत्यवादियोंको जो फल मिलता है और अहिंसाके पालनसे जो धर्म होता है, उन सबका फल दशाश्वमेधतीर्थमें जानेमात्रसे मिल जाता है। पायतीके उत्तर और प्रयागके दक्षिण तटपर ‘ऋणमोचन’ नामक तीर्थ है, जो परम उत्तम माना गया है। वहाँ स्नान करके एक रात रहनेसे मनुष्य सब ऋणोंसे मुक्त हो जाता है और देवता होकर स्वर्गलोकमें जाता है।

प्रयागमें मुण्डन करावे, गयामें पिण्डदान करे, कुरुक्षेत्रमें दान दे और काशीमें शरीरका त्याग करे। मनुष्योंके सब पाप केशोंकी जड़का आश्रय लेकर टिके रहते हैं, अतः तीर्थमें स्नान करनेके पहले उन सबका वहाँ मुण्डन करा दे। यदि पौष और माघके महीनेमें श्रवण नक्षत्र, व्यतीपात योग तथा रविवारसे युक्त अमावास्या तिथि हो तो उसे ‘अर्धोदय’ पर्व समझना चाहिये। इसका महत्त्व सौ सूर्यग्रहणोंसे भी अधिक है। विधिनन्दिनि ! इसमें कुछ कमी हो तो ‘महोदय’ पर्व माना गया है। यदि प्रयागतीर्थमें अरुणोदयके समय माघ शुक्ला सप्तमी प्राप्त हो तो वह एक हजार सूर्यग्रहणोंके समान है। यदि अयनारम्भके दिन प्रयागका स्नान मिले तो कोटिगुना पुण्य होता है और विषुव योगमें लाखगुने फलकी प्राप्ति होती है। षडशीति तथा विष्णुपदीमें सहस्रगुना पुण्य प्राप्त होता है। अपने वैभव-विस्तारके अनुसार सबको प्रयागमें दान करना चाहिये। विधिनन्दिनि ! इससे तीर्थका फल बढ़ता है। भद्रे ! जो गङ्गा और यमुनाके बीचमें सुवर्ण, मणि, मोती या दूसरा कोई प्रतिग्रह देता है एवं जो वहाँ लाल या कपिल वर्णकी ऐसी गौ देता है, जिसकी सींगमें सोना, खुरोंमें चाँदी, गलेमें वस्त्र हो, जो दूध देती हो और बछड़ा उसके साथ हो; शुक्ल वस्त्र धारण करनेवाले, शान्त, धर्मज्ञ, वेदज्ञ एवं श्रोत्रिय ब्राह्मणको विधिपूर्वक जो पूर्वोक्त गौ देकर स्वीकार कराता है तथा उसके साथ बहुमूल्य वस्त्र और नाना प्रकारके रत्न भी देता है; उस गौ तथा बछड़ेके शरीरमें जितने रोमकूप होते हैं, उतने सहस्र वर्षोंतक वह दाता स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। उस दानकर्मसे दाता लोग कभी नरकका दर्शन नहीं करते। सामान्य लाखों गौओंकी अपेक्षा एक ही दूध देनेवाली गौ दान करे। वह एक ही गौ स्त्री-पुत्र तथा भृत्यवर्गका उद्धार कर देती है। इसलिये सब दानोंमें गोदानका महत्त्व अधिक है। दुर्गम स्थानमें, विषम परिस्थितिमें तथा घोर संकटके समय अथवा महापातकोंके संक्रमणकालमें गौ ही मनुष्यकी रक्षा करती है। अतः श्रेष्ठ ब्राह्मणको गौ देनी चाहिये।

तीर्थमें तथा पुण्यमय देवमन्दिरोंमें दान नहीं लेना चाहिये। ब्राह्मणको चाहिये कि वह सभी निमित्तोंमें सावधान रहे। अपने कामके लिये, पितरोंके श्राद्धके लिये अथवा देवताके पूजनके लिये भी किसीसे कुछ दान न ले। जबतक वह दूसरेके धनका उपभोग या ग्रहण करता है, तबतक उसका तीर्थसेवन व्यर्थ होता है। जो गङ्गा और यमुनाके सङ्गमपर कन्यादान करता है, वह उस पुण्यकर्मके प्रभावसे कभी भयंकर नरकका दर्शन नहीं करता। प्रयाग-प्रतिष्ठानसे लेकर वासुकि-नागके तालाबसे आगेतक ‘कम्बल’ और ‘अश्वतर’ नामक जो दोनों नाग हैं, वहाँसे बहुमूलक नागतकका जो भूभाग है, यही प्रजापतिक्षेत्र है, जो तीनों लोकोंमें विख्यात है। इस क्षेत्रमें जो स्नान करते हैं, वे स्वर्गमें जाते हैं और मर जाते हैं, उनका फिर जन्म नहीं होता। सन्मार्गमें स्थित बुद्धिमान् योगीको जो गति प्राप्त होती है, वही गङ्गा-यमुनाके सङ्गममें प्राणत्याग करनेवालेको भी मिलती है।

प्रयागके दक्षिण यमुना-तटपर विख्यात अग्नितीर्थ है। पश्चिममें धर्मराजतीर्थ है। वहाँ जो स्नान करते

७२६ * संक्षिप्त नारदपुराण *


हैं, वे स्वर्गमें जाते हैं और जो मरते हैं, उनका फिर संसारमें जन्म नहीं होता। मोहिनी! यमुनाके उत्तर तटपर बहुत-से पापनाशक तीर्थ हैं, जो बड़े-बड़े मुनीश्वरोंसे सेवित हैं, उनमें स्नान करनेवाले स्वर्ग-लोकको जाते हैं और जो मर जाते हैं, उनका मोक्ष हो जाता है। गङ्गा और यमुना दोनोंका पुण्यफल एक समान है। केवल जेठी होनेसे गङ्गा सर्वत्र पूजी जाती हैं।

कुरुक्षेत्र-माहात्म्य

मोहिनी बोली— पुरोहितजी! आप बड़े कृपालु और धर्मज्ञ हैं। आपको बहुत-से विषयोंका ज्ञान है। आपने मुझे तीर्थराज प्रयागका माहात्म्य बताया है। समस्त मुख्य तीर्थोंमें जो शुभकारक कुरुक्षेत्र है, वह सम्पूर्ण लोकोंमें परम पवित्र है, अतः आप उसीका मुझसे वर्णन कीजिये।

पुरोहित वसुने कहा— मोहिनी! सुनो; मैं उत्तम पुण्य देनेवाले कुरुक्षेत्रका वर्णन करता हूँ, जहाँ जाकर स्नान करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। कुरुक्षेत्रमें मुनीश्वरोंद्वारा सेवित अनेक तीर्थ हैं। उन सबका मैं तुम्हें परिचय देता हूँ। वे श्रोताओंको भी मोक्ष देनेवाले हैं। ब्रह्मज्ञान, गयाश्राद्ध, गायको संकटसे बचाते समय मृत्युको प्राप्त होना और कुरुक्षेत्रमें निवास करना—इन चारों साधनोंसे मोक्ष प्राप्त होता है। सरस्वती और दृषद्वती—इन दोनों देवनदियोंके बीचका जो देश है, उसे देवसेवित 'ब्रह्मावर्त' (कुरुक्षेत्र) कहते हैं। जो दूर रहकर भी 'मैं कुरुक्षेत्रमें जाऊँगा और वहीं निवास करूँगा', इस प्रकार सदा कहा करता है, वह भी पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो धीर पुरुष वहाँ सरस्वतीके तटपर निवास करेगा, उसे निस्सन्देह ब्रह्मज्ञान प्राप्त होगा। देवि! देवता, महर्षि और सिद्धगण कुरुक्षेत्रका सेवन करते हैं; उसके सेवनसे मनुष्य अपने-आपमें ही ब्रह्मका साक्षात्कार करता है।

पहले उस स्थानपर पुण्यमय ब्रह्मसरोवर प्रकट हुआ। तत्पश्चात् वहाँ परशुरामकुण्ड हुआ और उसके बाद वह कुरुक्षेत्रके नामसे प्रसिद्ध हुआ। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने जिसका निर्माण किया था, वह सरोवर आज भी वहाँ स्थित है। तदनन्तर जो यह ब्रह्मवेदी है, वह उसकी बाह्यदिशामें स्थित है। मुनिवर मार्कण्डेयने जहाँ उत्तम तपस्या की, वहाँ प्लक्ष (पाकरके वृक्ष)-से प्रकट होकर सरस्वती नदी आयी है। धर्मात्मा मुनिने सरस्वतीका पूजन करके उनकी स्तुति की। वहाँ उनके समीप जो तालाब था, उसको अपने जलसे भरकर सरस्वती नदी पश्चिम दिशाकी ओर चली गयीं। तदनन्तर राजा कुरुने आकर चारों ओरसे उस क्षेत्रको हलसे जोता। उसका विस्तार पाँच योजनका था। वहाँ दया, सत्य और क्षमा आदि गुणोंका उद्गम है। तभीसे समन्तपञ्चक नामक क्षेत्रको कुरुक्षेत्र कहा जाने लगा। देवि! यहाँ स्नान करनेवाले मानव अक्षय पुण्य लाभ करते हैं और वहाँ मरे हुए लोग विमानपर बैठकर ब्रह्मलोकमें जाते हैं। कुरुक्षेत्रमें उपवास, दान, होम, जप और देवपूजन—ये सब अक्षयभावको प्राप्त होते हैं। कुरुक्षेत्रकी ब्रह्मवेदीमें मरे हुए मनुष्य फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेते। मोहिनी! जो कुरुक्षेत्रके वनों, तीर्थों और सरिताओंकी पुण्यदायिनी यात्रा करता है, उसके लिये इहलोक और परलोकमें भी कोई कमी नहीं रहती।

उत्तरभाग

  • उत्तरभाग * ७२७

कुरुक्षेत्रके वन, नदी और भिन्न-भिन्न तीर्थोंका माहात्म्य तथा यात्राविधिका क्रमिक वर्णन

मोहिनीने पूछा—विप्रवर! कुरुक्षेत्रमें कौन-कौन-से वन हैं और कौन-सी शुभकारक सरिताएँ हैं? सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाली कुरुक्षेत्र-यात्राकी विधि मुझे क्रमसे बताइये। अत्यन्त पुण्यदायक कुरुक्षेत्रमें जो-जो तीर्थ हैं, उन सबका मुझसे वर्णन कीजिये।

पुरोहित वसु बोले—मोहिनी! पवित्र काम्यकवन, महान् अदितिवन, पुण्यदायक व्यासवन, फलकीवन, सूर्यवन, पुण्यमय मधुवन तथा सुविख्यात सीतावन— कुरुक्षेत्रमें ये सात वन हैं और उन वनोंमें अनेक तीर्थ हैं। पुण्यसलिला सरस्वती नदी, वैतरणी नदी, पुण्यमयी मन्दाकिनी गङ्गा, मधुस्रवा, दृषद्वती, कौशिकी तथा पुण्यमयी हैरण्वती नदी—इनमें सरस्वती नदीको छोड़कर शेष सब नदियाँ केवल वर्षाकालमें बहनेवाली हैं। इनका जल स्पर्श करने, पीने एवं नहानेके लिये सदा पवित्र माना गया है। पुण्यक्षेत्रके प्रभावसे इनमें रजस्वलापनका दोष नहीं आता। पहले महाबली द्वारपाल रन्तुकके समीप जाकर यक्षको प्रणाम करके वहाँकी यात्रा प्रारम्भ करे। भद्रे! तदनन्तर पुण्यमय महान् अदितिवनमें जाय। यदि नारी वहाँ स्नान करके देवमाता अदितिकी पूजा करे तो वह समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त और महान् शूरवीर पुत्रको जन्म देती है। वरारोहे! वहाँसे भगवान् विष्णुके परम उत्तम विमल नामसे विख्यात तीर्थस्थानको जाय, जहाँ भगवान् श्रीहरि सदा विद्यमान रहते हैं। जो मनुष्य विमलतीर्थमें स्नान करके भगवान् विमलेश्वरका दर्शन करता है, वह विमल होकर देवाधिदेव चक्रधारी भगवान् विष्णुके लोकको प्राप्त कर लेता है। मोहिनी! वहाँ भगवान् श्रीहरि और बलदेवजीको एक आसनपर बैठे देखकर मनुष्य सब पापोंसे तत्काल मुक्त हो जाता है।

फिर वहाँके लोकविख्यात पारिप्लवतीर्थमें जाय; वहाँ स्नान और जलपान करके जो वेदोंके पारङ्गत विद्वान् ब्राह्मणको दक्षिणा आदिसे संतुष्ट करता है, वह ब्रह्मयज्ञका फल पाता है। भद्रे! जहाँ कौशिकी नदीका पापनाशक सङ्गम है, वहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करके मनुष्य प्रियजनोंका सङ्ग पाता है। महाभागे! तदनन्तर क्षमाशील मनुष्य पृथ्वीतीर्थमें जाकर भक्तिपूर्वक स्नान करे तो वह उत्तम गतिको पाता है। पुरुषके द्वारा इस पृथ्वीपर जितने अपराध किये गये हैं, उन सबको देहधारी जीवके वहाँ स्नान करनेपर पृथ्वीदेवी क्षमा कर देती हैं। तत्पश्चात् परम पुण्यमय दक्षके आश्रममें दक्षेश्वर शिवका दर्शन करनेसे मनुष्यको अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। उसके बाद शालकिनीतीर्थमें जाय और वहाँ अपने मनोरथकी सिद्धिके लिये भगवान् शिवसे संयुक्त हुए श्रीहरिका पूजन करे। तत्पश्चात् विधिको जाननेवाला पुरुष नागतीर्थमें जाकर स्नान करे और वहाँ घी तथा दही खाकर नागोंसे अभय प्राप्त करे। उसके बाद त्रिभुवनविख्यात पञ्चनदतीर्थको जाय। वहाँ भगवान् शङ्करने असुरोंको डरानेवाले पाँच सिंहनाद किये थे; इससे वह सम्पूर्ण पातकोंका नाश करनेवाला तीर्थ 'पञ्चनद' नामसे विख्यात हुआ। वहाँ स्नान और दानसे मनुष्य निर्भय हो जाता है। मोहिनी! तत्पश्चात् कोटि-तीर्थमें जाय, जहाँ महात्मा रुद्रने कोटि तीर्थोंको लाकर स्थापित किया था। उस तीर्थमें स्नान और कोटीश्वर शिवका दर्शन करके मनुष्य तभीसे पञ्चयज्ञजनित पुण्यका सदैव लाभ करता रहता है। वहीं सम्पूर्ण देवताओंने भगवान् वामनकी भी स्थापना की है। अतः उनका पूजन करके मानव अग्निष्टोम-यज्ञका फल पा लेता है। वहाँसे

७२८* संक्षिप्त नारदपुराण *

अश्वितीर्थमें जाकर श्रद्धालु एवं जितेन्द्रिय पुरुष वहाँ स्नान करे। इससे वह यशस्वी तथा रूपवान् होता है। वहाँसे भगवान् विष्णुद्वारा निर्मित वाराहतीर्थमें जाकर श्रद्धापूर्वक डुबकी लगानेवाला मनुष्य उत्तम गतिको पाता है। वरानने! वहाँसे सोमतीर्थमें जाय, जहाँ सोम तपस्या करके नीरोग हुए थे। वहाँ स्नान करना चाहिये। उस तीर्थमें एक गोदान करके मनुष्य राजसूय यज्ञका फल पाता है। वहीं भूतेश्वर, ज्वालामालेश्वर तथा ताण्डेश्वर शिव-लिङ्ग हैं। उनकी पूजा करके मनुष्य फिर संसारमें जन्म नहीं लेता। एकहंस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य सहस्र गोदानका फल पाता है और कृतशौचतीर्थमें स्नान करनेपर उसे पुण्डरीक-यज्ञका फल प्राप्त होता है। तदनन्तर भगवान् शिवके मुञ्जवट नामक तीर्थमें जाकर वहाँ एक रात निवास करे। फिर दूसरे दिन भगवान् शिवकी पूजा करके वह उनके गणोंका अधिपति होता है। तदनन्तर उस तीर्थमें परिक्रमा करके पुष्करतीर्थमें जाय। वहाँ स्नान और पितरोंका पूजन करके मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। तदनन्तर रामह्रदको जाय और वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका पूजन (तर्पण) आदि करे। इससे वह भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त कर लेता है। जो उत्तम श्रद्धापूर्वक परशुरामजीकी पूजा करके वहाँ सुवर्ण-दान करता है, वह धनी होता है। वंशमूलतीर्थमें जाकर स्नान करनेसे तीर्थयात्री अपने वंशका उद्धार करता है और कायशोधन-तीर्थमें स्नान करके शुद्धशरीर हो श्रीहरिमें प्रवेश करता है।

तत्पश्चात् लोकोद्धारतीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करके भगवान् जनार्दनका पूजन करे। ऐसा करनेवाला पुरुष उस शाश्वत लोकको प्राप्त होता है, जहाँ सनातन भगवान् विष्णु विराजमान हैं। वहाँसे श्रीतीर्थ एवं परम उत्तम शालग्रामतीर्थमें जाकर, जो वहाँ स्नान करके श्रीहरिका पूजन करता है, वह प्रतिदिन भगवान्‌को अपने समीप विद्यमान देखता है। कपिलाह्रदतीर्थमें जाकर वहाँ स्नान और देवता, पितरोंका पूजन करके मनुष्य सहस्र कपिलादानका पुण्य पाता है। भद्रे! वहाँ जगदीश्वर कपिलका विधिपूर्वक पूजन करके मनुष्य देवताओंकेद्वारा सत्कृत हो साक्षात् भगवान् शिवका पद प्राप्त कर लेता है। तदनन्तर सूर्यतीर्थमें जाकर उपवासपूर्वक भगवान् सूर्यका पूजन करे। इससे यात्री अग्निष्टोम यज्ञका फल पाकर स्वर्गलोकमें जाता है। पृथ्वीके विवरद्वारपर साक्षात् गणेशजी विराजमान हैं। उनका दर्शन और पूजन करके मनुष्य यज्ञानुष्ठानका फल पाता है। देवीतीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको उत्तम रूपकी प्राप्ति होती है और ब्रह्मावर्तमें स्नान करके वह ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर लेता है। सुतीर्थमें स्नान करके देवताओं, ऋषियों, पितरों तथा मनुष्योंका पूजन करनेपर मानव अश्वमेध-यज्ञका फल पाता है। कामेश्वरतीर्थमें श्रद्धापूर्वक स्नान करके सब व्याधियोंसे मुक्त पुरुष शाश्वत ब्रह्मको प्राप्त कर लेता है। देवि! मातृतीर्थमें श्रद्धापूर्वक स्नान और पूजन करनेवाले पुरुषके घर सात पीढ़ियोंतक उत्तम लक्ष्मी बढ़ती रहती है। शुभे! तदनन्तर सीतावन नामक महान् तीर्थमें जाय। वहाँ अपना केश मुँड़ाकर मनुष्य पापसे शुद्ध हो जाता है। वहीं तीनों लोकोंमें विख्यात दशाश्वमेध नामक तीर्थ है, जिसके दर्शनमात्रसे मानव पापमुक्त हो जाता है। विधिनन्दिनि! यदि पुनः मनुष्य-जन्म पानेकी इच्छा हो तो मानुषतीर्थमें जाकर स्नान करना चाहिये। मानुषतीर्थसे एक कोसकी दूरीपर आपगा नामसे विख्यात एक महानदी है। वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको साँवाँकि चावलकी खीर भोजन करावे। ऐसा करनेवाले पुरुषके पापोंका नाश हो जाता है और वहाँ श्राद्ध करनेसे

  • उत्तरभाग * | ७२९ ---|---

पितरोंकी सद्गति होती है। भाद्र*पद मासके कृष्णपक्षमें, जिसे 'पितृपक्ष' एवं 'महालय' भी कहते हैं, चतुर्दशीको मध्याह्नमें आपगाके तटपर पिण्डदान करनेवाला मनुष्य मोक्ष पाता है।

वहाँसे ब्रह्माजीके स्थान ब्राह्मोदुम्बरकतीर्थमें जाय। वहाँ ब्रह्मर्षियोंके कुण्डोंमें स्नान करके मनुष्य सोमयागका फल पाता है। वृद्धकेदारतीर्थमें दण्डीसहित स्थाणुकी पूजा करके कलशीतीर्थमें जाय, जहाँ साक्षात् अम्बिकादेवी विराजमान हैं। वहाँ स्नान करके अम्बिकाजीकी पूजा करनेसे मानव भवसागरके पार हो जाता है। सरकतीर्थमें कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको भगवान् महेश्वरका दर्शन करके श्रद्धालु मनुष्य शिवधाममें जाता है। भामिनि! सरकमें तीन करोड़ तीर्थ हैं। सरोवरके मध्यमें जो कूप है, उसमें कोटि रुद्रोंका निवास है। जो मानव उस सरोवरमें स्नान करके उन कोटिरुद्रोंका स्मरण करता है, उसके द्वारा वे करोड़ों रुद्र पूजित होते हैं। वहीं ईहास्पद नामक तीर्थ है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। उस तीर्थमें जाकर उसके दर्शनमात्रसे मानव मोक्ष प्राप्त कर लेता है। वहाँके देवताओं और पितरोंका पूजन करके वह कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता और मनचाही वस्तुओंको प्राप्त कर लेता है। केदार नामक महातीर्थ मनुष्यके सब पापोंका नाश कर देता है। वहाँ स्नान करके पुरुष सब दानोंका फल पाता है। सरकसे पूर्व दिशामें अन्यजन्म नामसे विख्यात तथा स्वच्छ जलसे भरा हुआ एक सरोवर है, जहाँ भगवान् विष्णु और शिव दोनों स्थित हैं। भगवान् विष्णु तो वहाँ चतुर्भुजरूपसे विराजमान हैं और भगवान् शिव लिङ्गरूपमें स्थित हैं। वहाँ स्नान करके उन दोनोंका दर्शन और स्तवन करनेपर मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर लेता है। तदनन्तर नागह्रदमें जाकर स्नान करे। वहाँ चैत्र शुक्ला पूर्णिमाको श्राद्धका दान करनेवाला पुरुष यमलोक नहीं देखता। उसे मोक्ष प्राप्त हो जाता है। तत्पश्चात् देवसेवित त्रिविष्टपतीर्थमें जाय, जहाँ सब पापोंसे मुक्त करनेवाली वैतरणी नामकी पवित्र नदी है। उसमें स्नान करके शूलपाणि भगवान् वृषभध्वजका पूजन करनेपर सब पापोंसे शुद्धचित्त हो मनुष्य परम गति प्राप्त कर लेता है। रसावर्ततीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको परम उत्तम सिद्धि प्राप्त होती है। चैत्र मासके शुक्लपक्षकी चतुर्दशीको विलेपकतीर्थमें स्नान करके जो भक्ति-भावसे भगवान् शिवकी पूजा करता है, वह सब पापोंसे छूट जाता है।

देवि! तत्पश्चात् मनुष्य परम उत्तम फलकीवनमें जाय, जहाँ देवता और गन्धर्व बड़ी भारी तपस्या करते हैं। वहाँ दृषद्वती नदीमें विधिपूर्वक स्नान करके मनुष्य देवताओं और पितरोंका तर्पण करनेपर अग्निष्टोम और अतिरात्र यज्ञका फल पाता है। जो वहाँ अमावास्या तथा पूर्णिमाको श्राद्ध करता है, उसे गयाश्राद्धके समान उत्तम फल प्राप्त होता है। श्राद्धमें फलकीवनके स्मरणका फल पितरोंको तृप्ति देनेवाला है। तदनन्तर पाणिघाततीर्थमें पितरोंका तर्पण करके मानव राजसूय-यज्ञका फल पाता और सांख्य एवं योगीको भी प्राप्त कर लेता है। तत्पश्चात् मिश्रकतीर्थमें विधिपूर्वक स्नान करके मनुष्य सम्पूर्ण तीर्थोंके फलका भागी होता और उत्तम गति पाता है। वहाँसे व्यासवनमें जाकर जो मनोजवतीर्थमें स्नान और मनीषी प्रभुका दर्शन करता है, वह मनचाही वस्तु प्राप्त कर लेता है। तदनन्तर मधुवनमें जाकर देवीतीर्थमें स्नान करके शुद्ध हुआ मनुष्य देवताओं तथा ऋषियोंकी पूजा करके उत्तम सिद्धि (मोक्ष)


* पूर्णिमान्त मासकी मान्यताके अनुसार पितृपक्ष आश्विनमें पड़ता है। अतः यहाँ भाद्रपदका अर्थ आश्विन समझना चाहिये।

७३०* संक्षिप्त नारदपुराण *
प्राप्त कर लेता है। कौशिकी-सङ्गमतीर्थमें जाकर दृषद्वती नदीमें स्नान करनेवाला पुरुष यदि नियमित आहार करके नियमपूर्वक रहे तो सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। वहाँसे व्यासस्थलीको जाय, वहाँ जानेसे मनुष्य शोकका भागी नहीं होता। किन्दुशू कूपमें जाकर वहाँ सेरभर तिल दान करके मानव परम सिद्धि प्राप्त करता है और मरनेपर मुक्त हो जाता है। आह्र और मुदित—ये दो तीर्थ भूतलपर विख्यात हैं। इनमें स्नान करके शुद्धचित्त हुआ मानव सूर्यलोकको प्राप्त कर लेता है। तदनन्तर मृगमुच्यतीर्थमें जाकर जो गङ्गाको प्रणाम करके स्थित होता है, वह महादेवजीका पूजन करके अश्वमेध-यज्ञका फल पाता है।<br><br>इसके बाद तीनों लोकोंमें विख्यात वामनतीर्थमें जाय, जहाँ बलिके यज्ञमें उनके राज्यको हर लेनेकी इच्छासे भगवान् वामनका प्रादुर्भाव हुआ था। वहाँ विष्णुपदमें स्नान और वामनजीका पूजन करके सब पापोंसे शुद्धचित्त हुआ मनुष्य भगवान् विष्णुके लोकमें प्रतिष्ठित होता है। वहीं सब पातकोंका नाश करनेवाला ज्येष्ठाश्रमतीर्थ है। ज्येष्ठ शुक्ला एकादशीको उपवास करके दूसरे दिन द्वादशीको वहाँ विधिपूर्वक स्नान करनेवाला पुरुष मनुष्योंमें श्रेष्ठता प्राप्त कर लेता है। देवि! उस तीर्थमें किया हुआ श्राद्ध पितरोंको अत्यन्त संतोष देनेवाला होता है। वहीं सूर्यतीर्थ है, उसमें स्नान करके मानव सूर्यलोकका भागी होता है। कुलोत्तारणतीर्थमें जाकर स्नान करनेवाला पुरुष अपने कुलका उद्धार करके कल्पपर्यन्त स्वर्गलोकमें निवास करता है। पवनकुण्डमें स्नान करके भगवान् महेश्वरका दर्शन करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् शिवके धाममें जाता है। हनुमत्तीर्थमें स्नान करके मानव मोक्ष प्राप्त कर लेता है। राजर्षि शालहोत्रके तीर्थमें स्नान करनेसे सब पाप दूर हो जाते हैं। सरस्वतीके श्रीकुम्भ नामक तीर्थमें स्नानकरके यज्ञका भागी होता है। नैमिषकुण्डमें स्नान करनेसे नैमिषारण्यमें स्नानका पुण्य प्राप्त होता है। वेदवतीतीर्थमें स्नान करके नारी सतीधर्मके पालनका पुण्य प्राप्त कर लेती है। ब्रह्मतीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य ब्राह्मणत्व प्राप्त करता है और ब्रह्माजीके उस परम धाममें जाता है, जहाँ जाकर कोई शोक नहीं करता। सोमतीर्थमें स्नान करके मनुष्य स्वर्गीय गति प्राप्त कर लेता है। सप्तसारस्वततीर्थमें जाकर स्नान करनेवाला मनुष्य मोक्षका भागी होता है। सप्तसारस्वततीर्थ वह स्थान है, जहाँ सातों सरस्वतीकी धाराओंका भलीभाँति सङ्गम हुआ है। उन सबके नाम इस प्रकार हैं—सुप्रभा, काञ्चनाक्षी, विशालाक्षी, मनोहरी, सुनन्दा, सुवेणु तथा सातवीं विमलोदका। उसी प्रकार औशनसतीर्थमें स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता है। कपालमोचनमें स्नान करके ब्रह्महत्यारा भी शुद्ध हो जाता है। विश्वामित्र-तीर्थमें स्नान करनेवाला मानव ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लेता है। तदनन्तर पृथूदकतीर्थमें स्नान करके तीर्थसेवी पुरुष भवबन्धनसे मुक्त हो जाता है और अवकीर्णमें स्नान करनेसे उसे ब्रह्मचर्यका फल मिलता है। जो मधुस्रावमें जाकर स्नान करता है, वह पातकोंसे मुक्त हो जाता है। वसिष्ठतीर्थमें स्नान करनेसे वसिष्ठ-लोककी प्राप्ति होती है। अरुणा-सङ्गममें स्नान करके तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य पुनः स्नान करके मोक्षका भागी होता है।<br><br>मोहिनि! वहाँ दूसरा सोमतीर्थ है। उसमें स्नान करके चैत्र शुक्ला षष्ठीको श्राद्ध करनेवाला पुरुष अपने पितरोंका उद्धार कर देता है। पञ्चवटमें स्नान करके योगमूर्तिधारी भगवान् शिवकी विधिपूर्वक पूजा करनेसे मानव देवताओंके साथ आनन्दका भागी होता है। कुरुतीर्थमें स्नान करनेवाला मनुष्य सम्पूर्ण सिद्धियोंको पा लेता है। स्वर्गद्वारमें गोता लगानेवाला मानव स्वर्गलोकमें पूजित होता है।

\ उत्तरभाग ७३१

* उत्तरभाग * ७३१


अनरकतीर्थमें स्नान करनेवाला पुरुष सब पापोंसे छूट जाता है। देवि! तदनन्तर उत्तम काम्यकवनमें जाना चाहिये। जिसमें प्रवेश करते ही सब पापराशियोंसे छुटकारा मिल जाता है। फिर आदित्यवनमें जाकर आदित्यके दर्शनसे ही मानव मोक्षका भागी होता है। रविवारको वहाँ स्नान करके मनुष्य मनोवाञ्छित फल पा लेता है और यज्ञोपवीतिकतीर्थमें स्नान करके वह स्वधर्मफलका भागी होता है। तत्पश्चात् श्रेष्ठ मानव चतुःप्रवाह नामक तीर्थमें स्नान करे। इससे वह सम्पूर्ण तीर्थोंका फल पाकर स्वर्गलोकमें देवताकी भाँति आनन्दित होता है। विहारतीर्थमें स्नान करनेवाला पुरुष सब प्रकारके सुख पाता है। दुर्गातीर्थमें स्नान प्राप्त कर लेता है और शरीरका अन्त होनेपर वह स्वर्गलोकमें जाता है। शुक्रतीर्थमें स्नान करके श्राद्धदान करनेवाला पुरुष अपने पितरोंका उद्धार कर देता है। विशेषतः चैत्र मासके कृष्णपक्षमें अष्टमी या चतुर्दशी तिथिको वहाँ श्राद्ध करना चाहिये। ब्रह्मतीर्थमें उपवास करनेवाला पुरुष निःसन्देह मोक्षका भागी होता है। तदनन्तर स्थाणुतीर्थमें स्नान करके स्थाणुवटका दर्शन करनेसे कुरुक्षेत्रकी यात्रा पूरी हो जाती है।

देवि! मैंने तुम्हें कुरुक्षेत्रका माहात्म्य ठीक-ठीक बताया है। कुरुक्षेत्रके समान दूसरा कोई तीर्थ न हुआ है, न होगा। वहाँ किया हुआ इष्टापूर्त कर्म, तप, विधिपूर्वक होम और दान आदि सब कुछ अक्षय होता है। मन्वादि तिथि, युगादि तिथि, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण, महापात (व्यतीपात), संक्रान्ति तथा अन्य पुण्यपर्वोंके दिन कुरुक्षेत्रमें स्नान करनेवाला पुरुष अक्षय फलका भागी होता है। महात्मा पुरुषोंके कलियुगजनित पापोंका शोधन करनेके लिये ब्रह्माजीने सुखदायक कुरुक्षेत्रतीर्थका निर्माण किया है। जो मनुष्य इस पापनाशक पुण्यकथाका भक्तिभावसे कीर्तन अथवा श्रवण करता है, वह भी सब पापोंसे छूट जाता है। जो मनुष्य सूर्यग्रहणके समय कुरुक्षेत्रमें जो-जो वस्तुएँ देता है, उसी-उसीको वह सदा प्रत्येक जन्ममें पाता है। ब्रह्मपुत्री मोहिनी! बहुत कहनेसे क्या लाभ! मेरा निश्चित विचार सुनो, यदि कोई संसारबन्धनसे मुक्त होना चाहे तो उसे कुरुक्षेत्रका सेवन करना ही चाहिये।

करके मानव कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता। तदनन्तर पितृतीर्थ नामक सरस्वती कूपमें स्नान करके देवता आदिका तर्पण करनेवाला पुरुष उत्तम गतिको पाता है। प्राची सरस्वतीमें स्नान और विधिपूर्वक श्राद्ध करके मनुष्य दुर्लभ कामनाओंको प्राप्त कर लेता है।

७३२ * संक्षिप्त नारदपुराण *

गङ्गाद्वार (हरिद्वार) और वहाँके विभिन्न तीर्थोंका माहात्म्य

**मोहिनी बोली—**द्विजश्रेष्ठ! मैंने आपके मुखसे कुरुक्षेत्रका उत्तम माहात्म्य सुना है। गुरुदेव! अब गङ्गाद्वार नामसे विख्यात जो पुण्यदायक तीर्थ है, उसका वर्णन कीजिये।

**पुरोहित वसुने कहा—**भद्रे! राजा भगीरथके रथके पीछे चलनेवाली अलकनन्दा गङ्गा सहस्रों पर्वतोंको विदीर्ण करती हुई जहाँ भूमिपर उतरी हैं, जहाँ पूर्वकालमें दक्ष प्रजापतिने यज्ञेश्वर भगवान् विष्णुका यजन किया है, वह पुण्यदायक क्षेत्र (हरिद्वार) ही गङ्गाद्वार है, जो मनुष्योंके समस्त पातकोंका नाश करनेवाला है। प्रजापति दक्षके उस यज्ञमें इन्द्रादि सब देवता बुलाये गये थे और वे सब अपने-अपने गणोंके साथ यज्ञमें भाग लेनेकी इच्छासे वहाँ आये थे। शुभे! उसमें देवर्षि, शिष्य-प्रशिष्योंसहित शुद्ध अन्तःकरणवाले ब्रह्मर्षि तथा राजर्षि भी पधारे थे। पिनाकपाणि भगवान् शङ्करको छोड़कर अन्य सब देवताओंको निमन्त्रित किया गया था। वे सब देवता विमानोंपर बैठकर अपनी प्रिय पत्नियोंके साथ दक्ष प्रजापतिके यज्ञोत्सवमें जा रहे थे और प्रसन्नतापूर्वक आपसमें उस उत्सवका वर्णन भी करते थे। कैलासपर रहनेवाली देवी सतीने उनकी बातें सुनीं। सुनकर वे पिताका यज्ञोत्सव देखनेके लिये उत्सुक हुईं। उस समय सतीने महादेवजीसे उस उत्सवमें चलनेकी प्रार्थना की। उनकी बात सुनकर भगवान् शिवने कहा—'देवि! वहाँ जाना कल्याणकर नहीं होगा।' किंतु सतीजी अपने पिताका यज्ञोत्सव देखनेके लिये चल दीं। भद्रे! सतीदेवी वहाँ पहुँच तो गयीं, किंतु किसीने उनका स्वागत-सत्कार नहीं किया। तब तन्वङ्गी सतीने वहाँ अपने प्राण त्याग दिये। अतः वह स्थान एक उत्तम क्षेत्र बन गया है। जो उस तीर्थमें स्नान करके देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करते हैं, वे देवीके अत्यन्त प्रिय होते हैं। वे भोग और मोक्षके प्रधान अधिकारी हो जाते हैं।

तदनन्तर देवर्षि नारदसे अपनी प्रिया सतीजीके प्राणत्यागका समाचार सुनकर भगवान् शङ्करने वीरभद्रको उत्पन्न किया। वीरभद्रने सम्पूर्ण प्रमथगणोंके साथ जाकर उस यज्ञका नाश कर दिया। फिर ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे तुरंत प्रसन्न होकर भगवान् शङ्करने उस विकृत यज्ञको पुनः सम्पन्न किया। तबसे वह अनुपम तीर्थ सम्पूर्ण पातकोंका नाश करनेवाला हुआ। मोहिनी! उस तीर्थमें विधिपूर्वक स्नान करके मनुष्य जिस-जिस कामनाका चिन्तन करता है, उसे अवश्य प्राप्त कर लेता है। जहाँ दक्ष तथा देवताओंने यज्ञोंके स्वामी साक्षात् अविनाशी भगवान् विष्णुका स्तवन किया था, वह स्थान 'हरितीर्थ'के नामसे प्रसिद्ध है। सती मोहिनी! जो मानव उस हरिपदतीर्थ (हरिकी पैंड़ी)-में विधिपूर्वक स्नान करता है, वह भगवान् विष्णुका प्रिय तथा भोग और मोक्षका प्रधान अधिकारी होता है। उससे पूर्व दिशामें त्रिगङ्ग नामसे विख्यात क्षेत्र है, जहाँ सब लोग त्रिपथगा गङ्गाका साक्षात् दर्शन करते हैं। वहाँ स्नान करके देवताओं, ऋषियों, पितरों और मनुष्योंका श्रद्धापूर्वक तर्पण करनेवाले पुरुष स्वर्गलोकमें देवताकी भाँति आनन्दित होते हैं। वहाँसे दक्षिण दिशामें कनखलतीर्थमें जाय। वहाँ दिन-रात उपवास और स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। देवि! जो वहाँ वेदोंके पारङ्गत विद्वान् ब्राह्मणको गोदान देता है, वह कभी वैतरणी नदी और यमराजको नहीं देखता है। वहाँ किये गये जप, होम, तप और दान अक्षय होते हैं।

सुमध्यमे! वहाँसे पश्चिम दिशामें कोटितीर्थ है, जहाँ भगवान् कोटीश्वरका दर्शन करनेसे कोटिगुना पुण्य प्राप्त होता है और एक रात वहाँ निवास

  • उत्तरभाग * | ७३३ ---|---

करनेसे पुण्डरीक यज्ञका फल मिलता है। इसी प्रकार वहाँसे उत्तर दिशामें सप्तगङ्ग (सप्त सरोवर) नामसे विख्यात उत्तम तीर्थ है। देवि! वह सम्पूर्ण पातकोंका नाश करनेवाला है। परम बुद्धिमती मोहिनी ! वहाँ सप्तर्षियोंके पवित्र आश्रम हैं, उन सबमें पृथक्-पृथक् स्नान और देवताओं एवं पितरोंका तर्पण करके मनुष्य ऋषिलोकको प्राप्त होता है। राजा भगीरथ जब देवनदी गङ्गाको ले आये, उस समय उन सप्तर्षियोंकी प्रसन्नताके लिये वे सात धाराओंमें विभक्त हो गयीं। तबसे पृथ्वीपर वह 'सप्तगङ्ग' नामक तीर्थ विख्यात हो गया। भद्रे ! वहाँसे परम उत्तम कपिलाह्रद नामक तीर्थमें जाकर जो श्रेष्ठ ब्राह्मणको धेनु दान करता है, उसे सहस्र गोदानका फल मिलता है। तदनन्तर शन्तनुके ललित नामक उत्तम तीर्थमें जाकर विधिवत् स्नान और देवता आदिका तर्पण करके मनुष्य उत्तम गति पाता है, जहाँ राजा शन्तनुने मनुष्यरूपमें आयी हुई गङ्गाको प्राप्त किया और जहाँ गङ्गाने प्रतिवर्ष एक-एक वसुको जन्म देकर अपनी धारामें उनके शरीरको डलवा दिया था, उन वसुओंका शरीर जहाँ गिरा वहाँ वृक्ष पैदा हो गया। जो मनुष्य वहाँ स्नान करता और उस ओषधिको खाता है, वह गङ्गादेवीके प्रसादसे कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता। वहाँसे भीमस्थल (भीमगोड़ा)-में जाकर जो पुण्यात्मा पुरुष स्नान करता है, वह इस लोकमें उत्तम भोग भोगकर शरीरका अन्त होनेपर स्वर्गलोकमें जाता है। यह संक्षेपसे तुम्हें थोड़ेसे | तीर्थोंका परिचय दिया गया है। जो इस क्षेत्रमें बृहस्पतिके कुम्भ राशिपर और सूर्यके मेषराशिपर रहते समय स्नान करता है, वह साक्षात् बृहस्पति और दूसरे सूर्यके समान तेजस्वी होता है*। प्रयाग आदि पुण्यतीर्थोंमें एवं पृथूदकतीर्थमें जानेपर जो वारुण, महावारुण तथा महामहावारुण योगमें वहाँ विधिपूर्वक स्नान करता है और भक्तिभावसे ब्राह्मणोंका पूजन करता है, वह ब्रह्मपदको प्राप्त होता है। संक्रान्ति, अमावास्या, व्यतीपात, युगादि तिथि तथा और किसी पुण्य दिनको जो वहाँ थोड़ा भी दान करता है, वह कोटिगुना हो जाता है। यह मैंने तुमसे सच्ची बात बतायी है। जो मानव दूर रहकर भी गङ्गाद्वारका स्मरण करता है, वह उसी प्रकार सद्गति पाता है, जैसे अन्तकालमें श्रीहरिको स्मरण करनेवाला पुरुष। मनुष्य शुद्धचित्त होकर हरिद्वारमें जिस-जिस देवताका पूजन करता है, वह-वह परम प्रसन्न होकर उसके मनोरथोंको पूर्ण करता है। जहाँ गङ्गा भूतलपर आयी हैं, वही तपस्याका स्थान है। यही जपका स्थल है और यही होमका स्थान है। जो मनुष्य नियमपूर्वक रहकर तीनों समय स्नान करके वहाँ 'गङ्गासहस्रनाम'का पाठ करता है, वह अक्षय संतति पाता है। महाभागे! जो नियमपूर्वक भक्तिभावसे गङ्गाद्वारमें पुराण सुनता है, वह अविनाशी पदको प्राप्त होता है। जो श्रेष्ठ मानव हरिद्वारका माहात्म्य सुनता है अथवा भक्तिभावसे उसका पाठ करता है, वह भी स्नानका फल पाता है।


बदरिकाश्रमके विभिन्न तीर्थोंकी महिमा

मोहिनी बोली— विप्रवर! आपने गङ्गाद्वारका माहात्म्य बताया, अब बदरीतीर्थके पापनाशक माहात्म्यका वर्णन कीजिये। | पुरोहित वसुने कहा— भद्रे! सुनो; मैं बदरीतीर्थका माहात्म्य बतलाता हूँ; जिसे सुनकर जीव जन्म-मृत्युरूप संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता

७३४ * संक्षिप्त नारदपुराण *


है। भगवान् विष्णुका 'बदरी' नामक क्षेत्र सब पातकोंका नाश करनेवाला है और संसारभयसे डरे हुए मनुष्योंके कलिसम्बन्धी दोषोंका अपहरण करके उन्हें मुक्ति देनेवाला है; जहाँ भगवान् नारायण तथा नर ऋषि, जिन्होंने धर्मसे उनकी पत्नी मूर्तिके गर्भसे अवतार ग्रहण किया है, गन्धमादन पर्वतपर तपस्याके लिये गये थे और जहाँ बहुत सुगन्धित फलसे युक्त बेरका वृक्ष है। महाभागे! वे दोनों महात्मा उस स्थानपर कल्पभरके लिये तपस्यामें स्थित हैं। कलापग्रामवासी नारद आदि मुनिवर तथा सिद्धोंके समुदाय उन्हें घेरे रहते हैं और वे दोनों लोकरक्षाके लिये तपस्यामें संलग्न हैं। वहाँ सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाला सुविख्यात अग्नितीर्थ है। उसमें स्नान करके महापातकी भी पातकसे शुद्ध हो जाते हैं। सहस्रों चान्द्रायण और करोड़ों कृच्छ्रव्रतसे मनुष्य जो फल पाता है, उसे अग्नितीर्थमें स्नान करनेमात्रसे पा लेता है। उसके तीर्थमें पाँच शिलाएँ हैं। जहाँ भगवान् नारदने अत्यन्त भयंकर तपस्या की, वह शिला 'नारदी' नामसे विख्यात है, जो दर्शनमात्रसे मुक्ति देनेवाली है। सुलोचने! वहाँ भगवान् विष्णुका नित्य निवास है। उस तीर्थमें नारदकुण्ड है, जहाँ स्नान करके पवित्र हुआ मनुष्य भोग, मोक्ष, भगवान्‌की भक्ति आदि जो-जो चाहता है, वही-वही प्राप्त कर लेता है। जो मानव भक्तिपूर्वक इस नारदी शिलाके समीप स्नान, दान, देवपूजन, होम, जप तथा अन्य शुभकर्म करता है, वह सब अक्षय होता है। इस क्षेत्रमें दूसरी शुभकारक शिला 'वैनतेय' शिलाके नामसे विख्यात है, जहाँ महात्मा गरुड़ने भगवान् विष्णुके दर्शनकी इच्छासे तीस हजार वर्षोंतक कठोर तपस्या की थी। शुभे! इससे प्रसन्न होकर भगवान्‌ने उन्हें श्रेष्ठ वर दिया— 'वत्स! मैं तुम्हारे ऊपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम दैत्यसमूहके लिये अजेय और नागोंको अत्यन्त भय देनेवाले मेरे वाहन होओ। यह शिला इस पृथ्वीपर तुम्हारे ही नामसे विख्यात होगी और दर्शनमात्रसे मनुष्योंके लिये पुण्यदायिनी होगी। महाभाग ! तुमने जहाँ तपस्या की है, उस मुख्यतम तीर्थमें मेरी प्रसन्नताके लिये स्नान करनेवालोंको पुण्य देनेवाली गङ्गा प्रकट होंगी। जो पञ्चगङ्गामें स्नान करके देवता आदिका तर्पण करेगा, उसकी सनातन ब्रह्मलोकसे इस लोकमें पुनरावृत्ति नहीं होगी।' ऐसा वरदान देकर भगवान् विष्णु उसी समय अन्तर्धान हो गये। गरुड़जी भी भगवान् विष्णुकी आज्ञासे उनके वाहन हो गये। तीसरी जो शुभकारक शिला है, वह 'वाराही' शिलाके नामसे विख्यात है, जहाँ पृथ्वीपर रसातलसे उद्धार करके भगवान् वराहने हिरण्याक्षको मार गिराया और शिलारूपसे वे पापनाशक श्रीहरि उस दैत्यको दबाकर बैठ गये। जो मानव वहाँ जाकर गङ्गाके निर्मल जलमें स्नान करता और भक्तिभावसे उस शिलाकी पूजा करता है, वह कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता। देवेश्वरि ! वहाँ चौथी 'नरसिंह' शिला है, जहाँ हिरण्यकशिपुको मारकर भगवान् नरसिंह