भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 97
  • पूर्वभाग-प्रथम पाद * ९५

होम करे। जो मनुष्य इस प्रकार भलीभाँति लक्ष्मीनारायणका व्रत करता है, वह इस लोकमें पुत्र-पौत्रोंके साथ महान् भोग भोगकर सब पापोंसे मुक्त हो अपनी बहुत-सी पीढ़ियोंके साथ भगवान्‌के वैकुण्ठधाममें जाता है, जो योगियोंके लिये भी दुर्लभ है।

श्रीविष्णुमन्दिरमें ध्वजारोपणकी विधि और महिमा

श्रीसनकजी कहते हैं—नारदजी! अब मैं ध्वजारोपण नामक दूसरे व्रतका वर्णन करूँगा, जो सब पापोंको हर लेनेवाला, पुण्यस्वरूप तथा भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताका कारण है। जो भगवान् विष्णुके मन्दिरमें ध्वजारोपणका उत्तम कार्य करता है, वह ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा पूजित होता है। बहुत-सी दूसरी बातें कहनेसे क्या लाभ! जो कुटुम्बयुक्त ब्राह्मणको सुवर्णका एक हजार भार दान देता है, उसके उस दानका फल ध्वजारोपण-कर्मके बराबर ही होता है। परम उत्तम गङ्गा-स्नान, तुलसीकी सेवा अथवा शिवलिङ्गका पूजन—ये सब कर्म ही ध्वजारोपणकी समानता कर सकते हैं। ब्रह्मन्! यह ध्वजारोपण नामक कर्म अद्भुत है, अपूर्व है और आश्चर्यजनक है। यह सब पापोंको दूर करनेवाला है। ध्वजारोपण कार्यमें जो-जो कार्य आवश्यक हैं, उन सबको बतलाता हूँ, आप मेरे मुखसे सुनें।

कार्तिक मासके शुक्लपक्षमें दशमी तिथिको मनुष्य अपने मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए, प्रयत्नपूर्वक दातून करके स्नान करे। व्रत करनेवाला ब्राह्मण उस दिन एक समय भोजन करे, ब्रह्मचर्यसे रहे और धुले हुए शुद्ध वस्त्र धारण करके शुद्धतापूर्वक भगवान् नारायणके सामने उन्हींका स्मरण करते हुए रातमें शयन करे। तत्पश्चात् प्रातःकाल उठकर विधिपूर्वक स्नान और आचमन करके नित्यकर्म पूर्ण करनेके अनन्तर भगवान् विष्णुकी पूजा करे। चार ब्राह्मणोंके साथ स्वस्तिवाचन करके ध्वजारोपणके निमित्त नान्दीमुख-श्राद्ध करे। वस्त्रसहित ध्वज और स्तम्भका गायत्री-मन्त्रद्वारा प्रोक्षण (जलसे अभिषेक) करे। फिर उस ध्वजके वस्त्रमें सूर्य, गरुड और चन्द्रमाकी पूजा करे। ध्वजके दण्डमें धाता और विधाताका पूजन करे। हल्दी अक्षत और गन्ध आदि सामग्रियोंसे विशेषतः श्वेत पुष्पोंसे पूजन करना चाहिये। तदनन्तर गोचर्म बराबर एक वेदी बनाकर उसे जल और गोबरसे लीपे। फिर अपनी शाखाके गृह्यसूत्रमें बतलायी हुई विधिके अनुसार पञ्चभू-संस्कारपूर्वक अग्निकी स्थापना करके क्रमशः आघार और आज्य-भाग आदि होमकार्य करे। फिर घृतमिश्रित खीरकी एक सौ आठ आहुति दे। यह आहुति प्रधान देवता भगवान् विष्णुके अष्टाक्षर-मन्त्रसे देनी चाहिये। (यथा ‘ॐ नमो नारायणाय स्वाहा।’) ब्रह्मन्! इसके बाद पुरुषसूक्तके प्रथम