भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 98

९६ * संक्षिप्त नारदपुराण *

मन्त्र^१, विष्णोर्नुकम्^२, इरावती^३, वैनतेयाय स्वाहा, सोमो^४ धेनुम् और उदुत्यं जातवेदसम्^५—इन मन्त्रोंसे क्रमशः आठ-आठ आहुति अग्निमें डाले। तत्पश्चात् वहाँ यथाशक्ति 'विभ्राड् बृहत् पिबतु सोम्यं मधु' इत्यादि (यजु० ३३। ३०) सूर्यदेवतासम्बन्धी मन्त्रों तथा 'शं नो मित्रः शं वरुणः' (यजु० ३६। ९) इत्यादि शान्तिसूक्तके मन्त्रोंका पाठ या जप करे और पवित्रतापूर्वक भगवान् विष्णुके समीप रात्रिमें जागरण करे। दूसरे दिन प्रातःकाल नित्यकर्म समाप्त करके गन्ध, पुष्प आदिके द्वारा क्रमशः पहलेकी तरह ही भगवान्‌की पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर उस सुन्दर ध्वजको मङ्गलवाद्य, सूक्तपाठ, स्तोत्रगान और नृत्य आदि उत्सवके साथ भगवान् विष्णुके मन्दिरमें ले जाय। नारदजी! भगवान्‌के द्वारपर अथवा मन्दिरके शिखरपर खम्भेसहित उस ध्वजको प्रसन्नतापूर्वक दृढ़ताके साथ स्थापित करे। फिर गन्ध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप आदि मनोहर उपचारों तथा भक्ष्य-भोज्य आदि पदार्थयुक्त नैवेद्योंसे भगवान् विष्णुकी पूजा करे। इस प्रकार उत्तम एवं सुन्दर ध्वजको देवालयमें स्थापित करके परिक्रमा करे।

इसके बाद भगवान्‌के सामने इस स्तोत्रका पाठ करे। पुण्डरीकाक्ष! कमलनयन! आपको नमस्कार है। विश्वभावन! आपको नमस्कार है। हृषीकेश! महापुरुष! सबके पूर्वज! आपको नमस्कार है। जिनसे यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ है, जिनमें यह सब प्रतिष्ठित है और प्रलयकाल आनेपर जिनमें ही इसका लय होगा, उन भगवान् विष्णुकी मैं शरण लेता हूँ। ब्रह्मा आदि देवता भी जिनके परम भाव (यथार्थ स्वरूप)-को नहीं जानते और योगी भी जिन्हें नहीं देख पाते, उन ज्ञानस्वरूप श्रीहरिकी मैं वन्दना करता हूँ। अन्तरिक्ष जिनकी नाभि है, द्युलोक जिनका मस्तक है और पृथ्वी जिनका चरण है, उन विश्वरूप भगवान्‌को मैं प्रणाम करता हूँ। सम्पूर्ण दिशाएँ जिनके कान हैं, सूर्य और चन्द्रमा जिनके नेत्र हैं तथा ऋक्, साम और यजुर्वेद जिनसे प्रकाशित हुए हैं, उन ब्रह्मस्वरूप भगवान् विष्णुको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनके मुखसे ब्राह्मण उत्पन्न हुए हैं, जिनकी भुजासे क्षत्रियोंकी उत्पत्ति हुई है, जिनके ऊरुसे वैश्य प्रकट हुए हैं और जिनके चरणोंसे शूद्रका जन्म हुआ है, विद्वान् लोग मायाके संयोगमात्रसे जिन्हें पुरुष कहते हैं, जो स्वभावतः निर्मल, शुद्ध, निर्विकार तथा दोषोंसे निर्लिप्त हैं, जिनका कहीं अन्त नहीं है, जो किसीसे पराजित नहीं होते और क्षीरसागरमें शयन करते हैं, श्रेष्ठ भक्तोंपर जिनकी स्नेहधारा सदा प्रवाहित होती रहती है तथा जो भक्तिसे ही सुलभ होते हैं, उन भगवान् विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ। पृथ्वी आदि पाँच भूत, तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ तथा सूक्ष्म और स्थूल सभी पदार्थ जिनसे अस्तित्व-लाभ करते हैं, सब ओर मुखवाले उन सर्वव्यापी परमेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जिन्हें सम्पूर्ण लोकोंमें उत्तम-से-उत्तम, निर्गुण,


१. सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। स भूमिँससर्वतः स्पृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥ (यजु० ३१। १)
२. विष्णोर्नुकं वीर्याणि प्रवोचं यः पार्थिवानि विममे रजाँसि। यो अस्कभायुदुत्तरँसधस्थं विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायो विष्णवे त्वा॥ (यजु० ५। १८)
३. इरावती धेनुमती हि भूतँस्यूयवसिनी मनवे दशस्या। व्यस्कभ्ना रोदसी विष्णवे ते दाधर्थ पृथिवीमभितो मयूखैः स्वाहा॥ (यजु० ५। १६)
४. सोमो धेनुँसोमो अर्वन्तमाशुँसोमो वीरं कर्मण्यं ददाति। सादन्यं विदथ्यँसभेयं पितृश्रवणं यो ददाशदस्मै॥ (यजु० ३४। २१)