भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 112, कुल 304 में से

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का सामर्थ्य भी है अथवा नहीं ? इसके अतिरिक्त अपराध का स्वरूप क्या है ? क्या सचमुच शिकायत करने वाले को किसी प्रकार की शारीरिक क्षति—सूजन, अंगभंग, रक्त प्रवाह, घाव आदि—पहुंची भी है अथवा नहीं ? इन सब तथ्यों पर विचार करने से अनुमान लगाना सम्भव हो जाता है कि अपराधी ने सचमुच अपराध किया है अथवा उस पर मिथ्या आरोप लगाया जा रहा है ? नार्थसम्बन्धिनो नाप्ता न सहाया न वैरिणः । न दृष्टदोषाः प्रष्टव्याः साक्षिणः प्रतिदूषिताः ॥ 177 ॥ निम्नोक्त व्यक्तियों के वक्तव्य को सत्य के निर्णय के लिए प्रमाण के रूप में ग्रहण नहीं किया जा सकता, अर्थात् ऐसे लोगों की सत्यनिष्ठा सन्देह के घेरे में आ जाने से इनकी विश्वसनीयता खण्डित हो जाती है और वे साक्षी बनने के योग्य नहीं रहते—

  1. कार्य-व्यापार में वर्तमान में सहभागी (पार्टनर) अथवा भूत में रह चुका व्यक्ति।
  2. निकट सम्बन्धी अथवा घनिष्ठ मित्र।
  3. अधीनस्थ कर्मचारी।
  4. शत्रु, जिससे कभी मन-मुटाव अथवा झगड़ा-फ़साद हो चुका है।
  5. किसी अन्य व्यवहार में मिथ्या साक्ष्य देने के लिए लाञ्छित नहीं है।
  6. लोक में तथा समाज में मिथ्यावादी के रूप में कुख्यात। दासनैकृतिकाश्राद्धवृद्धस्त्री बाल चाक्रिकाः । मत्तोन्मत्तप्रमत्तार्त्तकितव ग्रामयाजकाः ॥ 178 ॥ महापथिकसामुद्रवणिक् प्रव्रजितातूराः । व्यङ्गैकश्रोत्रियाचारहीनक्लीवकुशीलवाः ॥ 179 ॥ नास्तिक व्रात्य दाराग्नित्यागिनोऽयाज्ययाज्यकाः । एकस्थालीसहायारिचरज्ञाति सनाभयः ॥ 180 ॥ प्राग्दृष्टदोषशैलूषविषजीव्याहिनुण्डिकाः । गरदाग्निदकीनाशशूद्रापुत्रौपपातिकाः ॥ 181 ॥ क्लान्तसाहसिकश्रान्तनिर्धनान्त्यावसायिनः । भिन्नवृत्तासमावृत्तजडतैलिकमूलिकाः ॥ 182 ॥ भूताविष्टनृपद्विष्टवर्ष नक्षत्रसूचकाः । अघशंस्यात्मविक्रेतृहीनाङ्गभगवृत्तयः ॥ 183 ॥ कुनखी श्यामदन्तश्च मित्रध्रुक्शठशौण्डिकाः । ऐन्द्रजालिकलुब्ध्रोग्रश्रेणीगणविरोधिनः ॥ 184 ॥ 110 / नारदस्मृति