नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 113
वधकश्चर्मकृत् पङ्गु पतितः कूटकारकः । कुहकः प्रत्यवसितस्तस्करो राजपुरुषः ॥ 185 ॥ मनुष्यपशुमांसास्थिमधुक्षीराम्बुसर्पिषाम् । विक्रेता ब्राह्मणश्चैव द्विजो वार्धुषिकश्च यः ॥ 186 ॥ च्युतः स्वधर्मात् कुलिकः स्तावको हीनसेवकः । पित्रा विवदमानश्च भेदकृच्चेत्यसाक्षिणः ॥ 187 ॥ निम्नोक्त व्यक्ति साक्षी बनने के योग्य नहीं होते, अतः इन्हें साक्षी नहीं बनाना चाहिए-
- दास, 2. छल-कपट से व्यवहार करने वाले के रूप में प्रसिद्ध, 3. श्राद्ध के अयोग्य घोषित, अर्थात् आचारभ्रष्ट एवं पतित ब्राह्मण, 4. वृद्ध पुरुष, अर्थात् इन्द्रिय- शक्ति की क्षीणता के कारण असमर्थ बना व्यक्ति अथवा परोपजीवी, 5. स्त्री,
- बालक, 7. चक्रजीवी-तेली, रथकार तथा शकट-चालक आदि, 8. मत्त- मदिरा आदि के प्रभाव में ग्रस्त, 9. उन्मत्त, अर्थात् विक्षिप्त, 10. प्रमत्त-प्रमादग्रस्त, आलसी, सुस्त, 11. आर्त्त-विपत्ति-ग्रस्त, 12. द्यूतकार, 13. अशिक्षितों एवं ग्रामीणों, अर्थात् निम्न लोगों (अन्त्यजों) का पुरोहित, 14. महापथिक-दूसरे देशों की यात्रा करने वाला, 15. समुद्रजीवी, अर्थात् समुद्र में मिलने वाले जीवों, शंख-सीपी आदि से अपनी आजीविका चलाने वाला-ऐसा व्यक्ति समुद्र में मल-मूत्र विसर्जित करने वाला होने से म्लेच्छ होता है, 16. संन्यासी-उसका कोई निश्चित ठिकाना ही नहीं होता, 17. रोगी, अर्थात् जीवन से निराश, 18. विकलांग-अन्धा, काणा, बहरा, लंगड़ा, 19. एकाकी, मोहमाया से रहित अथवा समाज से निरपेक्ष होने से निराश एवं उदासीन, 20. श्रोत्रिय-वेदपाठी ब्राह्मण-इन पछड़ों को अवाञ्छनीय समझने वाला, 21. आचारहीन, 22. क्लीव (नपुंसक), 23. कुशीलव-नृत्य, गीत, वाद्य, आदि से आजीविका चलाने वाला, अर्थात् दूसरों का मनोरंजन करने वाला, 24. नास्तिक-वेदनिन्दक, 25. जाति-भ्रष्ट-जिसका यज्ञोपवीत संस्कार नहीं हुआ, विद्या का अनधिकारी, 26. अपनी पत्नी का त्याग करने वाला-पालन न कर सकने वाला अथवा क्लीव अथवा निर्मोही अथवा उत्तरदायित्व के निर्वहण को महत्त्व न देने वाला, 27. अग्नि-त्यागी-यज्ञ-यागादि न करने वाला,
- अयाज्य-याजक, यज्ञ के अनधिकारियों का पुरोहित बनने वाला, 29. एक ही पात्र में भोजन करने वाला, अर्थात् स्वाद, शालीनता आदि से विमुख, 30. अपने मित्र का शत्रु, 31. सन्देशवाहक अथवा गुप्तचर, 32. जाति-बन्धु-बुआ, मासी, चाचा तथा मामा की सन्तति, 33. दृष्टदोष-पूर्व से ही दुष्ट के रूप में ज्ञात,
- नर्तक, 35. विषजीवी-विषैले द्रव्यों का व्यापारी, 36. सर्प आदि भयंकर जीवों को पकड़ने अथवा उनसे आजीविका चलाने वाला, 37. विषदाता-दूसरों नारदस्मृति / 111