भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 114, कुल 304 में से

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को विष देकर-खिलाकर उनकी हत्या करने वाला, 38. दूसरों की सम्पत्ति (घर, दुकान) को आग लगाने वाला, 30. पशुओं की हिंसा से आजीविका चलाने वाला, 40. शूद्रा का पुत्र, 41. छोटे-बड़े पाप करने वाला, 42. खिन्न, निराश तथा अशान्त मन वाला, 43. डाकू-लुटेरा, 44. थका मांदा रहने वाला, 45. चाण्डाल आदि, 46. निर्धन, अभावग्रस्त, 47. अपने वंश परम्परागत व्यवसाय को छोड़कर दूसरे किसी व्यवसाय को अपनाने वाला, 48. असमावृत्त-अपने स्तर से भिन्न, उच्च अथवा निम्न वृत्ति को अपनाने वाला, 49. जड़-अविकसित बुद्धि, 50. तैलिक-घी, तेल आदि का क्रय-विक्रय करने वाला, 51. विद्याचोर, अर्थात् गुरुकुल में प्रवेश लिये बिना और शुल्क चुकाये बिना गुप्त रूप से विद्या ग्रहण करने वाला, 52. भूत-प्रेत से घिरा, 53. राजद्रोही, 54. ग्रह-नक्षत्रों को बताकर आजीविका कमाने वाला-फलित ज्योतिषी, 55. अप्रासंगिक-ऊटपटांग बोलने वाला, 56. अपने को बेचने वाला-दासवृत्ति को अपनाने वाला, 57. अंगविहीन-एक हाथ, एक टांग आदि का न होना, 58. पेट भरने के लिए पत्नी से वेश्यावृत्ति कराने वाला, 59. मैला-कुचैला रहने वाला, गन्दे नाखूनों वाला, 60. तम्बाकू आदि के अधिक सेवन से काले हो गये दांतों वाला, 61. मित्रद्रोही, 62. शठ-दुष्ट प्रकृति, धूर्त, 63. मद्यविक्रेता, 64. जादूगर, 65. लोभी, 66. कठोर एवं निर्मम प्रकृति, 67. जाति-पांति का विरोधी, 68. समाज में प्रतिष्ठित वर्ण-व्यवस्था का विरोधी, 69. हत्यारा, 70. चर्म-व्यवसायी, 71. पंगु, 72. पतित, 73. कूटकर्म करने वाला, अर्थात् चोरी-छिपे लोगों की हत्या करने वाला, 74. जादू-टोना करने वाला, 75. तस्कर-अवैध व्यापारी, 76. राजपुरुष-सरकारी कर्मचारी, 77. मनुष्य के मांस का विक्रेता, 78. पशुमांस विक्रेता-क़साई, 79. अस्थि-व्यापारी, 80. मधुविक्रेता 81. क्षीरविक्रेता, 82. जलविक्रेता, 83. घृतविक्रेता, 84. वेद विक्रयी-धन लेकर वेद पढ़ाने वाला, 85. ब्याज लेने वाला-ब्याज को आजीविका का साधन बनाने वाला-द्विज, 86. धर्मभ्रष्ट, 87. शिल्पी, 88. सूत, मागध आदि आश्रयदाताओं की स्तुति करने वाला, 89. हीन (अयोग्य, शूद्र अथवा पतित) की सेवा करने वाला, 90. पिता के साथ विवाद करने वाला, 91. परिवार में फूट डालने वाला। ये सब विवश अथवा पतित अथवा भ्रष्ट होने के कारण अविश्वसनीय होते हैं, अतः इनका साक्ष्य सर्वथा निरपेक्ष एवं सत्य पर आश्रित नहीं माना जा सकता। बिकने वाले अथवा खरीदे जा सकने वाले व्यक्ति से सत्य पर टिकने की आशा को ही नहीं जा सकती। असाक्षिणो ये निर्दिष्टा दासनैकृतिकादयः । कार्यगौरवमासाद्य भवेयुस्तेऽपि साक्षिणः ॥ 188 ॥ ऊपर दासों और भ्रष्ट चरित्र व्यक्तियों के साक्षी न होने का उल्लेख किया 112 / नारदस्मृति