भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 304 में से

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गया है, परन्तु प्रचलित कहावत—'कीचड़ में कमल भी उत्पन्न होता है' अथवा 'कोयले की खान में कभी-कभी हीरा भी मिल जाता है,' अर्थात् छोटे अथवा बुरे व्यक्तियों में भी अपवाद-रूप में भी चारित्रिक उत्कर्ष देखने को मिल जाता है। ऐसे अपवाद बने सेवक और कुख्यात व्यक्ति भी विशेषतया अन्य साक्षियों के अभाव में साक्षी बनाये जा सकते हैं और इनके साक्ष्य को मान्यता दी जानी चाहिए। साहसेषु च सर्वेषु स्तेयसंग्रहणेषु च। पारुष्ययोश्चाप्युभयोर्न परीक्षेत साक्षिणः ॥ 189 ॥ व्यक्तिगत चरित्र के अतिरिक्त एक अन्य विचारणीय तथ्य यह भी है कि चोरी, डाका, छीना-झपटी, गाली-गलौच और मारपीट के मामलों के साक्षी तो वहां उपस्थित रहने वाले चोर-डाकू आदि ही हो सकते हैं। भले आदमी तो ऐसी घटनाओं से दूर रहने में ही अपना हित समझते हैं। वे तो घटनास्थल के समीप फटकते ही नहीं। अतः इस प्रकार के मामलों में साक्षी बनने वाले व्यक्तियों के चरित्र की परीक्षा नहीं करनी चाहिए, अन्यथा साक्ष्य का उपलब्ध होना ही दुर्लभ हो जायेगा। तेषामपि न बालः स्यान्न स्त्री नैको न कूटकृत्। न बान्धवो न चारातिब्रूयुस्ते साक्ष्यमन्यथा ॥ 190 ॥ उपर्युक्त चोरी, डाका आदि मामलों में बालक, स्त्री, अपराधी मनोवृत्ति का होने से आंख चुराने वाला, सामना न कर सकने वाला, बन्धु-बान्धव और शत्रु आदि साक्षी नहीं बन सकते। इनके साक्ष्य की अप्रामाणिकता के कारण का उल्लेख अगले पद्य में किया गया है। बालोऽज्ञानादसत्यात्स्त्री पापाभ्यासाच्च कूटकृत्। बिब्रूयाद्बान्धवः स्नेहाद्वैरनिर्यातनारिः ॥ 191 ॥ बालक लगभग अनजान होता है, स्त्रियों में असत्य-भाषण की प्रवृत्ति होती है तथा वे स्वभाव से भीरु होती हैं, कूटाचारी का जीवन पापमय होता है, उसे तो सत्य-असत्य का विचार ही नहीं रहता, उसे दूसरों को लड़ाने-भिड़ाने में ही आनन्द आता है, बन्धु-बान्धवों से अनुराग और आसक्ति के कारण तथा विरोधी शत्रु के द्वेष-भाव रखने के कारण तथा शत्रु को यातना देने को तत्पर होने के कारण दोनों से यथार्थ कथन की अपेक्षा की ही नहीं जा सकती। रोग अथवा द्वेषग्रस्त व्यक्ति निरपेक्ष हो ही नहीं सकता। उभयानुमतो यः स्याद्द्वयोर्विवदमानयोः । असाक्षिकोऽपि साक्षित्वे प्रष्टव्यः स्यात् स संसदि ॥ 192 ॥ न्यायाधिकारी को साक्ष्य के लिए सर्वथा अनुपयुक्त एवं अपात्र, परन्तु विवाद नारदस्मृति / 113