भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 304 में से

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में उलझे दोनों पक्षों को एक समान मान्य व्यक्ति से मामले के सम्बन्ध में पूछताछ करनी चाहिए और उसके साक्ष्य को यथोचित महत्त्व देना ही चाहिए। यस्त्वात्मदोषभिन्नत्वादस्वस्थ इव लक्ष्यते। स्थानात् स्थानान्तरं गच्छेदैकैकं चानुधावति॥ 193॥ क्रासत्यनिभृतोऽकस्मादभीक्ष्णं निश्वसत्यपि। भूमिं लिखति पादाभ्यां बाहू वासो धुनोति च॥ 194॥ भिद्यते मुखवर्णोऽस्य ललाटं विद्यते तथा। शोषमागच्छतश्चोष्ठादूर्ध्वं तिर्यक् च वीक्षते॥ 195॥ त्वरमाण इवाकस्मादपृष्टो बहु भाषते। कूटसाक्षी स विज्ञेयस्तं पापं विनयेन्नृपः॥ 196॥ कूटसाक्षी को परिभाषित करते हुए स्मृतिकार का कथन है—

  1. अपने दोष के प्रकट हो जाने की आशंका से भयभीत होना।
  2. किसी एक स्थान पर टिक न पाने तथा इधर-उधर भटकने वाला होना।
  3. अस्वस्थ एवं असंयत दीखना।
  4. एक-एक व्यक्ति की टोह लेना।
  5. लोगों के मौन से घबराना।
  6. क्षण-प्रतिक्षण दीर्घ श्वास लेना, पैरों से धरती को कुरेदना और धरती पर कुछ लिखना। 7.अकारण ही अपनी भुजाओं और वस्त्रों को ऊपर-नीचे करते रहना।
  7. चेहरे के रंग का उड़ना।
  8. माथे पर पसीना आना।
  9. कण्ठ शुष्क हो जाना।
  10. पागलों के समान दीखना।
  11. बुद्धि में चञ्चलता का भाव आना।
  12. छोटे से प्रश्न का लम्बा चौड़ा उत्तर देना। उपर्युक्त लक्षणों वाले व्यक्ति को कूटसाक्षी—झूठी गवाही देने वाला—समझना चाहिए और राजा अथवा सम्बद्ध अधिकारी द्वारा उसे ऐसा कठोर दण्ड देना चाहिए, जिससे दूसरे ऐसे दुस्साहसपूर्ण दुष्कर्म के सम्बन्ध में सोच भी न सकें। श्रावयित्वा तथान्येभ्यः साक्षित्वं यो विनिह्नुते। स विनेयो भृशतरं कूटसाक्ष्यधिको हि सः॥ 197॥ साक्ष्य के लिए अपनी सहमति-स्वीकृति देने के उपरान्त साक्ष्य के समय इनकार करने वाला, अकारण अनुपस्थित रहने वाला अथवा टालमटोल एवं बहानेबाज़ी करने वाला कूटसाक्षी से भी बड़ा अपराधी होता है। राजा को ऐसे दुष्ट व्यक्ति को 114 / नारदस्मृति