भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 130, कुल 304 में से

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वह अपना दाहक धर्म त्याग देती होगी ? आज का प्रबुद्ध व्यक्ति इस मान्यता पर विश्वास कर सकेगा—इसमें सन्देह ही है। सव्रतानां भृशार्तानां व्याधितानां तपस्विनाम् । स्त्रीणां च न भवेद्दिव्यं यदि धर्मस्त्ववेक्षते ॥ 256 ॥ धर्म की रक्षा में तत्पर राजा—न्यायाधिकारी—को व्रतशीलों, आचार परायण व्यक्तियों, रोग-पीड़ितों, शोकग्रस्त लोगों, तपस्वियों तथा स्त्रियों को कभी दिव्य प्रयोगों के लिए नहीं कहना चाहिए। टिप्पणी—रामायण के अनुसार श्रीराम ने लंकाविजय के उपरान्त सीता को अपना सतीत्व सिद्ध करने के लिए अग्निपरीक्षा देने का निर्देश दिया था। रजक के कथन पर परित्यक्ता सीता ने पुनः अपना सतीत्व सिद्ध करने के लिए धरती से फट जाने का अनुरोध किया था। इन दो उद्धरणों से प्राचीनकाल में इस प्रकार के दिव्य प्रयोगों का प्रचलन सिद्ध होता है। शिरोवर्ती यदा न स्यात्तदा दिव्यं न दीयते । कारणैः सहितं प्रोक्तं न दिव्यं चार्थिनान्नृणाम् ॥ 257 ॥ अभियुक्त के अपराधी सिद्ध न होने तक उसे दिव्य प्रयोगों का दण्ड कदापि नहीं देना चाहिए; क्योंकि दिव्य प्रयोगों का अकारण प्रवर्तन सर्वथा अनुचित है, उनका तो केवल सकारण प्रयोग ही वाञ्छनीय होता है। तत्राज्ञेन विनीतेन धार्मिकेण विजानता। उभयानुमते देयं दिव्यं सर्वं प्रयत्नतः ॥ 258 ॥ दिव्य दण्ड देना न्यायाधिकारी का एकाधिकार कदापि नहीं है। इस प्रयोग को दोनों—वादी तथा प्रतिवादी—की स्वीकृति लेकर तथा विवेकसम्पन्न, बुद्धिमान्, विनीत, धार्मिक, उदार तथा राग द्वेष से मुक्त न्यायशास्त्रियों और सभ्यों द्वारा भली प्रकार सोच-विचार के उपरान्त ही करना चाहिए। न शीते तोयशुद्धिः स्यान्नोष्णकालेऽग्निशोधनम् । न प्रावृषि विषं दद्यात् प्रवाते न तुलां नृणाम् ॥ 259 ॥ शीतकाल में जल दिव्य का और ग्रीष्मकाल में अग्नि दिव्य का, वर्षा ऋतु में विष दिव्य का और प्रचण्ड वायु के चलते समय तुला दिव्य का प्रयोग नहीं करना चाहिए; क्योंकि इन ऋतुओं में ये प्रयोग असह्य ही नहीं होते, अपितु अमानवीय भी होते हैं। इसके अतिरिक्त प्राणों के मूल्य पर सत्य का ज्ञान कोई महंगा सौदा नहीं है। विचार्य धर्मनिपुणैः सर्वधर्मविशारदैः । इदं सर्वर्तुकं प्रोक्तं पण्डितैर्घटधारणम् ॥ 260 ॥ 128 / नारदस्मृति

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