नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 131, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंवास्तव में धर्मनिष्ठ, न्याय-विशारद, लोकप्रतिष्ठित, बुद्धिमान् एवं सदाचारी विद्वानों ने दिव्य प्रयोग सम्बन्धी दण्ड के रूप में सभी ऋतुओं में घट दिव्य को अपनाने का ही एकमत से समर्थन किया है। हस्तद्वयं तु निख्येमुक्तं मुण्डकयोः सदा। षड्ढस्तं तु तयोर्दृष्टं प्रमाणं परिणाहतः ॥ 261 ॥ घट दिव्य में छह हाथ विस्तृत दो दण्डों को दो हाथ गहरे गड्डों में दबाया जाता है। चतुर्हस्ता घटतुला पादौ चापि प्रकीर्तितौ । पादयोरन्तरं हस्तो भवेद्ध्यार्धमेव च ॥ 262 ॥ दो ऊंचे स्तम्भों के मध्य लगी तुला में चार हाथ ऊंचे पलड़े लटकते रहते हैं। दो पलड़ों के बीच डेढ़ हाथ की दूरी रहती है। एक पलड़े में अभियुक्त को बिठाया जाता है और दूसरे पलड़े में उसके शरीर के भार के समकक्ष स्वर्ण, रजत, ताम्र, लौह अथवा नकदी रखी जाती है। यही भार क्षति-पूर्ति के रूप में वादी को दिया जाता है। ऋज्वी घटतुला कार्या खादिरी तन्दुकापि वा। चतुरस्रा त्रिभिः स्थानैर्घटकर्कटकादिभिः ॥ 263 ॥ घट की तुला खदिर अथवा तन्दुक आदि की सीधी लकड़ी से बनानी चाहिए। विशेष प्रकार की चौकोर तराजू में तीन स्थानों पर कील लगे रहते हैं। इस लकड़ी पर लटके रहने के कारण तराजू के पलड़े झूलते रहते हैं। खादिरं कारयेत्तं च निर्व्रणं शुष्कवर्जितम् । शांशपं तदभावे च शालं वा कोटरैर्विना ॥ 264 ॥ तराजू बनाने के काम में लायी जाने वाली खदिर की लकड़ी सूखी, सीधी और गांठों से रहित होनी चाहिए। खदिर की लकड़ी न मिलने पर-शांशप की लकड़ी का तथा उसके भी सुलभ न होने पर-शाल की लकड़ी का प्रयोग करना चाहिए। ध्यान यह रखना चाहिए कि तराजू बनाने के काम में आने वाली लकड़ी में खुरदरापन कदापि नहीं होना चाहिए। रन्दा से सही न हो सकने वाली लकड़ी का प्रयोग कभी नहीं करना चाहिए। एवंविधानि काष्ठानि घटार्थे परिकल्पयेत् । समाराजकुलद्वारे सुरायतन चत्वरे ॥ 265 ॥ राजदरबार में, राजभवन में तथा देवमन्दिर में जहां कहीं भी घटतुला लगानी पड़े, वहां इसी प्रकार उपर्युक्त ढंग से निर्दिष्ट लकड़ी और खम्भों की व्यवस्था करनी चाहिए। निखेयो निश्चलः कार्यो गन्धमाल्यानुलेपनः । दध्यक्षतहविर्गन्धकृतपावनमङ्गलः ॥ 266 ॥ नारदस्मृति / 129