नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 132, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंतुलाखण्ड को इस प्रकार स्थापित करना चाहिए, जिससे वह स्थिर और निश्छल खड़ा रह सके। उसे गन्ध, माला और चन्दनादि के लेप से सजाना चाहिए, दही, अक्षत, गन्ध और हवि आदि से उसे पवित्र और मंगलमय स्वरूप प्रदान करना चाहिए। रक्षार्थमाहूतैर्लोकै लोकपालैरधिष्ठितः । सर्वदा स तु देयः स्यात् सर्वलोकस्य पश्यतः ॥ 267 ॥ तुला की रक्षा के लिए लोकपालों का आवाहन करके उन्हें वहां अधिष्ठाता के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहिए। तुला के सम्बन्ध में सारी कार्यवाही सार्वजनिक रूप में, अर्थात् सभी लोगों की उपस्थिति में करनी चाहिए। अहोरात्रोषिते स्नाते आद्रवाससि मानवे । पूर्वाह्ने सर्वदिव्यानां प्रदानमनुकीर्तितम् ॥ 268 ॥ दिव्य परीक्षा देने वाले को दिन-रात का उपवास रखना होता है, उसे स्नान करके गीले वस्त्र पहने हुए पूर्वाह्न में ही तुला दिव्य कर्म करना होता है। शिरोपस्थायिनि नरे अभियोक्तर्युपस्थिते । दिव्यप्रदानं विहितमन्यत्र नृपहिंसनम् ॥ 269 ॥ दिव्य कर्म अभियोक्ता की उपस्थिति में ही किया जाना चाहिए। राजगृह में किसी प्रकार की सम्भावित हिंसा को टालने के लिए अभियोक्ता की अनुपस्थिति में भी दिव्य कर्म किया जा सकता है। अशिरंस्यपि दिव्यानि राजा भृत्येषु दापयेत् । अभियोगाभियुक्तानामन्येषां तु यथाक्रमम् ॥ 270 ॥ राजा (न्यायाधिकारी) अभियोग का विषय बने तथा दण्ड ग्रहण के अनिच्छुक अपने सेवकों को दिव्य परीक्षा देने के लिए बाध्य कर सकता है। सेवकों से भिन्न अभियुक्तों को दण्ड ग्रहण करने अथवा दिव्य कर्म से अपने को निर्दोष करने की छूट रहती है। राजा के सेवकों को यह छूट नहीं रहती। शिक्यद्वयं समासज्य घटकर्कटयोर्दृढम् । एकत्र शिक्ये पुरुषमन्यत्र तुलयेच्छिलाम् ॥ 271 ॥ घट के दोनों किनारों पर ठोकी गयी कील से उसे सुदृढ़ रूप देकर एक ओर शिला को रखकर, उसके दूसरी ओर बैठे परीक्षा देने वाले अभियुक्त को तोलना चाहिए। धारयेदुत्तरे पार्श्वे पुरुषं दक्षिणे शिलाम् । पिटिकां पूरयेत्तस्मिनिष्टकालोष्टपांशुभिः ॥ 272 ॥ घट के उत्तर पार्श्व में पुरुष को बिठाना चाहिए और दक्षिण-पार्श्व में शिला रखनी चाहिए। शिला धारण करने वाले पलड़े को पिटिका कहा जाता है। इस 130 / नारदस्मृति