भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

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देव-पूजा के लिए नियुक्त व्यक्ति पुजारी के हाथ से तण्डुल ग्रहण करने चाहिए। तण्डुलान् भक्षयित्वा तु पत्रे निष्ठीवयेत्ततः। अश्वत्थपत्राभावे तु भूर्जपत्रे ततः स्मृतम्॥ 341॥ चावलों को खाकर खाने वाले को किसी एक पत्ते पर थूकना होता है। स्मृति के अनुसार इसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त तो पीपल का पत्ता है। पीपल के पत्ते के उपलब्ध न होने पर भोजपत्र को लेना चाहिए। दृश्येत शोणितं यस्य दन्तजालं च सीदति। गात्रं च कम्पते यस्य तमशुद्धं विनिर्दिशेत् ॥ 342 ॥ उस थूक में रक्त का दिखाई देना अथवा अभियुक्त का दन्तपीड़ा से व्यथित होना अथवा उसके देह में कम्पन का होना आदि को अभियुक्त के पापी होने के सूचक लक्षण समझने चाहिए। अतः परं प्रवक्ष्यामि तप्तमाषकलक्षणम्। शुभाशुभपरीक्षार्थं ब्रह्मणाभिहितं स्वयम्॥ 343॥ अब हम ब्रह्माजी द्वारा निर्दिष्ट दोषी अथवा निर्दोष के सूचक तप्त भाव के लक्षणों का परिचय देंगे। यह अभियुक्त के शुद्ध-अशुद्ध होने वाली परीक्षा की उत्तम विधि है। सौवर्णे रजते पात्रे आयसे मृण्मयेऽपि वा। क्षिप्रं घृतमुपादाय तदग्नौ स्थापयेच्छुचिः ॥ 344 ॥ स्वर्ण अथवा रजत अथवा लौह अथवा मिट्टी के पात्र में घृत डालकर शुद्ध भाव से उसे अग्नि पर तपाना चाहिए। सौवर्णीं राजसीं ताम्रीमायसीं वा सुशोभिताम्। सलिलेनासकृद्धौतां निक्षिपेत्तत्र मुद्रिकाम्॥ 345 ॥ सोने अथवा चांदी, तांबे अथवा लौह से बनी सुन्दर मुद्रिका (अंगूठी) को कई बार जल से धोकर तपे हुए घी वाले बरतन में डाल देना चाहिए। भ्रमत् पतितायामन्तः स नः स्पर्शसुभीषणः। ततस्त्वनेन मन्त्रेण घृतं तदभिमन्त्रयेत् ॥ 346 ॥ अब घी के पात्र में पड़ी इधर उधर लुढ़कती अंगूठी के साथ घी को इतना अधिक तपाना चाहिए कि अंगूठी आग का गोला बन जाये और इतनी अधिक भीषण एवं प्रज्वलित हो जाये कि उसका स्पर्श भयोत्पादक एवं दाहक बन जाये। अब उस घृत को मन्त्रों से अभिमन्त्रित करना चाहिए। परं पवित्रममृतं घृतं त्वं यज्ञकर्मसु। दहाग्ने यद्ययं पापो हिमशीतं शुचौ भव ॥ 347 ॥ इसके उपरान्त प्रार्थना करनी चाहिए—हे घृत ! आप देवों को यज्ञ में आहुति 144 / नारदस्मृति