भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 304 में से

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किसी एक सहभागी के मर जाने अथवा विदेश जाने पर उसके द्रव्य की व्यवस्था सम्बन्धी नियम— एकस्य चेत् स्याद् व्यसनं दायादोऽस्य तदाप्नुयात्। अन्यो वासति दायादे शक्ताश्चेत् सर्व एव वा॥ 7॥ दैवी उपद्रव, डाकुओं के उत्पात तथा प्रशासन की उग्रता से जूझने वाले तथा साझी सम्पत्ति को बचाने में अपने प्राण गंवाने वाले भागीदार के दायाद - पैतृक सम्पत्ति लेने वाले—को उसका स्थानापन्न मानकर उसके भाग का लाभांश उसे देते रहना चाहिए। यह शेष भागीदारों का नैतिक कर्तव्य बनता है। मृतक के पुत्र के होने पर उसके निकट सम्बन्धी को अथवा उसका दाहकर्म करने वाले को अथवा अपने को उसका उत्तराधिकारी को उसका लाभांश देते रहना चाहिए। ऋत्विनां व्यसनेऽप्येवमन्यस्तत्कर्म निस्तरेत्। लभेत दक्षिणाभागं स तस्मात् सम्प्रकल्पितम्॥ 8॥ यज्ञ-यागादि कराने वाले ऋत्विज के सम्बन्ध में भी उपर्युक्त व्यवस्था लागू होती है, अर्थात् यजमान से दान दक्षिणा आदि लिये बिना प्राण त्यागने वाले पुरोहित को देय दान-दक्षिणा को पाने का अधिकारी उसका पुत्र, उसके अभाव में उसका निकट सम्बन्धी अथवा उसका दाहकर्म करने वाला अथवा अपने को उसका उत्तराधिकारी सिद्ध करने वाला व्यक्ति ही होता है। ऋत्विग्याज्यमदुष्टं यस्त्यजेदनुपकारिणम्। अदुष्टर्त्विजे भाज्यो विनेयौ तावुभावपि॥ 9॥ किसी प्रकार की दुष्टता अथवा उपकार न करने वाले यजमान को यज्ञ- यागादि कराने की स्वीकृति देकर क्रोध-लोभ आदि के कारण उसे छोड़ने वाला पुरोहित तथा एक बार वरण करके उसमें किसी दोष के न मिलने पर भी अकारण ऋत्विज को छोड़ने वाला यजमान, दोनों ही दण्डनीय हैं। इन दोनों को कठोर दण्ड देकर अनुशासित करना चाहिए। ऋत्विक् तु त्रिविधो दृष्टः पूर्वजुष्टः स्वयं कृतः। यदृच्छया च यः कुर्यादार्त्विज्यं प्रीतिपूर्वकम्॥ 10॥ ऋत्विक् तीन प्रकार के होते हैं— पूर्वजुष्ट—कुल-परम्परा से चला आने वाला। स्वयं कृत—यजमान द्वारा पुरोहित के पास जाकर ऋत्विक् बनाने का अनुरोध करने तथा यादृच्छिक—यजमान द्वारा किसी भी विप्र पर अनुरक्त होकर उसका वरण करना। नारदस्मृति / 153