नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 166, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंशिल्प तथा यान्त्रिकी आदि—का चुनाव करना चाहिए। अभिमत शाखा की पाठ्यावधि के समाप्तिकाल तक उसे गुरुकुल में रहना चाहिए। आचार्यः शिक्षयेदेनं स्वगृहे दत्तभोजनम्। न चान्यत् कारयेत् कर्म पुत्रवच्चैनमाचरेत्॥ 17 ॥ आचार्य पिता बनकर अपने शिष्य का पुत्र के समान पालन-पोषण करता है। वह अपने शिष्य से कोई अन्य निजी कार्य न लेकर केवल विद्या-प्राप्ति के लिए अनुकूल सुविधाएं और परिवेश जुटाकर उसे उद्देश्य के प्रति समर्पित बनाता है। शिक्षयन्तमदुष्टं य आचार्यः सम्परित्यजेत्। बलाद्वासयितव्यः स्याद्बधबन्धौ च सोऽर्हति॥ 18 ॥ ईमानदारी से अपने शिष्यों को शिक्षित करने वाले तथा कठोरता से अनुशासन को लागू करने वाले गुरु का परित्याग करने वाले छात्र को बांधकर पीटना ही नहीं चाहिए, अपितु उसे बलपूर्वक गुरु के समीप लाकर शिक्षा-प्राप्ति के लिए बाध्य भी करना चाहिए। शिक्षितोऽपि कृतं कालमन्तेवासी समाप्नुयात्। तत्र कर्म च यत् कुर्यादाचार्यस्यैव तत् फलम्॥ 19 ॥ शिक्षा-प्राप्तिकाल में शिष्य के द्वारा किये गये कर्म—आविष्कार, मूर्ति, चित्र- निर्माण, वस्त्रों की सिलाई, खिलौने बनाना, फ़र्नीचर बनाना, लेख, पुस्तक लिखना, प्रतियोगिता में पुरस्कार पाना आदि के फल एवं लाभ पर गुरु का अधिकार होता है। शिष्य को शिक्षाकाल में अपने शारीरिक अथवा बौद्धिक श्रम से प्राप्त आय अपने गुरु को ही समर्पित कर देनी चाहिए। शिक्षा-समाप्ति के उपरान्त शिष्य के द्वारा गुरुकुल को छोड़कर अपने घर चले जाने पर, यदि उसके श्रम का कोई फल मिलता है या किसी सामान की बिक्री का धन आता है, किसी पुस्तक पर पुरस्कार मिलता है अथवा अन्य किसी प्रकार का सम्मान मिलता है, तो उस पर भी गुरु का ही अधिकार होता है। गृहीतशिल्पः समये कृत्वाचार्यप्रदक्षिणम्। शक्तिश्चानुमान्यैनमन्तेवासी निवर्तते॥ 20 ॥ शिष्य अपने निर्वाचित शिल्प, कला आदि विषय के निर्धारित पाठ्यक्रम को निश्चित अवधि में सम्पन्न करने के उपरान्त अपनी सामर्थ्य के अनुसार गुरु को यथोचित दक्षिणा समर्पित करता है और फिर गुरु की अनुमति प्राप्त होने पर ही अपने घर को लौटता है। वेतनं वा यदि कृतं ज्ञात्वा शिष्यस्य कौशलम्। अन्तेवासी समादद्यान्न चान्यस्य गृहे वसेत्॥ 21 ॥ यदि शिक्षा-समाप्ति के उपरान्त गुरु शिष्य को रोक लेता है और उसका वेतन 164 / नारदस्मृति