भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 177, कुल 304 में से

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पृष्ठ 177

सरकारी अधिकारी, पुलिस आदि को सूचित करके अथवा साक्षी बनाकर सामान ख़रीदता है और सामान के स्वामी होने का दम भरने वाला कपटी सबके सामने सामान बेचने का साहस जुटाता है, तो वास्तविकता का पता चलने पर क्रेता को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। हां, ऐसा न करने वाले, अर्थात् सामान को चोरी- छिपे सस्ता बिकता देखकर या लोभ में आकर, चोरी-छिपे ख़रीदने वाला अवश्य दोषी होने से चोर के समान दण्ड पाने के योग्य है। विक्रेता स्वामिनेऽर्थं स्वं क्रेत्रे मूल्यं च तत्समम्। दद्याद्दण्डं तथा राज्ञे विधिरस्वामिविक्रये ॥ ५ ॥ स्वामी न होने पर भी स्वामी बनकर दूसरों के द्रव्य को बेचने वाले को पकड़े जाने पर, उसे मूलस्वामी को उसका न केवल द्रव्य लौटाना चाहिए, क्रेता से वसूल किया धन भी उसे वापस करना चाहिए, अपितु सामान के मूल्य के बराबर अर्थदण्ड (जुर्माना) भी राजकोष में जमा कराना चाहिए, अन्यथा ऐसा न करने वाले को बन्दी बनाकर कारावास में डाल देना चाहिए। परेण निहितं लब्ध्वा राजन्युपहरेन्निधिम्। राजगामी निधिः सर्वः सर्वेषां ब्राह्मणादृते ॥ ६ ॥ किसी अन्य की गिरी-पड़ी सम्पत्ति को पाने वाले को वह सम्पत्ति सरकार को सौंप देनी चाहिए। राजा ब्राह्मण द्वारा प्राप्त सम्पत्ति को छोड़कर अन्य सभी वर्गों द्वारा प्राप्त सम्पत्ति को अपने अधिकार में लेने में पूर्ण समर्थ है। वस्तुतः प्रजाजनों की निजी सम्पत्ति की रक्षा करने का दायित्व निभाने वाला राजा भी तो एक प्रकार से स्वामी ही होता है। फिर स्वामी-विहीन सम्पत्ति का तो वह स्वभावतः एकमात्र स्वामी है। ब्राह्मणोऽपि निधिं लब्ध्वा क्षिप्रं राज्ञे निवेदयेत्। तेन दत्तं च भुञ्जीत स्तेनः स्यादनिवेदयन् ॥ ७ ॥ ब्राह्मण को भी किसी अन्य की गिरी-पड़ी सम्पत्ति मिलने पर उसे राजा को सौंप देना चाहिए। यदि राजा वह सम्पत्ति ब्राह्मण को भोगने के लिए दे देता है, तो ब्राह्मण उसके भोग को स्वतन्त्र है, परन्तु बिना राजा को सूचित-निवेदित किये पराई वस्तु पर अपना अधिकार मान लेने वाला ब्राह्मण भी चोर कहलाता है। स्वमप्यर्थं तथा नष्टं लब्ध्वा राज्ञे निवेदयेत्। गृह्णीयात्तत्र तं शुद्धमशुद्धं स्यात्ततोऽन्यथा ॥ ८ ॥ यदि अपना खोया हुआ धन व सामान भी मिल जाता है, तो भी राजा को सूचित निवेदित करना चाहिए। राजा द्वारा अनुग्रहपूर्वक दे देने पर उसका भोग न्यायसंगत है, अन्यथा वह भी एक प्रकार की चोरी है और दण्डनीय अपराध है। नारदस्मृति / 175

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