भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

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पृष्ठ 176
  1. अस्वामिविक्रय निक्षिप्तं वा परद्रव्यं नष्टं लब्ध्वापहृत्य वा। विक्रीयेऽसमक्षं यद्विनेयोऽस्वामिविक्रयः॥ 1 ॥ दूसरे व्यक्ति द्वारा विश्वास करके धरोहर के रूप में रखे सामान को, किसी के बन्धक में पड़े सामान को, किसी के खोये हुए सामान को प्राप्त करके या किसी के सामान को चुराकर या बलपूर्वक छीनकर अथवा छल करके किसी को बेच देना, अर्थात् अपना स्वामित्व न रखने पर भी स्वामी-जैसा व्यवहार करना 'अस्वामिविक्रय' कहलाता है। द्रव्यमस्वामिविक्रीतं प्राप्य स्वामी समाप्नुयात्। प्रकाशविक्रये शुद्धिः क्रेतुः स्तेयं रहः क्रयात्॥ 2 ॥ अस्वामिविक्रीत सामान की खोज-ख़बर लगने पर वास्तविक स्वामी अपने सामान को क्रेता से वापस ले सकता है। सार्वजनिक रूप से क्रेता को चोरी का माल ख़रीदने का दोष नहीं दिया जा सकता। हां, लुक-छिपकर बेचे गये सामान को ख़रीदने वाला अवश्य दोषी माना जाता है। अस्वाम्यनुमताद्दासादसतश्च जनाद्रहः। हीनमूल्यमवेलायां क्रीणंस्तद्दोषभाग् भवेत्॥ 3 ॥ निम्नोक्त क्रेताओं को दोषी मानना चाहिए-1. स्वामी की अनुमति के बिना सामान बेचने वाले दास से ख़रीदने वाला, 2. सामान बेच रहे बच्चों से ख़रीदने वाला, 3. लुक-छिपकर एकान्त में दूसरों की दृष्टि को बचाकर बेचने वाले से ख़रीदने वाला, 4. असमय, रात के अंधेरे में, निर्जन स्थान में बेचे जा रहे सामान को ख़रीदने वाला। मूल स्वामी को ऐसे क्रेताओं से न केवल सामान वापस लेने का पूरा अधिकार होता है, अपितु ऐसे क्रेता दण्ड के भागी भी होते हैं। न गृहीतागमं क्रेता शुद्धिस्तस्य तदागमात्। विपर्यये तुल्यदोषः स्तेयदण्डं च सोऽर्हति॥ 4 ॥ बेचने वाले के सामान के वास्तविक स्वामी होने की पुष्टि के लिए क्रय- विक्रय को सार्वजनिक करने वाला किसी प्रकार दोषी नहीं माना जा सकता। अभिप्राय यह है कि यदि क्रेता किसी प्रामाणिक व्यक्ति अथवा संस्था-पञ्च, 174 / नारदस्मृति