नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअपण—बिना किसी पूर्व शर्त अथवा आग्रह आदि के सामान्य रूप से दिया जाने वाला उत्तर—वादी द्वारा लगाये गये आरोप का खण्डन—अपण कहलाता है। स्मृतिकार नारद के अनुसार वादी-प्रतिवादी का व्यवहार एवं उत्तर आदि लिखित रूप में ही होना चाहिए, मौखिक कदापि नहीं होना चाहिए। विवादे सोत्तरपणे द्वयोर्यस्तत्र हीयते। स एव हि पणं दाप्यो विनयं च पराजये ॥ 5 ॥ प्रतिवादी द्वारा पण लगाकर उत्तर दिये जाने वाले तथा वादी द्वारा पण स्वीकार किये गये व्यवहार में पराजित होने वाले को न केवल निर्धारित पणों का भुगतान करना होता है, अपितु न्यायाधिकरण द्वारा निर्धारित दण्ड भी भुगतना पड़ता है। सारस्तु व्यवहाराणां प्रतिज्ञा समुदाहता। तद्धानौ हीयते वादी तरस्तामुत्तरो भवेत् ॥ 6 ॥ किसी भी व्यवहार में प्रतिज्ञा-रूप में जो लिपिबद्ध कर लिया जाता है, वही सार वस्तु है। उदाहरणार्थ, धन छीनने की बात लिखी जाती है, तो वही प्रतिज्ञा है। मार-पीट अथवा अंग-भंग करने की शिकायत की जाती है, तो वही प्रतिज्ञा है, पराजित होने वाला विजेता को प्रतिज्ञात ही देता है, उससे भिन्न नहीं, अर्थात् यदि धन की शिकायत की गयी है, तो जीतने वाले को पराजित होने वाले से धन ग्रहण करना होता है। यदि शरीर के किसी अंग—हाथ, पैर आदि—को क्षतिग्रस्त करने की शिकायत की गयी है, तो पराजित होने वाले को उस अंग-विशेष की क्षति- पूर्ति करनी होती है। एक अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि शिकायतं के सत्य सिद्ध होने पर ही वादी को विजयी माना जाता है, परन्तु शिकायत के असत्य सिद्ध होने पर वादी को पराजित माना जाता है। अभिप्राय यह है कि न तो प्रतिज्ञात से भिन्न किसी अन्य वस्तु की मांग की जा सकती है और न ही किसी भिन्न वस्तु पर विवाद किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त जय-पराजय का एकमात्र आधार प्रतिज्ञात वस्तु की सत्यता-असत्यता का सिद्ध होना है। न्याय-प्रक्रिया के पांच स्वर अथवा सोपान हैं— कुलानि श्रेणयश्चैव गणाश्चाधिकृतो नृपः। प्रतिष्ठा व्यवहाराणां गुर्वेभ्यस्तत्तरोत्तरम् ॥ 7 ॥ कुल—परिवार का मुखिया अथवा प्रमाणित पुरुष। श्रेणी—विभिन्न स्थानों पर समान कार्य करने वाले व्यक्तियों—अध्यापक, श्रमिक, चिकित्सक आदि—के समुदाय का प्रमुख। 16 / नारदस्मृति