नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंलिखितं साक्षिणश्चैव द्वौ विधी परिकीर्त्तितौ। सन्दिग्धार्थविशुद्धयर्थं द्वयोर्विवदमानयोः ॥ ३ ॥ किसी भी विवाद में दोनों पक्षों—वादी तथा प्रतिवादी—द्वारा अपने-अपने पक्ष में प्रस्तुत तर्कों और युक्तियों को सुनने के उपरान्त सत्य के निर्णय के लिए न्यायाधिकरण के पास दो ही साधन हैं—लिखित सामग्री तथा साक्ष्य का परीक्षण। इन दोनों में से किसी एक के भी उपलब्ध होने पर ही विशुद्ध पक्ष पर पहुंचना सम्भव होता है। टिप्पणी—वसिष्ठ, विष्णु तथा याज्ञवल्क्य प्रभृति स्मृतिकारों ने तथ्य-निर्णय के लिए प्रमाण के रूप में तीन साधन माने हैं—लिखित, साक्ष्य और भोग, अर्थात् विवादित सम्पत्ति वर्तमान में किसके अधिकार में है— लिखितं साक्षिणो भुक्तिः प्रमाणं त्रिविधं स्मृतम्। —वसिष्ठ तस्य च भाववास्चित्रो भवन्ति लिखितम्, साक्षिणः समयक्रियाच। —विष्णु प्रमाणं लिखितं भुक्तिः साक्षिणश्चेति कीर्त्तितम्। —याज्ञवल्क्य सोत्तरोऽनुत्तरश्चैव स विज्ञेयो द्विलक्षणः। सोत्तरोऽभ्यधिको यत्र विलेखापूर्वकः पणः ॥ ४ ॥ प्रत्येक व्यवहार के दो रूप-भेद होते हैं—प्रथम सोत्तर, अर्थात् वादी द्वारा लगाये गये आरोप-आक्षेप का प्रतिवादी द्वारा उत्तर देने को प्रस्तुत होना। ऐसा व्यवहार सोत्तर कहलाता है। द्वितीय अनुत्तर, अर्थात् वादी द्वारा लगाये गये आरोप का प्रतिवादी द्वारा किसी भी कारण—कलह को आगे न बढ़ाने की, अर्थात् समझौते की इच्छा, खण्डन के आधार का न होना अथवा उत्तर देने में अपनी हीनता समझना आदि— से उत्तर न देना। ऐसा व्यवहार अनुत्तर कहलाता है। सोत्तर व्यवहार में तो सत्य-असत्य के निर्धारण की आवश्यकता पड़ती है, परन्तु अनुत्तरित व्यवहार तो वहीं समाप्त हो जाता है। इसे अपराध-स्वीकृति भी माना जा सकता है और उपेक्षा-भाव भी। दोनों ही अवस्थाओं में उपयुक्त दण्ड का विधान करते हुए व्यवहार को तत्काल निपटाया जा सकता है। सोत्तर के पुनः दो प्रकार होते हैं—सपण तथा अपण। सपण—उत्तर देने वाले के अपने अपराधी सिद्ध होने पर, पणों का दण्ड भुगतने के लिए तैयार होने के साथ ही वादी के मिथ्या सिद्ध होने पर उसे दण्डित करने की शर्त पर किया जाने वाला उत्तर सपण कहलाता है। नारदस्मृति / 15