नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअभिप्राय यह है कि एक समय ऐसा भी था, जब न अन्याय होता था और न उस अन्याय के विरुद्ध विवाद अथवा दावा-मुक़द्दमा डाला जाता था। इस प्रकार न प्राड्विवाक (वकील) थे, न न्यायाधीश, न न्यायालय और न ही वादी प्रतिवादी थे। टिप्पणी — हमारे विचार में ऐसे किसी युग-विशेष अथवा क्षेत्र-विशेष की कल्पना — जहां सभी लोग सदाचारी एवं सत्यवादी हों — असम्भवप्राय ही है। सभ्यता के विकास का, तन्त्र व्यवस्था के उद्गम का तथा नियम-विनियम विधायिका का तथा स्मृतियों के अस्तित्व का मूल तत्त्व ही सबलों द्वारा निर्बलों का उत्पीड़न है। हां, मात्रा अथवा परिमाण की न्यूनता-अधिकता का होना अवश्य सर्वत्र सम्भव है। लोगों द्वारा आपसी विवादों को पञ्चों द्वारा निपटाने के प्रमाण अवश्य मिलते हैं। यदि इसे ही सत्ययुग अथवा कल्पित युग मान लिया जाये, तो बात अलग है। मनुष्यों में द्वेष, मात्सर्य तथा वैर-विरोध का न होना भी अविश्वसनीय लगता है, अन्यथा नीतिकारों को यह न मानना पड़ता— मुनेरपि वनस्थस्य स्वानि कर्माणि कुर्वतः। त्रयस्तत्र प्रजायन्ते मित्रोदासीन शत्रवः ॥ अर्थात् किसी से, किसी भी प्रकार का, कोई सम्बन्ध न रखने वाले तपोलीन एकान्तवासी मुनि के भी प्रशंसक, निन्दक और उपेक्षक बन ही जाते हैं। नष्टे धर्मे मनुष्याणां व्यवहारः प्रवर्त्तते । द्रष्टा च व्यवहाराणां राजा दण्डधरः स्मृतः ॥ २ ॥ लोगों में धर्म के प्रति आस्था घट जाने पर उनमें राग-द्वेष, ईर्ष्या-मात्सर्य तथा वैर-विरोध के भाव पनपते हैं और फिर समर्थ पुरुषों द्वारा असमर्थों को दबाया जाता है, उनके प्रति अन्याय किया जाता है। अन्याय का शिकार बने पीड़ित व्यक्ति न्यायतन्त्र से गुहार करते हैं। इसी न्याय-याचना का नाम व्यवहार अथवा मुक़द्दमा है। उस व्यवहार में सत्य की जांच-परख का, वादी-प्रतिवादी के वक्तव्यों को सुनने-परखने का, दोष की खोज और निर्णय का तथा अपराधी को दण्ड देने के रूप में अन्याय के शिकार बने प्रार्थी को न्याय देने का कार्य राजा का अथवा उसके द्वारा नियुक्त उसके प्रतिनिधि का होता है। अपराधियों को दण्ड देने का अधिकारी होने के कारण ही राजा को 'दण्डधर' कहा जाता है। राजा को इन्द्र का प्रतिनिधि माना गया है। इन्द्र का एक नाम 'सहस्त्राक्ष' है, जिसका अभिप्राय है कि राजा सर्व-समर्थ ईश्वर का रूप होने से सब कुछ देखता, सुनता, समझता, पहचानता है और धर्मसम्मत न्याय करता है। अपराधियों को दण्डित करके और धर्म की स्थापना में सहायक बनकर ही राजा अपने 'दण्डधर' विशेषण को सार्थक करता है। निस्सन्देह धर्म का पालन करने पर बुराइयों को पनपने का अवसर नहीं मिलता। 14 / नारदस्मृति