भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

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टिप्पणी—समाहार करने वाले ऋषियों की गणना में नारद का नाम दो बार आया है। सर्वप्रथम, एक लाख श्लोकों को बारह हज़ार श्लोकों में समेटकर महर्षि मार्कण्डेय को सौंपने वाले महात्मा नारद हैं तथा सभी समाहर्ताओं के अन्त में भार्गव के चार हज़ार श्लोक वाले स्मृति-ग्रन्थ के आधार पर 'व्यवहारमातृका' के रचयिता भी नारद हैं। इन दोनों स्थानों पर नाम के साथ देवर्षि जुड़ा हुआ है— भगवान् मनुरूपनिबद्ध्य देवर्षये नारदाय प्रायच्छत् 1/2 यत्रेमामादौ देवर्षि नारदः सूत्रीयां मातृकां चकार ॥ 1/6 अब यहां विचारणीय यह है कि यह देवर्षि नारद एक ही व्यक्ति है अथवा दो भिन्न व्यक्ति हैं। भण्डारकर शोध संस्थान, मुम्बई विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर सदाशिव के अनुसार—आश्चर्यजनक तो यह है कि नारद मनु को प्रथम स्मृतिकार मानते हैं और मनु अपने से पूर्ववर्ती दस स्मृतिकारों में नारद के नाम का उल्लेख करते हैं— "Manu refers to Narada while according to Manu Narada is one of the ten prajapatis, some of whom appear as law-givers." —Preface 10-11 प्रोफ़ेसर भण्डारकर के अनुसार—याज्ञवल्क्य ने तो नारद का उल्लेख ही नहीं किया। जगन्नाथपुरी संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. श्रद्धाकर सूपकर ने नारदस्मृति के रचयिता को देवर्षि नारद से भिन्न तथा मनु और याज्ञवल्क्य से परवर्ती माना है। डॉ. सूपकर ने स्मृतिकार नारद को भारत के प्राचीन धर्म-शास्त्रकारों में अग्रणी, प्रतिष्ठित, प्रामाणिक एवं योग्यतम न्यायशास्त्री मानते हुए लिखा है— "Narada is one of the most Prolific writers and one of the fore- most authorities on ancient Indian Dharmshastras. Narada seems to be a Pseudonym of a brilliant jurist of ancient India." —Foreward धर्मैकतानाः पुरुषा यदासन् सत्यवादिनः । तदा न व्यवहारोऽभून्न द्वेषो नापि मत्सरः ॥ 1 ॥ जब इस पृथ्वीतल के सभी निवासी धर्मनिष्ठ तथा सत्यवादी थे, तब लोगों में न तो ईर्ष्या-द्वेष का भाव था और न ही किसी की, किसी के द्वारा, किसी के प्रति किये गये अनुचित व्यवहार एवं अन्याय के विरुद्ध कोई शिकायत थी। जब सभी लोग न्यायपरायण, आचारवान्, उदार तथा शुद्ध व्यवहार करने वाले थे, तब न तो दुहाई थी और न ही न्याय के लिए गुहार थी। इस प्रकारे उस युग में मुक़द्दमेबाज़ी के अस्तित्व का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता था। नारदस्मृति / 13