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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

टिप्पणी—समाहार करने वाले ऋषियों की गणना में नारद का नाम दो बार आया है। सर्वप्रथम, एक लाख श्लोकों को बारह हज़ार श्लोकों में समेटकर महर्षि मार्कण्डेय को सौंपने वाले महात्मा नारद हैं तथा सभी समाहर्ताओं के अन्त में भार्गव के चार हज़ार श्लोक वाले स्मृति-ग्रन्थ के आधार पर 'व्यवहारमातृका' के रचयिता भी नारद हैं। इन दोनों स्थानों पर नाम के साथ देवर्षि जुड़ा हुआ है— भगवान् मनुरूपनिबद्ध्य देवर्षये नारदाय प्रायच्छत् 1/2 यत्रेमामादौ देवर्षि नारदः सूत्रीयां मातृकां चकार ॥ 1/6 अब यहां विचारणीय यह है कि यह देवर्षि नारद एक ही व्यक्ति है अथवा दो भिन्न व्यक्ति हैं। भण्डारकर शोध संस्थान, मुम्बई विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर सदाशिव के अनुसार—आश्चर्यजनक तो यह है कि नारद मनु को प्रथम स्मृतिकार मानते हैं और मनु अपने से पूर्ववर्ती दस स्मृतिकारों में नारद के नाम का उल्लेख करते हैं— "Manu refers to Narada while according to Manu Narada is one of the ten prajapatis, some of whom appear as law-givers." —Preface 10-11 प्रोफ़ेसर भण्डारकर के अनुसार—याज्ञवल्क्य ने तो नारद का उल्लेख ही नहीं किया। जगन्नाथपुरी संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. श्रद्धाकर सूपकर ने नारदस्मृति के रचयिता को देवर्षि नारद से भिन्न तथा मनु और याज्ञवल्क्य से परवर्ती माना है। डॉ. सूपकर ने स्मृतिकार नारद को भारत के प्राचीन धर्म-शास्त्रकारों में अग्रणी, प्रतिष्ठित, प्रामाणिक एवं योग्यतम न्यायशास्त्री मानते हुए लिखा है— "Narada is one of the most Prolific writers and one of the fore- most authorities on ancient Indian Dharmshastras. Narada seems to be a Pseudonym of a brilliant jurist of ancient India." —Foreward धर्मैकतानाः पुरुषा यदासन् सत्यवादिनः । तदा न व्यवहारोऽभून्न द्वेषो नापि मत्सरः ॥ 1 ॥ जब इस पृथ्वीतल के सभी निवासी धर्मनिष्ठ तथा सत्यवादी थे, तब लोगों में न तो ईर्ष्या-द्वेष का भाव था और न ही किसी की, किसी के द्वारा, किसी के प्रति किये गये अनुचित व्यवहार एवं अन्याय के विरुद्ध कोई शिकायत थी। जब सभी लोग न्यायपरायण, आचारवान्, उदार तथा शुद्ध व्यवहार करने वाले थे, तब न तो दुहाई थी और न ही न्याय के लिए गुहार थी। इस प्रकारे उस युग में मुक़द्दमेबाज़ी के अस्तित्व का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता था। नारदस्मृति / 13

अभिप्राय यह है कि एक समय ऐसा भी था, जब न अन्याय होता था और न उस अन्याय के विरुद्ध विवाद अथवा दावा-मुक़द्दमा डाला जाता था। इस प्रकार न प्राड्विवाक (वकील) थे, न न्यायाधीश, न न्यायालय और न ही वादी प्रतिवादी थे। टिप्पणी — हमारे विचार में ऐसे किसी युग-विशेष अथवा क्षेत्र-विशेष की कल्पना — जहां सभी लोग सदाचारी एवं सत्यवादी हों — असम्भवप्राय ही है। सभ्यता के विकास का, तन्त्र व्यवस्था के उद्गम का तथा नियम-विनियम विधायिका का तथा स्मृतियों के अस्तित्व का मूल तत्त्व ही सबलों द्वारा निर्बलों का उत्पीड़न है। हां, मात्रा अथवा परिमाण की न्यूनता-अधिकता का होना अवश्य सर्वत्र सम्भव है। लोगों द्वारा आपसी विवादों को पञ्चों द्वारा निपटाने के प्रमाण अवश्य मिलते हैं। यदि इसे ही सत्ययुग अथवा कल्पित युग मान लिया जाये, तो बात अलग है। मनुष्यों में द्वेष, मात्सर्य तथा वैर-विरोध का न होना भी अविश्वसनीय लगता है, अन्यथा नीतिकारों को यह न मानना पड़ता— मुनेरपि वनस्थस्य स्वानि कर्माणि कुर्वतः। त्रयस्तत्र प्रजायन्ते मित्रोदासीन शत्रवः ॥ अर्थात् किसी से, किसी भी प्रकार का, कोई सम्बन्ध न रखने वाले तपोलीन एकान्तवासी मुनि के भी प्रशंसक, निन्दक और उपेक्षक बन ही जाते हैं। नष्टे धर्मे मनुष्याणां व्यवहारः प्रवर्त्तते । द्रष्टा च व्यवहाराणां राजा दण्डधरः स्मृतः ॥ २ ॥ लोगों में धर्म के प्रति आस्था घट जाने पर उनमें राग-द्वेष, ईर्ष्या-मात्सर्य तथा वैर-विरोध के भाव पनपते हैं और फिर समर्थ पुरुषों द्वारा असमर्थों को दबाया जाता है, उनके प्रति अन्याय किया जाता है। अन्याय का शिकार बने पीड़ित व्यक्ति न्यायतन्त्र से गुहार करते हैं। इसी न्याय-याचना का नाम व्यवहार अथवा मुक़द्दमा है। उस व्यवहार में सत्य की जांच-परख का, वादी-प्रतिवादी के वक्तव्यों को सुनने-परखने का, दोष की खोज और निर्णय का तथा अपराधी को दण्ड देने के रूप में अन्याय के शिकार बने प्रार्थी को न्याय देने का कार्य राजा का अथवा उसके द्वारा नियुक्त उसके प्रतिनिधि का होता है। अपराधियों को दण्ड देने का अधिकारी होने के कारण ही राजा को 'दण्डधर' कहा जाता है। राजा को इन्द्र का प्रतिनिधि माना गया है। इन्द्र का एक नाम 'सहस्त्राक्ष' है, जिसका अभिप्राय है कि राजा सर्व-समर्थ ईश्वर का रूप होने से सब कुछ देखता, सुनता, समझता, पहचानता है और धर्मसम्मत न्याय करता है। अपराधियों को दण्डित करके और धर्म की स्थापना में सहायक बनकर ही राजा अपने 'दण्डधर' विशेषण को सार्थक करता है। निस्सन्देह धर्म का पालन करने पर बुराइयों को पनपने का अवसर नहीं मिलता। 14 / नारदस्मृति

लिखितं साक्षिणश्चैव द्वौ विधी परिकीर्त्तितौ। सन्दिग्धार्थविशुद्धयर्थं द्वयोर्विवदमानयोः ॥ ३ ॥ किसी भी विवाद में दोनों पक्षों—वादी तथा प्रतिवादी—द्वारा अपने-अपने पक्ष में प्रस्तुत तर्कों और युक्तियों को सुनने के उपरान्त सत्य के निर्णय के लिए न्यायाधिकरण के पास दो ही साधन हैं—लिखित सामग्री तथा साक्ष्य का परीक्षण। इन दोनों में से किसी एक के भी उपलब्ध होने पर ही विशुद्ध पक्ष पर पहुंचना सम्भव होता है। टिप्पणी—वसिष्ठ, विष्णु तथा याज्ञवल्क्य प्रभृति स्मृतिकारों ने तथ्य-निर्णय के लिए प्रमाण के रूप में तीन साधन माने हैं—लिखित, साक्ष्य और भोग, अर्थात् विवादित सम्पत्ति वर्तमान में किसके अधिकार में है— लिखितं साक्षिणो भुक्तिः प्रमाणं त्रिविधं स्मृतम्। —वसिष्ठ तस्य च भाववास्चित्रो भवन्ति लिखितम्, साक्षिणः समयक्रियाच। —विष्णु प्रमाणं लिखितं भुक्तिः साक्षिणश्चेति कीर्त्तितम्। —याज्ञवल्क्य सोत्तरोऽनुत्तरश्चैव स विज्ञेयो द्विलक्षणः। सोत्तरोऽभ्यधिको यत्र विलेखापूर्वकः पणः ॥ ४ ॥ प्रत्येक व्यवहार के दो रूप-भेद होते हैं—प्रथम सोत्तर, अर्थात् वादी द्वारा लगाये गये आरोप-आक्षेप का प्रतिवादी द्वारा उत्तर देने को प्रस्तुत होना। ऐसा व्यवहार सोत्तर कहलाता है। द्वितीय अनुत्तर, अर्थात् वादी द्वारा लगाये गये आरोप का प्रतिवादी द्वारा किसी भी कारण—कलह को आगे न बढ़ाने की, अर्थात् समझौते की इच्छा, खण्डन के आधार का न होना अथवा उत्तर देने में अपनी हीनता समझना आदि— से उत्तर न देना। ऐसा व्यवहार अनुत्तर कहलाता है। सोत्तर व्यवहार में तो सत्य-असत्य के निर्धारण की आवश्यकता पड़ती है, परन्तु अनुत्तरित व्यवहार तो वहीं समाप्त हो जाता है। इसे अपराध-स्वीकृति भी माना जा सकता है और उपेक्षा-भाव भी। दोनों ही अवस्थाओं में उपयुक्त दण्ड का विधान करते हुए व्यवहार को तत्काल निपटाया जा सकता है। सोत्तर के पुनः दो प्रकार होते हैं—सपण तथा अपण। सपण—उत्तर देने वाले के अपने अपराधी सिद्ध होने पर, पणों का दण्ड भुगतने के लिए तैयार होने के साथ ही वादी के मिथ्या सिद्ध होने पर उसे दण्डित करने की शर्त पर किया जाने वाला उत्तर सपण कहलाता है। नारदस्मृति / 15

अपण—बिना किसी पूर्व शर्त अथवा आग्रह आदि के सामान्य रूप से दिया जाने वाला उत्तर—वादी द्वारा लगाये गये आरोप का खण्डन—अपण कहलाता है। स्मृतिकार नारद के अनुसार वादी-प्रतिवादी का व्यवहार एवं उत्तर आदि लिखित रूप में ही होना चाहिए, मौखिक कदापि नहीं होना चाहिए। विवादे सोत्तरपणे द्वयोर्यस्तत्र हीयते। स एव हि पणं दाप्यो विनयं च पराजये ॥ 5 ॥ प्रतिवादी द्वारा पण लगाकर उत्तर दिये जाने वाले तथा वादी द्वारा पण स्वीकार किये गये व्यवहार में पराजित होने वाले को न केवल निर्धारित पणों का भुगतान करना होता है, अपितु न्यायाधिकरण द्वारा निर्धारित दण्ड भी भुगतना पड़ता है। सारस्तु व्यवहाराणां प्रतिज्ञा समुदाहता। तद्धानौ हीयते वादी तरस्तामुत्तरो भवेत् ॥ 6 ॥ किसी भी व्यवहार में प्रतिज्ञा-रूप में जो लिपिबद्ध कर लिया जाता है, वही सार वस्तु है। उदाहरणार्थ, धन छीनने की बात लिखी जाती है, तो वही प्रतिज्ञा है। मार-पीट अथवा अंग-भंग करने की शिकायत की जाती है, तो वही प्रतिज्ञा है, पराजित होने वाला विजेता को प्रतिज्ञात ही देता है, उससे भिन्न नहीं, अर्थात् यदि धन की शिकायत की गयी है, तो जीतने वाले को पराजित होने वाले से धन ग्रहण करना होता है। यदि शरीर के किसी अंग—हाथ, पैर आदि—को क्षतिग्रस्त करने की शिकायत की गयी है, तो पराजित होने वाले को उस अंग-विशेष की क्षति- पूर्ति करनी होती है। एक अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि शिकायतं के सत्य सिद्ध होने पर ही वादी को विजयी माना जाता है, परन्तु शिकायत के असत्य सिद्ध होने पर वादी को पराजित माना जाता है। अभिप्राय यह है कि न तो प्रतिज्ञात से भिन्न किसी अन्य वस्तु की मांग की जा सकती है और न ही किसी भिन्न वस्तु पर विवाद किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त जय-पराजय का एकमात्र आधार प्रतिज्ञात वस्तु की सत्यता-असत्यता का सिद्ध होना है। न्याय-प्रक्रिया के पांच स्वर अथवा सोपान हैं— कुलानि श्रेणयश्चैव गणाश्चाधिकृतो नृपः। प्रतिष्ठा व्यवहाराणां गुर्वेभ्यस्तत्तरोत्तरम् ॥ 7 ॥ कुल—परिवार का मुखिया अथवा प्रमाणित पुरुष। श्रेणी—विभिन्न स्थानों पर समान कार्य करने वाले व्यक्तियों—अध्यापक, श्रमिक, चिकित्सक आदि—के समुदाय का प्रमुख। 16 / नारदस्मृति

गण—एक ही जाति अथवा सम्प्रदाय का प्रतिनिधित्व करने वाला श्रेष्ठ पुरुष। मनोनीत—आज के नियमित नियुक्ति पाने वाले न्यायाधीशों के समान ही राजा द्वारा नियुक्त योग्य न्यायविद्। स्वयं राजा—इनमें पूर्व से ऊपर-ऊपर वरीय हैं, अर्थात् कुल से श्रेणी, श्रेणी से गण, गण से अधिकृत न्यायाधीश तथा उससे ऊपर राजा है। प्रत्येक ऊपर वाला न्यायाधिकरण नीचे वाली न्यायिक संस्था के निर्णय पर पुनः विचार करने में, यहां तक कि उसके निर्णय को निरस्त करने में सक्षम है। टिप्पणी—इसी तथ्य का समर्थन याज्ञवल्क्यस्मृति में भी हुआ है- नृपेणाधिकृताः पूगाः श्रेणयोऽथ कुलानि च। पूर्वं पूर्वं गुरुं ज्ञेयं व्यवहारविधौ नृणाम्॥ नारद के गण शब्द के स्थान पर ही याज्ञवल्क्य ने 'पूग' शब्द का प्रयोग किया है। आजकल भी न्याय-व्यवस्था के पांच स्तर हैं—कनिष्ठ न्यायाधीश (सब जज), वरिष्ठ न्यायाधीश (सीनियर जज), मण्डल न्यायाधीश (सेशन जज), उच्च न्यायालय (हाई कोर्ट) तथा सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट)। राजा का स्थान आज के राष्ट्राध्यक्ष के समकक्ष समझना चाहिए। आज जिस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को पलटने-क्षमायाचना को स्वीकार करने आदि का अधिकार राष्ट्रपति को है, नारद वही स्थिति राजा की घोषित करते हैं। स चतुष्पाच्चतुः स्थानश्चतुः साधन एव च। चतुर्हितश्चतुर्व्यापी चतुष्कारी च कीर्त्त्यते ॥ 8 ॥ अष्टाङ्गोऽष्टादशपदः शतशाखस्तथैव च। त्रियोनिर्द्व्यभियोगश्च द्विद्वारो द्विगतिस्तथा ॥ 9 ॥ यह विवाद-मुकदमा—चतुष्पाद, अर्थात्—धर्म, व्यवहार, चरित्र और राज- शासन, चतुः स्थानीय, अर्थात्—सभ्य-साक्षी, पुस्तक, रण तथा राजा की आज्ञा, चतुः साधन, अर्थात् चार साधनों-साम, दान, भेद और दण्ड, चतुर्हित, अर्थात् चारों वर्णों—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—का हितसाधक, चतुर्व्यापी, कर्ता, साक्षी, सभ्य तथा राजा को प्रभावित करने वाला, धर्म, अर्थ, यश तथा लोकरञ्जन का साधक होने से चतुष्कारी-चार कार्यों का सम्पादक, राजा के अष्ट अंगों- सन्धि, विग्रह, यान, आसन, संशय, द्वैधीभाव से सम्बन्धित होने के कारण अष्टांग (आठ अंगों वाला), ऋणदान आदि अठारह विषयों वाला होने से अष्टादशमुखी, शत-प्रतिशत शाखाओं वाला, काम, क्रोध और लोभ से उत्पन्न होने के कारण त्रियोनि है। भीतर और बाहर भयोत्पादक होने से द्विमुख, वादी-प्रतिवादी के सम्बन्ध से द्वि-द्वार तथा सत्य और छल से समन्वित रहने के कारण द्विःगति कहा जाता है। नारदस्मृति / 17

इस प्रकार नारदजी ने व्यवहार के निम्नोक्त तत्त्वों का उल्लेख किया है—पाद, स्थान, साधन, हित, व्यापकता, कार्य, अंग, पद, शाखा, अभियोग, योनि (उत्पत्ति स्थान), द्वार तथा गति। धर्म, व्यवहार, चरित्र और राजशासन को चरण माना गया है; क्योंकि इन्हीं से यह चलता-आगे बढ़ता है। इसकी स्थिति के चार स्थान हैं—सज्जन का साक्ष्य, लिखित प्रमाण, कलह-संघर्ष तथा राज्ञाज्ञा। इसे निपटाने के चार साधन—समझाना- बुझाना, कुछ देना-दिलाना, फूट डालना तथा दण्ड देना—चारों वर्गों के लोगों के हितसाधक हैं। एक साथ चारों—मुक़दमा करने वाला, साक्षी, समाज तथा प्रशासन— को प्रभावित करने वाला होने से यह चतुर्व्यापी—चारों ओर व्यापक—है। सत्यनिर्णय देने के रूप में यह धर्म, अर्थ और यश की प्रतिष्ठा तथा लोकरञ्जन आदि चारों उद्देश्यों (कार्यों) का पूरक (चतुष्कारी) है। प्रत्येक विवाद की उत्पत्ति काम से अथवा क्रोध से मानी जाती है। राजा के सन्धि, विग्रह आदि आठ अंगों के समान अभियोग भी आठ अंगों वाला होता है। इसके ऋण, दान आदि अठारह भेद हैं व सैकड़ों शाखाएं हैं। यह न केवल शारीरिक कष्ट को उत्पन्न करता है, अपितु मानसिक क्लेश-उद्वेग को भी जन्म देता है। इस प्रकार ये दो रूपों में अभियुक्त— आक्रान्त करने वाला—है। वादी-प्रतिवादी दो द्वार कहे जाते हैं तथा सत्य और छल का प्रयोग होने से इसकी दो गतियां (चालें) मानी गयी हैं। इस प्रकार प्रत्येक मुक़द्दमे के तेरह अंग होते हैं, जिनका विवरण अगले पद्यों में प्रस्तुत किया गया है। धर्मश्च व्यवहारश्च चरित्रं राजशासनम्। चतुष्पाद् व्यवहारोऽयमुत्तरः पूर्वबाधकः ॥ 10 ॥ लेन-देन के चार रूप-भेद हैं-धर्म, व्यवहार, चरित्र और राजाज्ञा। धर्म से व्यवहार को, व्यवहार से चरित्र को और चरित्र से राजाज्ञा को वरीयता प्राप्त है। उदाहरणार्थ, धर्म किसी विषय-नियोग, कन्याहरण तथा द्यूत आदि-की अनुमति देता है, परन्तु फिर भी व्यक्ति उसके विरुद्ध न्यायालय में प्रार्थना करता है, तो व्यवहार चलेगा। धर्म के विरुद्ध की गयी याचना की भी सुनवाई होगी। इसी प्रकार जिसके विरुद्ध आरोप लगाया गया है, यदि उसका चरित्र निष्कलंक है और अभियोग लगाने वाले के पास प्रमाण का अभाव है, तो चरित्र को प्रबलता प्राप्त होगी, परन्तु राजाज्ञा अन्तिम प्रमाण है। उसके सामने अन्य सभी कुछ गौण है। तत्र सत्ये स्थितो धर्मो व्यवहारस्तु साक्षिषु। चरित्रं पुस्तकरणे राजाज्ञायां तु शासनम् ॥ 11 ॥ 18 / नारदस्मृति

धर्म, व्यवहार, चरित्र और शासन को निम्नोक्त रूप से परिभाषित किया गया है— धर्म—प्रतिवादी द्वारा अपने ऊपर वादी द्वारा लगाये गये आरोप को स्वीकार करना। किसी प्रकार से उसका खण्डन अथवा उसके विरुद्ध तर्क-वितर्क न करना, अर्थात् समर्पण करना, अपने को अपराधी मान लेना और दण्ड ग्रहण करने को प्रस्तुत होना। व्यवहार—वादी द्वारा लगाये गये आरोप को प्रतिवादी द्वारा नकारना और साक्षियों द्वारा वादी के कथन की पुष्टि होना। चरित्र—वादी द्वारा प्रस्तुत विषय की पुष्टि के लिए लिखित प्रमाण की अपेक्षा करना। शासन—राजा द्वारा दिया गया निर्णय। टिप्पणी—नारदजी ने इन चारों में—'उत्तरः पूर्वबाधकः' कहा है, अर्थात् धर्म से व्यवहार को, व्यवहार से चरित्र को और चरित्र से भी राजा को और देश को प्रबल माना है, परन्तु हमारे विचार में तो यह उलटी गंगा बहाना है। जहां प्रतिवादी अपने ऊपर लगाये गये आरोपों का विरोध ही नहीं करता, दण्ड के लिए अपने को प्रस्तुत कर देता है, उससे उत्तम स्थिति भला और क्या हो सकती है ? यहां न तो साक्ष्य की, न लिखित प्रमाण की और न ही राजा (न्यायाधिकरण) के हस्तक्षेप की आवश्यकता है। यह तो सर्वोत्तम स्थिति मान्य होनी चाहिए। हां, सत्य को नकारने पर साक्ष्य का और साक्ष्य की अपेक्षा लिखित प्रमाण का सापेक्ष महत्त्व अवश्य है। राजाज्ञा तो सदैव अन्तिम रूप से सर्वमान्य रही है। इस प्रकार धर्म को नकारने पर ही तीनों की भूमिका प्रारम्भ होती है, धर्मपालन करने पर तो इनकी आवश्यकता ही नहीं पड़ती। असहाय भाष्यकार ने इन चारों—धर्म, व्यवहार, चरित्र और शासन—को इस प्रकार परिभाषित किया है— धर्म—उत्तमर्ण और अधमर्ण (ऋण देने-लेने वाले) द्वारा एकान्त में लेन- देन करने पर भी दोनों का सत्य से विचलित न होना, अर्थात् ऋणकर्ता लिये गये ऋण से मुकरता तो नहीं है, परन्तु दे पाने में अपनी असमर्थता को प्रकट करता है। व्यवहार—दोनों—धनिक और ऋणकर्ता—द्वारा किसी भी समय, किसी के मन में, किसी प्रकार के दोष के आ जाने की आशंका से बचने के लिए, किसी विश्वस्त व्यक्ति को साक्षी के रूप में मध्यस्थ बनाकर लेन-देन करना। चरित्र—दोनों—लेन-देन करने वालों—द्वारा निर्धारित शर्तों और लेन-देन की राशि आदि को काग़ज़, भोजपत्र, वस्त्र अथवा काष्ठखण्ड पर अंकित करना। शासन—न्यायालय-परिसर में जाकर अधिकृत लेखक (अर्जीनवीस यानी नारदस्मृति / 19

Petition Writer ) से विधिमान्य शर्तों पर लेन-देन की राशि और शर्तों को सरकारी कागज़ पर लिपिबद्ध कराना। हमारे विचार में असहाय भाष्यकार द्वारा प्रस्तुत परिभाषाएं पूर्णतः व्यावहारिक एवं तर्कसंगत होने से अधिक मान्य होनी चाहिए। सामाद्युपायसाध्यत्वाच्चतुः साधन उच्यते। चतुर्णामाश्रमाणां च रक्षणात् स चतुर्हितः ॥ 12 ॥ व्यवहार को चतुःसाधन और चतुर्हित बताते हुए इन दोनों की व्याख्या इस प्रकार की गयी है-व्यवहार, उपाय कहे जाने वाले चार साधनों से साध्य होने के कारण चतुःसाधन कहलाता है। वे चार उपाय अथवा साधन हैं-साम, दान, भेद और दण्ड। इसी प्रकार चारों-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-वर्णों और चारों- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रमों के लोगों के हितों का रक्षक होने से यह चतुर्हित कहलाता है। टिप्पणी-अपने कार्य की सिद्धि में कुशलता का नाम उपाय है और राजनीति में इनकी संख्या चार बतायी गयी है- साम-प्रिय-मधुर-वाणी से प्रबोधन । दान-धन-धरती देना अथवा अपराध क्षमा करना अथवा पुरस्कृत करना, अर्थात् कृपापात्र बनना। भेद-उपकारी को उसके मित्रों, सहायकों एवं शुभचिन्तकों से अलग- थलग कर देना। दण्ड-धन-सम्पत्ति छीन लेना, पिटवाना, जेल में डालना अथवा प्राणहरण करना। 'मत्स्यपुराण' में चार के स्थान पर निम्नोक्त सात उपाय बताये गये हैं- साम भेदस्तथा दानं दण्डं च मनुजेश्वर! उपेक्षा च तथा माया इन्द्रजालं च पार्थिव! प्रयोगाः कथिताः सप्त तन्मे निगदतः शृणु। कर्त्तृनथो साक्षिणश्च सभ्यान् राजानमेव च। व्याप्नोति पादशो यस्माच्चतुर्व्यापी ततः स्मृतः ॥ 13 ॥ व्यवहार की एक विशेषता उसका चतुर्व्यापी होना है। किसी भी मुकद्दमे का चार पक्षों से सम्बन्ध बना-जुड़ा रहता है-कर्ता-रूप में वादी और प्रतिवादी, साक्षी (आज की भाषा में ज्यूरी), न्यायाधिकरण, अर्थात् धर्माधिकारियों की संस्था के सदस्य (Jury के सदस्य) तथा स्वयं राजा (न्यायाधीश) प्रत्येक व्यवहार से ये चारों सम्बन्धित रहते हैं। इस प्रकार इन चारों को व्यापने वाला होने से व्यवहार चतुर्व्यापी कहलाता है। 20 / नारदस्मृति

टिप्पणी—असहाय भाष्यकार के अनुसार प्रत्येक मुक़दमे के प्रक्रियागत चार चरण होते हैं— उद्घाटन—वादी-प्रतिवादी मुक़दमे का प्रारम्भ करते हैं। प्रतिष्ठापन—साक्षी मुक़दमे को स्थिरता प्रदान करते हैं। निभालन—न्यायाधिकरण के सदस्य युक्ति-प्रत्युक्ति की जांच-परख करते हैं और अपने-अपने मत प्रस्तुत करते हैं। निर्णय-विज्ञापन—न्यायाधीश (राज-प्रतिनिधि) निर्णय घोषित करता है। इस प्रकार मुक़दमा चतुष्पाद और चतुर्व्यापी है। धर्मस्यार्थस्य यशसो लोकपङ्क्तेस्तथैव च। चतुर्णां करणादेषां चतुष्कारीति चोच्यते ॥ 14 ॥ मुक़दमा चतुष्कारी—चार उपकार करने वाला—है। वह धर्म व अर्थ की रक्षा, यश का प्रसार और लोगों के पारस्परिक अनुराग में वृद्धि करता है। अन्याय के विरुद्ध न्याय का संरक्षण धर्म की रक्षा है। प्रायः प्रत्येक मुक़दमा किसी-न-किसी रूप में धन-सम्पत्ति से जुड़ा होता है। धन हड़पने वाले से पीड़ित को धन लौटवाना अर्थ की रक्षा है। मुक़दमा जीतने वाला लोक में सम्मानित होता है, उसका यश बढ़ता है। मुक़दमे के भय से लोग एक-दूसरे से द्रोह नहीं करते, स्नेह-भाव से रहते हैं। इस प्रकार मुक़दमा चार प्रकार से लोगों का हित-साधन करता है। राजा सत्पुरुषः सभ्याः शास्त्रं गणकलेखकौ। हिरण्यमग्निरुदकमष्टाङ्गः समुदाहृतः ॥ 15 ॥ मुक़दमे के आठ अंग इस प्रकार हैं—आचारनिष्ठ राजा अथवा राजा द्वारा नियुक्त-मनोनीत न्यायाधीश, न्यायाधिकरण (ज्यूरी) के सदस्य, शास्त्र, अर्थात् न्यायसंहिता (पैनलकोड), गणक (लेखाधिकारी), लेखक, हिरण्य, अर्थात् स्वर्ण (कोर्ट-फ़ीस), अग्नि और जल। टिप्पणी—(1) आज न्यायालय में जिस प्रकार वक्तव्य से पूर्व वादी- प्रतिवादी को गीता, क़ुरान अथवा बाईबल पर हाथ रखवा कर शपथ दिलायी जाती है, प्राचीनकाल में अपने वक्तव्य से पूर्व हाथ में जल लेकर, सत्यभाषण की शपथ ली जाती थी और सत्य की परीक्षा के लिए अग्नि में हाथ डाला जाता था। ऐसी मान्यता है कि सत्यवक्ता के लिए अग्नि शीतल हो जाती थी और इसके विपरीत मिथ्याभाषी के लिए दाहक हो जाती थी। इसी सन्दर्भ में आठ अंगों में जल और अग्नि परिगणित हैं। (2) असहाय भाष्यकार ने हिरण्य को हिरण्यगर्भ (ब्रह्म) का प्रतीक मानते हुए हिरण्य, जल और अग्नि को प्रत्यक्ष देवता के रूप में ग्रहण किया है। उनके नारदस्मृति / 21

अनुसार—'हिरण्यमग्निरुदकमिति एतान्यपि प्रत्यक्षदेवतास्वरूपाणि।' हिरण्य का एक अन्य अर्थ राष्ट्रीय मुद्रा—धन की देवी—लक्ष्मी भी लिया जाता है। इन देवों के समक्ष व्यक्ति द्वारा मिथ्याभाषण न करने की सम्भावना बढ़ जाती है—ऐसी प्राचीन परम्परागत मान्यता प्रचलित रही है। व्यवहार के निम्नोक्त अठारह पद हैं, अर्थात् इन विषयों पर झगड़ा होने की स्थिति में मुकद्दमा चलाया जा सकता है— ऋणादानं ह्युपनिधिः सम्भूयोत्थानमेव च। दत्तस्य पुनरादानमशुश्रूषाभ्युपेत्य च॥ 16 ॥ वेतनस्यानपाकर्म तथैवास्वामिविक्रयः। विक्रियासम्प्रदानं च क्रीत्वानुशय एव च॥ 17 ॥ समयस्यानपाकर्म विवादः क्षेत्रजस्तथा। स्त्रीपुंसयोश्च सम्बन्धो दायभागोऽथ साहसम्॥ 18 ॥ वाक्पारुष्यं तथैवोक्तं दण्डपारुष्यमेव च। द्यूतं प्रकीर्णकं चैवेत्यष्टादशपदः स्मृतः॥ 19 ॥ एषामेव प्रभेदोऽन्यो द्वात्रिंशदधिकं शतम्। क्रियाभेदान्मनुष्याणां शतशाखो निगद्यते॥ 20 ॥

  1. ऋण के लेन-देन से सम्बन्धित विवाद।
  2. उपनिधि—धरोहर को न लौटाने तथा उसमें गड़बड़ी करने से सम्बन्धित।
  3. सम्भूयसमुत्थान—संयुक्त श्रम के फल का विभाजन।
  4. किसी को दिये गये पदार्थ को उससे वापस मांगना।
  5. सेवा का वचन देकर सेवा न करना।
  6. वेतन लेकर सेवा न करना अथवा सेवा लेकर वेतन न चुकाना।
  7. किसी वस्तु का स्वामी न होने पर भी उसे बेचना।
  8. किसी वस्तु को बेचकर क्रेता को न देना।
  9. किसी वस्तु को ख़रीदकर (सौदा करके) क्रेता द्वारा मुकर जाना अथवा सामान न उठाना।
  10. पाखण्ड-खण्डन।
  11. भूमि सम्बन्धी विवाद।
  12. स्त्री-पुरुष के सम्बन्धों में दरार सम्बन्धी विवाद।
  13. दाय-भाग (भाइयों में पैतृक सम्पत्ति के विभाजन) सम्बन्धी विवाद।
  14. साहस—डाका, बलात्कार।
  15. दण्डपारुष्य (मार-पीट करना अथवा बन्दी बनाना)
  16. वाक्पारुष्य-गाली-गलौच करना। 22 / नारदस्मृति
  1. द्यूत—धन दांव पर लगाकर जुआ खेलना।
  2. प्रकीर्णक—उपर्युक्त समूह में न आने वाले सभी अन्य विषय—झगड़े पर लिया गया मकान ख़ाली न करना, बन्धक रखी धरती आदि को न लौटाना, दूसरे की सम्पत्ति पर अनधिकृत क़ब्ज़ा करना, किसी की पत्नी को छीन लेना तथा किसी का अपहरण करना आदि। अठारह प्रकार के इन विवादों के अनेक भेद-प्रभेद हैं। आचार्यों ने इनकी संख्या एक सौ बत्तीस मानी है। वैसे मनुष्यों के साक्ष्य तथा प्रमाण आदि क्रिया के भेद-व्यवहार (मुकदमे) की सैकड़ों शाखाएं हो जाती हैं। ऋणादानं पञ्चविंशति षडौपनिधिके स्मृताः। सम्भूयोत्थे त्रयो भेदाश्चतुर्दत्ताप्रदानके ॥ 21 ॥ नवभेदा अशुश्रूषा वेतनं स्याच्चतुर्विधम् । अस्वामिविक्रये तु द्वौ विक्रियादानमेकधा ॥ 22 ॥ क्रीत्वा मुक्तं चतुर्भेदं समयाकार्यमेकधा। क्षेत्रवादो द्वादशधा स्त्रीपुंसोर्भेदविंशतिः ॥ 23 ॥ दायभागे तु एकोना भेदा द्वादश साहसे । वाग्दण्डपारुष्योस्तु द्वयोर्भेदास्त्रयः स्मृताः ॥ 24 ॥ द्यूताह्वयं चैकभेदं षड्भेदं तु प्रकीर्णकम्। एवमेषां प्रभेदानां द्वात्रिंशच्छतमेव वै॥ 25 ॥ विवाद के बहुमुखी होने के तथ्य की पुष्टि करते हुए स्मृतिकार नारद लिखते हैं—उदाहरणार्थ, ऋण के लेन-देन के पच्चीस, धरोहर में गड़बड़ी करने-न करने के सात, संयुक्त श्रम के फल-विभाजन सम्बन्धी विवाद के तीन, किसी वस्तु को देकर वापस मांगने के चार, सेवा करने के नौ, सेवा लेकर पारिश्रमिक न देने के चार, स्वामी न होने पर सम्पत्ति का विक्रय करने के बारह, विक्रय करके क़ब्ज़ा न देने का एक, ख़रीदकर दाम न चुकाने अथवा मुकर जाने के चार, पाखण्ड-खण्डन का एक, क्षेत्र सम्बन्धी विवाद के बत्तीस, स्त्री-पुरुष के आपसी सम्बन्ध के बीस, दाय-भाग के उन्नीस, साहस के बारह, वाक्पारुष्य के तीन, दण्डपारुष्य के तीन, द्यूत का एक और प्रकीर्णक के छह भेद हैं। इन सभी भेदों के अतिरिक्त न जाने कितने अन्य अज्ञात भेद नित्य-प्रति जन्म लेते और प्रकाश में आते रहते हैं। कामात् क्रोधाच्च लोभाच्च त्रिभ्यो यस्मात् प्रवर्त्तते। त्रियोनिः कीर्त्त्यते तेन त्रयमेतद् विवादकृत् ॥ 26 ॥ सभी प्रकार के विवादों के मूल अथवा उत्पत्ति-स्थल तीन हैं—काम, क्रोध और लोभ। इन तीनों के कारण ही किसी विवाद का जन्म होता है। इसलिए विवाद को त्रियोनि कहा जाता है। नारदस्मृति / 23

द्व्यभियोगस्तु विज्ञेयः शङ्कातत्त्वाभियोगतः । शङ्का सतां तु संसर्गात्तत्त्वं होढाभिदर्शनात् ॥ २७ ॥ अभियोग दो प्रकार का होता है— प्रथम, शंकाभियोग—असज्जन—न्याय को महत्त्व न देने वाले तथा अन्याय में प्रवृत्त—के सम्पर्क में आने पर हानि की आशंका से किया जाने वाला अभियोग। द्वितीय, तत्त्वाभियोग—किसी को दूसरे के धन को चुराता देखकर अपने धन के चुराये जाने की आशंका से उत्पन्न होने वाला अभियोग। 'स्मृतिचन्द्रिका' में तत्त्वाभियोग को पुनः दो प्रकार का माना गया है— प्रतिषेधात्मक तथा विधेयात्मक। टिप्पणी—(1) स्मृतिचन्द्रिका व्यवहार के अनुसार—द्यूतकार और स्तेन आदि दुर्जनों के साथ रहने वाले साधु-महात्मा द्वारा भी चोरी आदि किये जाने की आशंका उत्पन्न हो जाती है—'कितवस्तेनाद्यसद्भिः संसर्गात्साध्वपि स्तेयादिशंका भवति।' इससे तत्त्वाभियोग का निषेधात्मक रूप भी सिद्ध होता है। (2) असहाय भाष्यकार ने अपने अधिकार वाले धन को धन तथा दूसरे द्वारा अपहृत अथवा नष्ट धन को 'होढ़' कहा है—'स्वकीयं द्रव्यं द्रव्यं यन्नष्टं तत् होढ- मुच्यते।' पक्षद्वयाभिसम्बन्धाद् द्विद्वारं समुदाहृतः । पूर्ववादस्तयोः पक्षः प्रतिपक्षस्तदुत्तरम् ॥ २८ ॥ व्यवहार में दो पक्षों—वादी तथा प्रतिवादी अथवा व्यवहार करने वाला और व्यवहार का केन्द्र, दूसरे शब्दों में शिकायत करने वाला और शिकायत का आधार बनने वाला—की नित्य स्थिति के कारण व्यवहार को दो द्वारों वाला कहा जाता है। वादी अथवा शिकायती को पक्षी और प्रतिवादी अथवा शिकायत का उत्तर देने वाले को प्रतिपक्षी कहा जाता है। भूतच्छलानुसारित्वाद्विगतिः स उदाहृतः । भूतं तत्त्वार्थसंयुक्तं प्रमादाभिहितं छलम् ॥ २९ ॥ व्यवहार में दो ही पहलू अपनाये जाते हैं—(1) सत्य का पक्ष ग्रहण किया जाता है अथवा (2) छल-कपट को अपनाया जाता है। इस कारण व्यवहार की दो गतियां मानी जाती हैं—भूत और छल। टिप्पणी—'सरस्वती विलास' में सत्य व्यवहार के सत्रह और छल व्यवहार के प्रकीर्ण के समान अनन्त भेद माने गये हैं—'भूतच्छलानुरोधेन द्विगतिः समुदाहृता' इति व्यवहारस्य छलानुसारणं तत्त्वानुसारणमिति गतिद्वयमुक्तम्। तत्र तत्त्वानुसारणेन सप्तदश विवादपदान्यनुक्रान्तानि। छलानुरणेन प्रकीर्णकाख्यं विवादपदमनुक्रान्तमिति। 24 / नारदस्मृति

दिव्यान्‍याप्यप्रमाणानि नीयन्ते वाक्यवञ्चकैः । देशकालप्रमाणादावप्रमादो भवेदतः ॥ ३० ॥ वञ्चक, दुर्जन तथा वाणी-कुशल आदि चतुर पुरुष मानवीय प्रमाणों—साक्षी, लेख तथा अधिकार आदि—के अभाव में अग्नि या जल आदि दिव्य प्रमाणों की उपेक्षा करके अपना पक्ष प्रस्तुत करने लग जाते हैं। अतः विवाद से सम्बन्धित व्यक्तियों को देश, काल और प्रमाण आदि के सम्बन्ध में विशेष सावधान रहना चाहिए, प्रमाद कदापि नहीं करना चाहिए, अन्यथा उनके द्वारा ठगे जाने की सम्भावना बढ़ जाती है। तत्र शिष्टं छलं राजा मर्षयेद् धर्मसाधनः । भूतमेव प्रपद्येत धर्ममूला यतः श्रियः ॥ ३१ ॥ राजा की लक्ष्मी और कीर्ति धर्म पर आश्रित होती है, अर्थात् धर्म की रक्षा करने से ही राजा के यश का प्रसार और धन का विस्तार होता है। अतः राजा के लिए न्याय के अनुसार व्यवहार करना आवश्यक है। उसे देखना चाहिए कि वादी का अभियोग मिथ्या है अथवा सत्य है। उसे सत्य के निर्णय के लिए सदैव सत्पथ का ग्रहण करना चाहिए, अर्थात् राग-द्वेष से सर्वथा मुक्त होकर निष्पक्ष दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। टिप्पणी — असहाय भाष्यकार के अनुसार—यदि मिथ्या अभियोग लगाने वाला वादी अपने अपराध को सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर लेता है और पश्चात्ताप करता है, तो राजा को उसे दण्डित नहीं करना चाहिए, अपितु क्षमा कर देना चाहिए। भाष्यकार ऐसे छल को प्रमादवश शिष्ट व्यवहार मानने वाले को क्षमा का पात्र घोषित करते हुए लिखते हैं। यदि वादी स्वकीयं प्रमादाभिहितं वचनं ज्ञात्वा वटपत्रकग्रामं च सम्यक् स्मृत्वा तमेव वटपत्रकग्रामेस्थितसंव्यवहारं कीर्तयति, तदा वादिना तत्स्वकीयं प्रमादाभिहितं छलं शिष्टं कथितमित्यर्थः। तं वादिशिष्टच्छलमनमर्षयेद् धर्मसाधनः क्षमयेदित्यर्थः । धर्मेणोद्धरतो राज्ञो व्यवहारान् कृतात्मनः । सम्भवन्ति गुणाः सप्त सप्त वह्नेरिवार्चिषः ॥ ३२ ॥ अग्नि की सात रश्मियां (ज्योति-किरणें) होती हैं। सूर्य को भी 'सप्तरश्मि' कहा गया है। वस्तुतः जिस प्रकार रंगों की संख्या सात है, उसी प्रकार सूर्य की किरणें तथा अग्नि-शिखाएं भी सप्तवर्ण होती हैं। धर्म के अनुसार व्यवहार देखने वाले राजा को भी अग्नि की सात रश्मियों के समान अगले पद्य में निर्दिष्ट सात गुणों के विकास का लाभ मिलता है। नारदस्मृति / 25

धर्मश्चार्थश्च कीर्त्तिश्च लोकपङ्क्तिरुपग्रहः । प्रजाभ्यो बहुमानं च स्वर्गे स्थानं च शाश्वतम् ॥ ३३ ॥ धर्म एवं न्यायपूर्वक व्यवहार के द्रष्टा राजा के निम्नोक्त सात गुण विकसित होते हैं—धर्म, अर्थ, कीर्ति, प्रजा का अनुराग, प्रजा की भक्ति-भावना, प्रजा के द्वारा सम्मान तथा मरणोपरान्त स्वर्ग में सुरक्षित स्थान। टिप्पणी—शिष्टों पर अनुग्रह तथा दुष्टों के निग्रह से धर्म की रक्षा होती है, धर्म से धन की प्राप्ति और उससे सुख मिलता है। दुष्टों को दण्डित करने से प्रजा को निर्भयता और निश्चिन्तता प्राप्त होती है। किसी प्रकार के उत्पातों के होने की आशंका समाप्त हो जाती है। इससे प्रजा अपने कार्य-व्यापार को तन्मयता से कर पाती है। इससे जहां राजा को यश, प्रजा का अनुराग और उसकी श्रद्धा मिलती है, वहां देश की समृद्धि को भी चार चांद लग जाते हैं। प्रजा भी ऐसे राजा की मंगल कामना करती है और इस प्रकार धर्म-रक्षा से सद्गति सुनिश्चित हो जाती है। तस्माद्धर्मासनं प्राप्य राजा विगतमत्सरः । समः स्यात् सर्वभूतेषु बिभ्रद्वैवस्वतं व्रतम् ॥ ३४ ॥ इस प्रकार सिंहासन पर आसीन राजा को धर्म को प्रमुखता देते हुए राग-द्वेष तथा ईर्ष्या-स्पर्धा आदि से सर्वथा मुक्त होकर यमराज के व्रत—व्यक्ति द्वारा कृत शुभाशुभ कर्मों के अनुरूप ही उन्हें सत्-असत् फल प्रदान करना—का निर्वाह करना चाहिए, अर्थात् उसे सदाचारी धर्मात्माओं पर अनुग्रह और दुराचारी दुष्टों का निग्रह करना चाहिए। उसे प्रजाजनों के आचरण के अनुरूप ही उनसे व्यवहार करना चाहिए, न कि स्वेच्छा बरतनी चाहिए। टिप्पणी—विष्णु के अनुसार—विवस्वान् यमदेव का ही एक नाम है और वह प्रत्येक प्राणी के हृदय में स्थित है। यदि उससे व्यक्ति का कोई विवाद-भय आदि नहीं, तो व्यक्ति को आत्मरक्षा के लिए किसी पुण्यानुष्ठान की कोई आवश्यकता ही नहीं है— यमो वैवस्वतो देवो यस्तवैष हृदिस्थितः । तेन चेदविवादस्ते मा गङ्गां मा कुरुं गम ॥ इसी सन्दर्भ में यम की कार्यप्रणाली का परिचय देते हुए आचार्य महोदय का कथन है—यमो धर्मराजः तस्य व्रतं लोकानां स्वकृत शुभाशुभफलदत्वम्। अर्थात् यम इसीलिए धर्मराज कहलाते हैं; क्योंकि वे व्यक्ति द्वारा किये शुभ-अशुभ कर्मों का शुभ-अशुभ फल देते हैं। अतः राजा के लिए भी उचित है कि वह— सर्वभूतेषु समः स्यात्—सभी प्रजाजनों के साथ बिना किसी भेद-भाव के समान व्यवहार करे। 26 / नारदस्मृति

धर्मशास्त्रं पुरस्कृत्य प्राड्विवाकमते स्थितः। समाहितमतिः पश्येद् व्यवहाराननुक्रमात् ॥ 35 ॥ राजा को व्यवहार की परीक्षा करते समय निम्नोक्त तीन तथ्यों को पर्याप्त महत्त्व एवं गौरव देना चाहिए— प्रथम, धर्मशास्त्र (आचार संहिता Penal Code) में निर्धारित नियम, विनियम एवं विधान। द्वितीय, क़ानूनवेत्ता न्यायाधिकारियों अथवा वकीलों द्वारा धर्मशास्त्र के आधार पर निर्धारित मत। तृतीय, अपनी बुद्धि को शान्त-संयत रखते हुए वादी-प्रतिवादियों से पूछे गये प्रश्नों के उत्तरों से प्राप्त सत्य। इन्हीं तीन तत्त्वों को आधार बनाकर राजा अथवा राज-प्रतिनिधि को एक के उपरान्त दूसरे व्यवहार को देखना-परखना चाहिए। टिप्पणी-मनु ने राजा की व्यस्तता को देखते हुए अपने स्थान पर प्रतिनिधि नियुक्त करने का अधिकार दिया है— यदा स्वयं न कुर्यात्तु नृपतिः कार्यदर्शनम्। यदा नियुञ्ज्याद् विद्वांसं ब्राह्मणं कार्यदर्शने ॥ आगमः प्रथमं कार्यों व्यवहारपदं ततः। चिकित्सा निर्णयश्चैव दर्शनं स्याच्चतुर्विधम् ॥ 36 ॥ व्यवहार-प्रक्रिया के चार पक्ष होते हैं— प्रथम, किसी व्यवहार के स्वीकृत (Admit) होने के लिए विषय से सम्बद्ध कोई लिखित प्रमाण होना चाहिए। इसी का नाम आगम है। इसी के अन्तर्गत वर्गीकरण है, अर्थात् विवाद किस वर्ग के अन्तर्गत है, अर्थात् क्या वह लेन-देन सम्बन्धी, अर्थात् दीवानी (Civil Suits) अथवा अपराध सम्बन्धी, अर्थात् फ़ौजदारी (Criminal) है। इन सब तथ्यों का निर्धारण भी आगम के अन्तर्गत आता है। द्वितीय, व्यवहार संज्ञा पाने के उपरान्त व्यवहार का द्वितीय चरण है— उसका लिखित उत्तर-प्रत्युत्तर। आज की भाषा में इसे दावा-जवाबदावा कहा जाता है। इसी का नाम प्रचलन है। तृतीय, वादी अथवा पक्षी द्वारा लिखित दावा—विपक्षी द्वारा जवाब देना— पक्षी द्वारा वापसी जवाबदावा तथा प्रतिरक्षी द्वारा फिर से जवाबदावा आदि प्रक्रिया के उपरान्त मौखिक (face-to-face) प्रश्नोत्तर (बयान) तथा बहस (Argument) आदि तृतीय चरण है—इसी का नाम क्रिया अथवा चिकित्सा है। चतुर्थ, चिकित्सा के परिणाम के रूप में दिया जाने वाला निर्णय फ़ैसला (judgment) चतुर्थ चरण है—इसी का पारिभाषिक नाम दर्शन है। नारदस्मृति / 27

टिप्पणी—असहाय भाष्यकार ने इस पद्य के अनुरूप अपना मत इस प्रकार व्यक्त किया है—आगमः सम्बन्धः । तत्तदृणादानाद्यष्टादशपदानां मध्ये कतमदिदं व्यवहारपदम्, तस्यापि मध्ये कतमोऽयं तदीयशाखाभेद इति व्यवहारस्य नाम करणीयम्। ततस्तस्य चतुष्पादक्रियानिर्वाहादिका व्याधेरेव चिकित्सा करणीया। ततः प्रमाणपरीक्षानुसारेण तस्य व्यवहारस्य निर्णयः कार्य इति व्यवहारदर्शनं स्याच्चतुर्विधम्। ‘व्यवहार कल्पतरु’ के अनुसार आगम का अर्थ उत्तर प्रत्युत्तर को लिपिबद्ध करना तथा चिकित्सा का अर्थ उत्तर प्रत्युत्तर पर विचार करना है—आगमः भाषोत्तरयोः श्रुत्वा लेखनम्। चिकित्सा विचारणा। धर्मशास्त्रार्थशास्त्राभ्यामविरोधेन यत्नतः । सम्पश्यमानो निपुणं व्यवहारगतिं नयेत् ॥ 37 ॥ धर्मशास्त्र और अर्थशास्त्र में निपुण राजा को किसी के प्रति पक्षपात— अनुग्रह अथवा विरोध—का भाव न दिखाते हुए तथा अत्यन्त सावधान होकर और मूल तथ्यों तक पहुंचने के लिए कठोर श्रम करते हुए ही, प्रत्येक व्यवहार का निरपेक्ष भाव से निरीक्षण-परीक्षण करना चाहिए। टिप्पणी—असहाय भाष्यकार के अनुसार—कभी कभी कहीं पर धर्मशास्त्रोक्त अर्थशास्त्र के विरुद्ध और अर्थशास्त्रोक्त धर्मशास्त्र के विरुद्ध मिलता है। ऐसी स्थिति में राजा को लोकाचार और अपने विवेक का आश्रय लेना चाहिए। इसके अतिरिक्त न्यायविदों से भी परामर्श करना चाहिए, परन्तु लोकाचार के विरुद्ध कभी नहीं जाना चाहिए। किञ्चिद्धर्मशास्त्रोक्तमर्थशास्त्रविरुद्धं भवति। किञ्चित्पुनरर्थशास्त्रोक्तं धर्मशास्त्रविरुद्धं भवति। तयोरितेरेतरतारतम्यालोचनेन यथा लोकाचारविरुद्धं न भवति तथा ससभ्योऽपि राजा व्यवहारगतिं नयेत्। याज्ञवल्क्य ने भी अपनी स्मृति में लोकाचार को महत्त्व देते हुए लिखा है— यद्यपि शिष्टं लोकविरुद्धं नाचरणीयम् न करणीयम्। यथा मृगस्य विद्धस्य व्याधे मृगपदं नयेत् । कक्षे शोणितपादेन तथा धर्मपदं नयेत् ॥ 38 ॥ जिस प्रकार व्याध अपने बाण से क्षत-विक्षत होकर भाग गये मृग के शरीर से बहते और पृथ्वी पर गिरे रक्त को देखता हुआ उसकी खोज करता है, उसी प्रकार धर्म व्यवहार के आसन पर प्रतिष्ठित राजा को प्रत्येक व्यवहार के प्रत्येक चरण की गहन समीक्षा परीक्षा और उपलब्ध प्रमाणों-साक्ष्यों के निरीक्षण-परीक्षण के द्वारा सत्य पर पहुंचने और वादी को न्याय दिलाने का प्रयास करना चाहिए। 28 / नारदस्मृति

यत्र विप्रतिपत्तिः स्याद्धर्मशास्त्रार्थशास्त्रयोः । अर्थशास्त्रोक्तमुत्सृज्य धर्मशास्त्रोक्तमाचरेत् ॥ ३९॥ व्यवहार का निर्णय करते समय अथवा अपराधी को दण्डित करने के समय अर्थशास्त्र और धर्मशास्त्र में मतभेद मिलने की स्थिति में राजा को अर्थशास्त्र के मत की अपेक्षा धर्मशास्त्र के कथन को ही वरीयता एवं मान्यता देनी चाहिए। वस्तुतः अर्थशास्त्र के किसी भी सिद्धान्त की धर्मशास्त्रसम्मत होने पर ही मान्यता एवं प्रामाणिकता है। धर्मशास्त्र के विरुद्ध तो किसी भी अन्य शास्त्र के किसी भी कथन का कोई महत्त्व ही नहीं है। टिप्पणी—याज्ञवल्क्य भी इसी मत का समर्थन करते हुए अपनी स्मृति में लिखते हैं—अर्थशास्त्रात्तु बलवद् धर्मशास्त्रमिति स्थितिः । व्यवहारमातृकाकार का भी यही मत है—अस्मिन्नप्यर्थशास्त्रे धर्मशास्त्रा- विरुद्धोयोंऽशः स उपादेयः । इतरस्तु परित्याज्यः । असहाय भाष्यकार भी धर्मशास्त्र को वरीयता देते हुए लिखते हैं— यदा व्यवहारस्य निर्णयदानकाले तथा दण्डनिगमनावसरे सर्वशास्त्रोक्ता महती लघ्वी वा आकोटना दृश्यते । धर्मशास्त्रोक्ता चान्यादृशाकारा दृश्यते । तदा तयोः शास्त्रयोः परस्परं विप्रतिपत्तौ विसंवादे अर्थशास्त्रोक्तमुत्सृज्य धर्मशास्त्रोक्तमेवाचरेत् । धर्मशास्त्रविरोधे तु युक्तियुक्तो विधिः स्मृतः । व्यवहारो हि बलवान् धर्मस्तेनावहीयते ॥ ४० ॥ विभिन्न धर्मशास्त्रों में परस्पर विरोध अथवा धर्मशास्त्र और लोक-व्यवहार में मतभेद मिलने पर अपने विवेक से युक्ति-युक्त और तर्कसंगत का ग्रहण तथा शेष अयुक्त का त्याग करना चाहिए। तर्क और युक्ति की संगति के लिए लोक-व्यवहार को ही आधार बनाना चाहिए। शिष्ट जनों के आचार-व्यवहार को औचित्य की कसौटी मानना चाहिए; क्योंकि धर्म के निर्णय के लिए इससे अधिक प्रामाणिक और कोई आधार हो ही नहीं सकता। लोक-व्यवहार को शास्त्र से कहीं अधिक गौरव देना चाहिए। टिप्पणी—'श्रीमद्भगवद्गीता' में श्रेष्ठ पुरुष के आचरण का दूसरे लोगों द्वारा अनुसरण किये जाने का उल्लेख हुआ है— यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । सः यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ शिष्ट जनों के आचरण-रूप लोक-व्यवहार की प्रामाणिकता की पुष्टि करते हुए असहाय भाष्यकार का कथन है—यत्र पुनस्थार्पत्या विप्रतिंपत्तिः स्याद्धर्म- नारदस्मृति / 29

शास्त्रोक्तलोकव्यवहारयोः तत्र धर्मशास्त्रोक्तमुत्सृज्य लोकव्यवहारस्थमाचरेत्। यतः सः एव बलवान्। इस सम्बन्ध में वे दो उदाहरण प्रस्तुत करते हैं— प्रथम, धर्मशास्त्र, अपुत्रा स्त्री के पति खो जाने, मर जाने, संन्यासी बन जाने, जाति से पतित हो जाने तथा नपुंसक सिद्ध होने पर देवर से सम्बन्ध योजना द्वारा पुत्रोत्पत्ति की अनुमति देता है, परन्तु लोक द्वारा स्वीकृत न होने पर आज यह प्रथा अमान्य, अतः लुप्त हो गयी है। द्वितीय, दक्षिण भारत में मामा भांजी का विवाह सम्बन्ध धर्मशास्त्रसम्मत होने पर भी लोकनिन्दित होने से आज अतीत की कथा बनकर रह गया है। इस प्रकार आचार्य महोदय का स्पष्ट कथन है कि शास्त्र की दुहाई देकर देश, कुल और समाज में परम्परा से प्रचलित प्रथा का अनादर कभी नहीं करना चाहिए—देशे देशे य आचारः पारम्पर्यक्रमागतः। स शास्त्रार्थ बलान्नैव लंघनीयः कदाचन। सूक्ष्मो हि भगवान् धर्मः परोक्षो दुर्विचारणः। अतः प्रत्यक्षमार्गेण व्यवहारगतिं नयेत् ॥ 41 ॥ शास्त्र से लोक व्यवहार की वरीयता के समर्थन में तर्क प्रस्तुत करते हुए देवर्षि नारद कहते हैं—धर्म भगवान् है, अतः वह सूक्ष्म है, उसे देख पाना सहज- सरल कार्य नहीं। इसके अतिरिक्त वह प्रत्यक्ष न होकर परोक्ष है, दृष्टिगोचर है ही नहीं। साथ ही वह विचार की सीमा से भी बाहर है। इसके विपरीत व्यवहार स्थूल, प्रत्यक्ष एवं सरल-सुबोध है, अतः शास्त्र की अपेक्षा व्यवहार को अपनाने में ही बुद्धिमत्ता है। यात्यचौरोऽपि चौरत्वं चौरश्चायात्यचौरताम्। अचौरश्चौरतां प्राप्तो माण्डव्यो व्यवहारतः ॥ 42 ॥ व्यवहार-युक्ति द्वारा विवेचन एवं निर्णय की प्रक्रिया भी सर्वथा निर्दोष नहीं है। व्यवहार में अचोर को चोर और चोर को अचोर समझ लेना बड़ी बात नहीं। उदाहरणार्थ, माण्डव्य महर्षि ने कोई चोरी नहीं की थी, परन्तु मौनव्रती होने के कारण राजा ने अपने द्वारा पूछे प्रश्नों का उत्तर न देने—मौन—को उनके अपराध की स्वीकृति मानकर उन्हें दण्डित कर दिया। इस प्रकार वे चोर न होते हुए भी चोरी के दण्ड के भागी हुए। इस उदाहरण से यह सिद्ध होता है कि युक्ति द्वारा तथ्य निर्णय करने में भी विशेष सावधानी अपेक्षित होती है। स्त्रीषु रात्रौ बहिर्ग्रामादन्तर्वेश्मन्यरातिषु। व्यवहारः कृतोऽप्येषु पुनः कर्त्तव्यतामियात् ॥ 43 ॥ 30 / नारदस्मृति

निम्नोक्त स्थानों एवं परिवेशों में किया गया व्यवहार सदैव पुनरीक्षा (Revision) का विषय होता है। इसका स्पष्ट कारण यह है कि इन स्थानों-स्थितियों में अनुराग, भय तथा प्रमाद का वातावरण रहता है, अतः लिये गये निर्णय को विवेकसम्मत नहीं माना जा सकता। स्त्रियों की संगति में अथवा स्त्रियों के द्वारा रात्रि के समय, ग्राम के बाहर, वन आदि निर्जन स्थान में, घर के भीतर तथा शत्रुओं की परिषद् में किये गये व्यवहार को अन्तिम तथा न्यायसंगत नहीं मानना चाहिए। गहनत्वाद् विवादानामसामर्थ्यात् स्मृतेरपि। ऋणादिषु हरेत्कालं कामं तत्त्वबुभुत्सया ॥ 44 ॥ अपनी विविधता और जटिलता के कारण एक तो विवाद गहन है, दूसरे मनुष्यों की स्मरणशक्ति सीमित है, कार्य अधिक है और समय व क्षमता अल्प है, अतः व्यस्तता और व्यग्रता है। यही कारण है कि उनके लिए ऋण आदि से सम्बन्धित सभी लेन-देन को स्मरण रख पाना तथा सभी तथ्यों की गहराई में उतरना सम्भव ही नहीं होता। गोभूहिरण्यस्त्रीस्तेयवाग्दण्डात्ययिकेषु च। साहसेष्वभिशापे च सद्य एव विवादयेत् ॥ 45 ॥ निम्नोक्त से सम्बन्धित विवादों का निर्णय (व्यवहार) तत्काल करना चाहिए— गाय, धरती, स्वर्ण, स्त्री, चोरी, गाली-गलौच, मार-पीट, हत्या, डकैती तथा अभिशाप-दुर्भावना। ऋण आदि के लेन-देन से सम्बन्धित मामलों में देर-सवेर की जा सकती है, परन्तु उपर्युक्त मामलों में तो किसी भी कारण से की गयी देरी अनुचित होती है। टिप्पणी—याज्ञवल्क्य ने भी अपने स्मृति-ग्रन्थ में चोरी, डाका, गाली- गलौच, गो-हरण, स्त्री-हरण तथा शाप आदि के विवादों को तत्काल सुलझाने का निर्देश दिया है— साहसस्तेयपारुष्यगोभिशापात्यये स्त्रियाम्। विवादयेत् सद्य एव कालोऽन्यत्रेच्छया स्मृतः॥ मिताक्षराकार के अनुसार 'विवादयेत्' का अर्थ है—विवादं समापयेदित्यर्थः, अर्थात् विवाद को अविलम्ब समाप्त करना। अनावेद्य तु यो राज्ञे सन्दिग्धेऽर्थे प्रवर्त्तते। प्रसह्यः स विनेयः स्यात् स चास्यार्थो न सिद्ध्यति ॥ 46 ॥ किसी भी विवाद के उत्पन्न होने पर राजा को आवेदन न करके अपने आप कार्यवाही करने वाले, अर्थात् क़ानून को अपने हाथ में लेने वाले व्यक्ति को विधि के अनुसार न केवल दण्डित करना चाहिए, अपितु उसके द्वारा लिये गये सभी नारदस्मृति / 31

निर्णयों को भी निरस्त कर देना चाहिए। वक्तव्येऽर्थे न तिष्ठन्तमुत्क्रामन्तं च तद्वचः। आसेधयेद् विवादार्थी यावदाह्वानदर्शनम्॥ 47॥ प्रतिवादी द्वारा अपने वक्तव्य पर स्थिर न रहने और पूर्ववक्तव्य से विरुद्ध अथवा भिन्न वक्तव्य देने पर राजा के आदेश होने तक वादी के व्यवहार को निरुद्ध अथवा स्थगित समझना चाहिए; क्योंकि यह निर्णय लेना राजा का कार्य है कि प्रतिवादी के पूर्ववक्तव्य के अतिक्रमण करने वाले नये वक्तव्य को मान्यता दी जाये अथवा नहीं। वादी को तो राजा के आदेश की प्रतीक्षा ही करनी चाहिए। स्थानासेधः कालकृतः प्रवासात्कर्मणस्तथा। चतुर्विधः स्यादासेधो नासिद्धस्तं विलङ्घयेत्॥ 48॥ व्यवहार का आसेध—अवरोध, विरोध अथवा स्थगन (Suspension)— चार प्रकार का होता है—स्थानासेध, कालासेध, प्रवासासेध तथा कर्मासेध। आसिद्ध (प्रतिबन्धित) व्यक्ति को इन चारों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। नदीसन्तारकान्तारदुद्देशोपप्लवादिषु । आसिद्धस्तं परासेधमुत्क्रामन्नापराध्युयात्॥ 49॥ स्थान-विशेष को न छोड़ने का राजकीय आदेश स्थानासेध कहलाता है। इस सम्बन्ध में यदि नदी-पार के स्थान पर भयानक, दुर्गम वन में भूकम्प आदि उपद्रव-ग्रस्त स्थान पर तथा प्रदूषित-दुर्गन्धित (स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिप्रद) स्थान पर रखा गया व्यक्ति स्थान बदल लेता है, तो उसे राजाज्ञा के उल्लंघन का दोषी-अपराधी नहीं माना जाना चाहिए। यदि ऐसा व्यक्ति नदी-पार चला जाता है अथवा दुर्गम-भयंकर निर्जन वन को छोड़कर ग्राम में आ जाता है अथवा किसी निरापद एवं स्वच्छ स्थान पर चला जाता है, तो उसे आज्ञा-भंग नहीं मानना चाहिए। राजप्रत्यक्षदृष्टानि सुहृत्सम्बन्धिबान्धवैः। प्राप्तद्विगुणदण्डानि कार्याणि पुनरुद्धरेत्॥ 50॥ स्वयं राजा द्वारा अथवा अपने बन्धु, मित्र अथवा आप्त (प्रामाणिक) पुरुष द्वारा भली प्रकार से सोच-विचार के उपरान्त दिये गये निर्णय के विरुद्ध पुनर्विचार के लिए याचिका प्रस्तुत करने वाले की प्रार्थना को निर्णय के सही पाये जाने पर दुगुना दण्ड भुगतने की शर्त को मानने पर ही स्वीकार करना चाहिए। आसेधकाल आसिद्ध आसेधं यो व्यतिक्रमेत्। स विनेयोऽन्यथा कुर्वन्नासेधा दण्डभाग् भवेत्॥ 51॥ दोनों—आसेध (House Arrest) की अवधि में आसेध का अतिक्रमण करने वाला, अर्थात् अपराधी को समय से पहले छोड़ देने वाला अधिकारी व आसेध के 32 / नारदस्मृति