भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

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निम्नोक्त स्थानों एवं परिवेशों में किया गया व्यवहार सदैव पुनरीक्षा (Revision) का विषय होता है। इसका स्पष्ट कारण यह है कि इन स्थानों-स्थितियों में अनुराग, भय तथा प्रमाद का वातावरण रहता है, अतः लिये गये निर्णय को विवेकसम्मत नहीं माना जा सकता। स्त्रियों की संगति में अथवा स्त्रियों के द्वारा रात्रि के समय, ग्राम के बाहर, वन आदि निर्जन स्थान में, घर के भीतर तथा शत्रुओं की परिषद् में किये गये व्यवहार को अन्तिम तथा न्यायसंगत नहीं मानना चाहिए। गहनत्वाद् विवादानामसामर्थ्यात् स्मृतेरपि। ऋणादिषु हरेत्कालं कामं तत्त्वबुभुत्सया ॥ 44 ॥ अपनी विविधता और जटिलता के कारण एक तो विवाद गहन है, दूसरे मनुष्यों की स्मरणशक्ति सीमित है, कार्य अधिक है और समय व क्षमता अल्प है, अतः व्यस्तता और व्यग्रता है। यही कारण है कि उनके लिए ऋण आदि से सम्बन्धित सभी लेन-देन को स्मरण रख पाना तथा सभी तथ्यों की गहराई में उतरना सम्भव ही नहीं होता। गोभूहिरण्यस्त्रीस्तेयवाग्दण्डात्ययिकेषु च। साहसेष्वभिशापे च सद्य एव विवादयेत् ॥ 45 ॥ निम्नोक्त से सम्बन्धित विवादों का निर्णय (व्यवहार) तत्काल करना चाहिए— गाय, धरती, स्वर्ण, स्त्री, चोरी, गाली-गलौच, मार-पीट, हत्या, डकैती तथा अभिशाप-दुर्भावना। ऋण आदि के लेन-देन से सम्बन्धित मामलों में देर-सवेर की जा सकती है, परन्तु उपर्युक्त मामलों में तो किसी भी कारण से की गयी देरी अनुचित होती है। टिप्पणी—याज्ञवल्क्य ने भी अपने स्मृति-ग्रन्थ में चोरी, डाका, गाली- गलौच, गो-हरण, स्त्री-हरण तथा शाप आदि के विवादों को तत्काल सुलझाने का निर्देश दिया है— साहसस्तेयपारुष्यगोभिशापात्यये स्त्रियाम्। विवादयेत् सद्य एव कालोऽन्यत्रेच्छया स्मृतः॥ मिताक्षराकार के अनुसार 'विवादयेत्' का अर्थ है—विवादं समापयेदित्यर्थः, अर्थात् विवाद को अविलम्ब समाप्त करना। अनावेद्य तु यो राज्ञे सन्दिग्धेऽर्थे प्रवर्त्तते। प्रसह्यः स विनेयः स्यात् स चास्यार्थो न सिद्ध्यति ॥ 46 ॥ किसी भी विवाद के उत्पन्न होने पर राजा को आवेदन न करके अपने आप कार्यवाही करने वाले, अर्थात् क़ानून को अपने हाथ में लेने वाले व्यक्ति को विधि के अनुसार न केवल दण्डित करना चाहिए, अपितु उसके द्वारा लिये गये सभी नारदस्मृति / 31