भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 304 में से

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निर्णयों को भी निरस्त कर देना चाहिए। वक्तव्येऽर्थे न तिष्ठन्तमुत्क्रामन्तं च तद्वचः। आसेधयेद् विवादार्थी यावदाह्वानदर्शनम्॥ 47॥ प्रतिवादी द्वारा अपने वक्तव्य पर स्थिर न रहने और पूर्ववक्तव्य से विरुद्ध अथवा भिन्न वक्तव्य देने पर राजा के आदेश होने तक वादी के व्यवहार को निरुद्ध अथवा स्थगित समझना चाहिए; क्योंकि यह निर्णय लेना राजा का कार्य है कि प्रतिवादी के पूर्ववक्तव्य के अतिक्रमण करने वाले नये वक्तव्य को मान्यता दी जाये अथवा नहीं। वादी को तो राजा के आदेश की प्रतीक्षा ही करनी चाहिए। स्थानासेधः कालकृतः प्रवासात्कर्मणस्तथा। चतुर्विधः स्यादासेधो नासिद्धस्तं विलङ्घयेत्॥ 48॥ व्यवहार का आसेध—अवरोध, विरोध अथवा स्थगन (Suspension)— चार प्रकार का होता है—स्थानासेध, कालासेध, प्रवासासेध तथा कर्मासेध। आसिद्ध (प्रतिबन्धित) व्यक्ति को इन चारों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। नदीसन्तारकान्तारदुद्देशोपप्लवादिषु । आसिद्धस्तं परासेधमुत्क्रामन्नापराध्युयात्॥ 49॥ स्थान-विशेष को न छोड़ने का राजकीय आदेश स्थानासेध कहलाता है। इस सम्बन्ध में यदि नदी-पार के स्थान पर भयानक, दुर्गम वन में भूकम्प आदि उपद्रव-ग्रस्त स्थान पर तथा प्रदूषित-दुर्गन्धित (स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिप्रद) स्थान पर रखा गया व्यक्ति स्थान बदल लेता है, तो उसे राजाज्ञा के उल्लंघन का दोषी-अपराधी नहीं माना जाना चाहिए। यदि ऐसा व्यक्ति नदी-पार चला जाता है अथवा दुर्गम-भयंकर निर्जन वन को छोड़कर ग्राम में आ जाता है अथवा किसी निरापद एवं स्वच्छ स्थान पर चला जाता है, तो उसे आज्ञा-भंग नहीं मानना चाहिए। राजप्रत्यक्षदृष्टानि सुहृत्सम्बन्धिबान्धवैः। प्राप्तद्विगुणदण्डानि कार्याणि पुनरुद्धरेत्॥ 50॥ स्वयं राजा द्वारा अथवा अपने बन्धु, मित्र अथवा आप्त (प्रामाणिक) पुरुष द्वारा भली प्रकार से सोच-विचार के उपरान्त दिये गये निर्णय के विरुद्ध पुनर्विचार के लिए याचिका प्रस्तुत करने वाले की प्रार्थना को निर्णय के सही पाये जाने पर दुगुना दण्ड भुगतने की शर्त को मानने पर ही स्वीकार करना चाहिए। आसेधकाल आसिद्ध आसेधं यो व्यतिक्रमेत्। स विनेयोऽन्यथा कुर्वन्नासेधा दण्डभाग् भवेत्॥ 51॥ दोनों—आसेध (House Arrest) की अवधि में आसेध का अतिक्रमण करने वाला, अर्थात् अपराधी को समय से पहले छोड़ देने वाला अधिकारी व आसेध के 32 / नारदस्मृति

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