नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 183, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्र्यहाद्दोह्यं परीक्षेत पञ्चाहाद्वाह्यमेव तु। मणिमुक्ताप्रवालानां सप्ताहं स्यात् परीक्षणम्॥ ५॥ दूध देने वाली गाय का तीन दिन, गाड़ी खींचने वाले अथवा सवारी के काम आने वाले अश्व, वृषभ, ऊंट और गज आदि पशुओं का पांच दिन तथा मणि, मुक्ता एवं मूंगा आदि बहुमूल्य रत्नों का परीक्षण सात दिन चलता है, अर्थात् इन्हें—गाय, अश्व और मणिमुक्ता—को खरीदने का इच्छुक व्यक्ति विक्रेता से परख के लिए (ट्रायल-बेस पर) अपने घर लाकर निर्धारित दिनों तक रख सकता है। इन दिनों की जांच-परख के परिणाम के आधार पर पसन्द आने पर दाम चुकाना चाहिए और न पसन्द आने पर लौटा देना चाहिए। हां, जांच-परख और पसन्द के उपरान्त दाम चुका देने पर, फिर वापस करने की बात नहीं की जा सकती। द्विपदामर्धर्धमासः स्यात् पुंसां तद्द्विगुणं स्त्रियाः। दशाहः सर्वबीजानामेकाहो लोहवाससाम् ॥ ६॥ दासों का परीक्षण-काल पन्द्रह दिन, स्त्रियों का परीक्षण-काल एक मास, सभी प्रकार के बीजों का परीक्षण-काल एक दिन और लोहे तथा वस्त्रों का परीक्षण-काल एक दिन होता है। टिप्पणी—इस उल्लेख से स्पष्ट है कि प्राचीन भारत में दासों को और साथ ही स्त्रियों को भी क्रय-विक्रय का सामान समझा जाता था। परिभुक्तं च यद्वासः क्लिष्टरूपं मलीमसम्। सदोषमपि तत्क्रीतं विक्रेतुर्न भवेत् पुनः॥ ७॥ ख़रीदने के उपरान्त (भले ही परीक्षण के लिए क्यों न हो) उपयोग में लाये जाने के कारण वस्त्र के फट जाने, मुचुड़ जाने तथा मैला हो जाने पर वह वस्त्र क्रेता का होता है, विक्रेता को नहीं लौटाया जा सकता। मूल्याष्टभागो हीयेत सकृद्धौतस्य वाससः। द्विः पादस्त्रिस्त्रिभागस्तु चतुः कृत्वोऽर्धमेव च॥ ८॥ एक बार धोने से फट जाने वाले व रंग फीका पड़ जाने वाले वस्त्र पर चुकाये मूल्य का 1/8वां भाग काटकर, दो बार धोने के उपरान्त शिकायत होने पर 1/4 भाग काटकर, तीन बार धोने के पश्चात् दोषपूर्ण पाये जाने पर 1/3 भाग काटकर और चार बार धोने पर घटिया सिद्ध होने पर 1/2 भाग काटकर शेष धन विक्रेता द्वारा क्रेता को देय होता है। अर्धक्षयात्तु परतः पादांशापचयः क्रमात्। यावत् क्षीणदशं जीर्णं जीर्णस्यानियमः क्षये॥ ९॥ पांच से आठ बार तक धोने के उपरान्त दोष के दृष्टिगोचर होने के कारण लौटाये जाने वाले वस्त्र के चुकाये गये मूल्य के आधे भाग का चौथाई भाग, अर्थात् नारदस्मृति / 181