भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

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पृष्ठ 186
  1. समय का अनपाकर्म पाषण्डिनैगमादीनां स्थितिः समय उच्यते। समयस्यानपाकर्म तद्विवादपदं स्मृतम्॥ 1॥ पाखण्डी—वेद-विरुद्ध नियमों का पालन और चिह्न धारण करने वाले क्षपण आदि तथा नैगम—समूह में व्यापार करने वाले व्यापारी—आदि अपनी लोकयात्रा के निर्वाह के लिए सामाजिक गोष्ठी-बन्धन से अपनी जिस स्थिति की रचना करते हैं, उसका नाम 'समय' है और उस समय का पालन न करके अतिक्रमण करना 'समय का अनपाकर्म' कहलाता है, जो एक विवाद का विषय बन जाता है। पाषण्डिनैगमश्रेणीपूगव्रातगणादिषु । संरक्षेत् समयं राजा दुर्गे जनपदे तथा॥ 2॥ राजा को इस विषय में सदैव सतर्क और प्रयत्नशील रहना चाहिए कि उसके दुर्ग में (आज की भाषा में राष्ट्रीय महत्त्व के आरक्षित संस्थानों में) तथा सार्वजनिक स्थानों पर निम्नोक्त अवाञ्छनीय सम्प्रदाय के व्यक्ति इकट्ठे न हो सकें तथा न ही उनके मठ आदि बन सकें- पाखण्डी—वेद विरुद्ध आचरण एवं चिह्न धारण करने वाले अथवा भ्रष्ट संन्यासी। नैगम—विभिन्न वर्गों के नागरिकों की अनियन्त्रित भीड़। श्रेणी—शिल्प से आजीविका चलाने वालों का झुण्ड। पूग—धन कमाने को ही महत्त्व देने वाले व्यापारियों का दल। व्रात—अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्रों को धारण करने वालों का संगठित दल तथा गण—ब्राह्मणों की मण्डली। यो धर्मः कर्म यश्चैषामुपस्थानविधिश्च यः। यच्चैषां वृत्त्युपादानमनुमन्येत तत्तथा॥ 3॥ उपर्युक्त छह संगठनों को अपने धर्मानुष्ठान, भिक्षाटन आदि कर्म, उपस्थान विधि—ढोल बाजा बजाकर सामूहिक पूजा अथवा शोभायात्रा के लिए इकट्ठा होना तथा आजीविका को चलाने के लिए अपनाये जाने वाले साधनों—दैनिक सत्संग, साप्ताहिक सम्मेलन, किसी भवन का क्रय, निर्माण तथा अन्यान्य विभिन्न समारोहों 184 / नारदस्मृति