नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
- समय का अनपाकर्म पाषण्डिनैगमादीनां स्थितिः समय उच्यते। समयस्यानपाकर्म तद्विवादपदं स्मृतम्॥ 1॥ पाखण्डी—वेद-विरुद्ध नियमों का पालन और चिह्न धारण करने वाले क्षपण आदि तथा नैगम—समूह में व्यापार करने वाले व्यापारी—आदि अपनी लोकयात्रा के निर्वाह के लिए सामाजिक गोष्ठी-बन्धन से अपनी जिस स्थिति की रचना करते हैं, उसका नाम 'समय' है और उस समय का पालन न करके अतिक्रमण करना 'समय का अनपाकर्म' कहलाता है, जो एक विवाद का विषय बन जाता है। पाषण्डिनैगमश्रेणीपूगव्रातगणादिषु । संरक्षेत् समयं राजा दुर्गे जनपदे तथा॥ 2॥ राजा को इस विषय में सदैव सतर्क और प्रयत्नशील रहना चाहिए कि उसके दुर्ग में (आज की भाषा में राष्ट्रीय महत्त्व के आरक्षित संस्थानों में) तथा सार्वजनिक स्थानों पर निम्नोक्त अवाञ्छनीय सम्प्रदाय के व्यक्ति इकट्ठे न हो सकें तथा न ही उनके मठ आदि बन सकें- पाखण्डी—वेद विरुद्ध आचरण एवं चिह्न धारण करने वाले अथवा भ्रष्ट संन्यासी। नैगम—विभिन्न वर्गों के नागरिकों की अनियन्त्रित भीड़। श्रेणी—शिल्प से आजीविका चलाने वालों का झुण्ड। पूग—धन कमाने को ही महत्त्व देने वाले व्यापारियों का दल। व्रात—अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्रों को धारण करने वालों का संगठित दल तथा गण—ब्राह्मणों की मण्डली। यो धर्मः कर्म यश्चैषामुपस्थानविधिश्च यः। यच्चैषां वृत्त्युपादानमनुमन्येत तत्तथा॥ 3॥ उपर्युक्त छह संगठनों को अपने धर्मानुष्ठान, भिक्षाटन आदि कर्म, उपस्थान विधि—ढोल बाजा बजाकर सामूहिक पूजा अथवा शोभायात्रा के लिए इकट्ठा होना तथा आजीविका को चलाने के लिए अपनाये जाने वाले साधनों—दैनिक सत्संग, साप्ताहिक सम्मेलन, किसी भवन का क्रय, निर्माण तथा अन्यान्य विभिन्न समारोहों 184 / नारदस्मृति
का आयोजन आदि-के लिए राज्य से पूर्व अनुमति अवश्य लेनी चाहिए। बिना शासकीय अनुमति के इन संगठनों द्वारा किसी प्रकार की सम्पत्ति रखना तथा किसी प्रकार के समारोह का आयोजन करना दण्डनीय अपराध है। नानुकूलं यद्राज्ञः प्रकृत्यवमतं च यत्। बाधकं च यदर्थानां ततेभ्यो विनिवर्तयेत् ॥ ४॥ राजा को अपने लिए अनुकूल, प्रजा के लिए हितकर तथा आर्थिक विकास के लिए लाभप्रद प्रतीत न होने वाली किसी भी सम्प्रदाय की, किसी भी गतिविधि को तत्काल प्रतिबन्धित कर देना चाहिए। प्रशासन को केवल स्वस्थ, स्वच्छ, साम्प्रदायिकता से मुक्त, देश की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने वाली गतिविधियों को ही चलने की अनुमति देनी चाहिए। मिथः संघातकरणमहिते शस्त्रधारणम्। परस्परोपघातं च तेषां राजा न मर्षयेत् ॥ ५॥ राजा को बिना किसी उद्देश्य अथवा प्रयोजन-विशेष के निरर्थक संगठन बनाने वाले दलों अथवा व्यक्तियों, प्रजा में आतंक फैलाने के लिए शस्त्रास्त्र धारण करने वालों तथा एक-दूसरे से लड़ते झगड़ते रहने वाले समुदायों (आजकल अकाली निरंकारी, मुसलमानों में शिया-सुन्नी) के विरुद्ध तत्काल कठोर एवं उग्र कार्यवाही करनी चाहिए। इस प्रकार के अशान्ति एवं अराजकता फैलाने वाले संगठनों एवं व्यक्तियों को कठोरता से कुचल देना चाहिए। इनके प्रति थोड़ी-सी भी लापरवाही का अत्यन्त भयंकर परिणाम निकलता है। पृथग् गणांश्च ये भिन्द्युस्ते विनेया विशेषतः। आवहेयुर्भयं घोरं व्याधिवत्ते ह्युपेक्षिताः ॥ ६॥ राजा को अपने गणों संगठनों से अलग होकर अशान्ति और उपद्रव फैलाने वाले उद्दण्ड व्यक्तियों को यथाशीघ्र दण्डित करके अनुशासित करना चाहिए। उनकी थोड़ी सी उपेक्षा भी, रोग की उपेक्षा से उसके भयंकर रूप धारण करने के समान, राष्ट्र के लिए जटिल समस्या बन जाती है। दोषवत् करणं यत् स्यादानाम्नायप्रकल्पितम्। प्रवृत्तमपि तद्राजा श्रेयस्कामो निवर्तयेत् ॥ ७॥ प्रजा के शुभचिन्तक एवं राष्ट्र की शान्ति व सुरक्षा के प्रति समर्पित राजा को शास्त्र में अनिर्दिष्ट, परन्तु देश के हित के विरुद्ध किसी भी कार्य अथवा गतिविधि पर नियन्त्रण लगाना चाहिए। राजा को अपने विवेक से अनुकूल प्रतिकूल तथा साधक-बाधक का निर्णय करके अनुकूल को विकसित होने का अवसर जुटाना चाहिए तथा प्रतिकूल पर कुठाराघात करना चाहिए। ॥ चतुर्थ अध्याय का दशम प्रकरण समाप्त ॥ नारदस्मृति / 185
- सीमा-बन्ध सेतुकेदारमर्यादाविकृष्टाकृष्टनिश्चये । क्षेत्राधिकारो यस्तु स्याद्विवादः क्षेत्रजस्तु सः ॥ 1 ॥ सेतु और कृषिक्षेत्र की अनिश्चित एवं अनिर्णीत सीमा के निर्धारण से सम्बन्धित तथा क्षेत्र एवं भू-भाग पर अधिकार को लेकर उठने वाला विवाद क्षेत्रज अथवा 'सीमा-बन्ध' विवाद कहलाता है। क्षेत्रसीमाविवादेषु सामन्तेभ्यो विनिश्चयः । नगरग्रामगणिनो ये च वृद्धतमा नराः ॥ 2 ॥ क्षेत्र की सीमा के सम्बन्ध में दो अथवा अधिक व्यक्तियों में मतभेद उत्पन्न होने अथवा विवाद उठने पर आस-पास रहने वाले प्रतिष्ठित एवं सदाचारी पञ्चों को अथवा नगर, ग्राम और गणराज्यों की सीमा की प्रामाणिक जानकारी रखने वाले वृद्धजनों-अधिक से अधिक आयु वालों-को मध्यस्थ बनाना चाहिए। ग्रामसीमासु च बहिर्ये स्युस्तत्कृषिजीविनः । गोपशाकुनिकव्याधा ये चान्ये वनजीविनः ॥ 3 ॥ समुन्नयेयुस्ते सीमां लक्षणैरुपलक्षिताम् । तुषाङ्गारकपालैश्च कूपैरायतनैर्द्रुमैः ॥ 4 ॥ सीमा निर्णय में साधक कुछ अन्य व्यक्ति और कुछ चिह्न इस प्रकार हैं-
- ग्राम की सीमाओं पर रहने वाले और कृषि आदि से अपनी आजीविका चलाने वाले लोग।
- पशु चराने वाले गोपालक।
- पशुओं का शिकार करने वाले, व्याध आदि।
- पक्षियों को पकड़ने वाले बहेलिये-चिड़ीमार तथा
- वनों में रहने वाले चोर, डाकू तथा साधु, महात्मा आदि।
- चिह्नों (उपलक्षणों) के रूप में द्रष्टव्य वस्तुएं हैं-तुष (भूसा), कोयला, पत्थर, हड्डी, खोपड़ी आदि. प्राचीनकाल में सीमा को चिह्नित करने के लिए सीसा, पत्थर, खोपड़ी, कोयला आदि का प्रयोग किया जाता था; क्योंकि ये पदार्थ दीर्घकाल तक नष्ट नहीं होते। धरती के नीचे दबे इन पदार्थों को खोजकर इनके आधार पर सीमारेखा निश्चित करनी चाहिए। इन लक्षणों के अतिरिक्त कूप, तालाब, जोहड़ और वृक्षों की स्थिति को भी सीमा के निर्धारण का आधार बनाना चाहिए। 186 / नारदस्मृति
अभिज्ञातैश्च वल्मीकस्थलनिम्नोन्नतादिभिः। केदाराराममार्गैश्च पुराणैः सेतुभिस्तथा ॥ ५ ॥ सीमा के निर्धारण के कुछ अन्य लक्षण इस प्रकार हैं—
- वृद्ध लोगों द्वारा प्रयोग में लाये जाने वाले ऊंचे स्थान अथवा रेत के टीले का होना।
- स्थान का ऊंचा-नीचा होना। जानकारों को स्मरण रहता है कि अमुक का क्षेत्र ऊंचा था व अमुक का क्षेत्र नीचा था।
- क्षेत्र का उर्वर-अनुर्वर होना।
- सेतु के समीप अथवा दूर होना।
- सिंचाई-सुविधा का सुलभ होना-न होना तथा
- उद्यान की ओर जाने वाले मार्ग का पुराना अथवा नया होना आदि। निम्नगापहतोत्सन्ननष्टचिह्नासु भूमिषु। तत्प्रदेशानुमानाच्च प्रमाणैर्भोगदर्शनैः ॥ ६ ॥ नदी के स्रोत से धरती के डूब जाने के कारण सीमाचिह्नों के नष्ट हो जाने पर वृद्धजनों द्वारा तर्क, युक्ति, अनुमान, क्षेत्र के आकार-प्रकार, वर्गफल तथा अन्य क्षेत्रों की सीमा से दूरी, समीपता आदि के अतिरिक्त लिखित रिकार्ड से पूर्व- पश्चिम में लम्बाई-चौड़ाई आदि को ध्यान में रखते हुए सीमा का निर्धारण करना चाहिए। अथ चेदनृतं ब्रूयुः सामन्तास्तद्विनिश्चये। सर्वे पृथक् पृथग्दण्ड्या राज्ञा मध्यमसाहसम् ॥ ७ ॥ सीमा-निर्धारण के लिए मनोनीत वृद्ध पुरुषों द्वारा पक्षपात करने, असत्य- भाषण करने तथा जान-बूझकर ग़लत दृष्टिकोण अपनाने पर उन सबको पृथक्- पृथक् मध्यम साहस के लिए निर्धारित दण्ड से दण्डित करना चाहिए। प्रत्येकं तु जघन्यास्ते विनेयाः पूर्वसाहसम्॥ अर्थात् भूमि से सम्बन्धित किसी भी कार्य—सीमाविवाद का निपटारा तथा कृषि-चोरी के विवाद आदि—के लिए मनोनीत वृद्ध पुरुषों द्वारा मिथ्याभाषण करने पर प्रत्येक सदस्य को शारीरिक तथा आर्थिक दण्ड देकर उन्हें भविष्य में ऐसा न करने के लिए प्रशिक्षित करना चाहिए। गणवृद्धादयस्त्वन्ये दण्डं दाप्याः पृथक् पृथक् । विनेयाः प्रथमेन स्युः साहसेनानृते स्थिताः ॥ ८ ॥ भूमि-कार्य में प्रामाणिक माने जाने वाले गोपालक, व्याध, साधु, कृषिजीवी तथा अन्य वनवासी लोगों द्वारा असत्य का पक्ष ग्रहण करने तथा दुराग्रही होने पर उन्हें भी पृथक्-पृथक् प्रथम साहस के लिए निर्धारित दण्ड देकर भली प्रकार सही नारदस्मृति / 187
मार्ग पर लाना और अनुशासित करना चाहिए। नैकः समुन्नयेत् सीमां नरः प्रत्ययवानपि। गुरुत्वादस्य कायस्य क्रियैषा बहुषु स्थिता ॥ ९ ॥ किसी एक व्यक्ति के नितान्त सत्यनिष्ठ, योग्य, अनुभवी, विश्वसनीय और प्रामाणिक होने पर भी सीमा निर्धारण का कार्य उस अकेले व्यक्ति से कदापि नहीं कराना चाहिए। वस्तुतः यह कार्य इतना महत्त्वपूर्ण है कि इसे किसी अकेले को सौंपा ही नहीं जा सकता। इसके लिए गहन विचार-विमर्श की अपेक्षा होती है, जो एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा ही सम्भव है। एकश्चेदुन्नयेत् सीमां सोपवासः समाहितः। रक्तमाल्याम्बरधरः क्षितिमारोप्य मूर्धनि ॥ १० ॥ यदि परिस्थितिवश नितान्त योग्य, सुपरीक्षित, सत्यनिष्ठ एवं प्रतिष्ठित व्यक्ति को अकेले ही सीमा निर्धारण का कार्य सौंपा जाता है, तो उसे उस दिन उपवास रखना चाहिए, लोहित वस्त्र धारण करने चाहिए तथा सिर पर मिट्टी और हाथ में भाला लेकर समर्पित कार्य का निर्वहण करना चाहिए, अर्थात् भगवान् से न्याय और सत्य की रक्षा में सहायक होने की प्रार्थना करते हुए निरपेक्ष भाव से कर्तव्य-पालन करना चाहिए। यदि च न स्युर्ज्ञातारः सीमायाश्च न लक्षणम्। तदा राजा द्वयोः सीमामुन्नयेदिष्टतः स्वयम् ॥ ११ ॥ सीमा के चिह्नों के मिट जाने और पता न चल पाने पर तथा सीमा के जानकारों के भी सुलभ न होने अथवा अपनी असमर्थता प्रकट करने पर, प्रशासन को दोनों पक्षों को सुनकर अपने विवेक से दोनों क्षेत्रों की सीमा का निर्धारण कर देना चाहिए। एतेनैव गृहोद्याननिपानायतनादिषु। विवादविधिराख्यातस्तथा ग्रामान्तरेषु च ॥ १२ ॥ आवासीय भू खण्ड, उद्यान, पानीयशाला, देवस्थान, पशुचारणभूमि, ग्रामों की भूमि तथा राजकीय और निजी भूमि के सम्बन्ध में उत्पन्न विवाद में सीमा- निर्धारण की इसी विधि को अपनाना चाहिए। सीमामध्ये तु जातानां वृक्षाणां क्षेत्रयोर्द्वयोः। फलपुष्पं च सामान्यं क्षेत्रस्वामिषु निर्दिशेत् ॥ १३ ॥ दो स्वामियों के दो क्षेत्रों की सीमा के मध्य में उत्पन्न वृक्षों के फल-पुष्पादि पर दोनों का समान अधिकार होता है। दोनों को बांटकर अथवा अपने-अपने क्षेत्र में पड़ने वाली शाखाओं पर लगने वाले फल लेने चाहिए। अन्यक्षेत्रोपजातानां शाखास्त्वन्यत्र संस्थिताः। स्वामिनस्ता विजानीयादन्यक्षेत्रविनिर्गताः ॥ १४ ॥ 188 / नारदस्मृति
यदि अपने क्षेत्र में उत्पन्न वृक्षों की शाखाएं भी दूसरे के स्वामित्व वाले क्षेत्र में चली जाती हों, तो उन शाखाओं पर लगने वाले फलों पर वृक्ष के स्वामी के स्थान पर क्षेत्र के स्वामी का अधिकार होता है। अवस्करस्थलश्वभ्रभ्रमस्यन्दैनिकादिभिः । चतुष्पथसुरस्थानरथ्यामार्गान्न रोधयेत् ॥ 15 ॥ घर का कचरा, मल-मूत्रादि तथा घर की छत पर गिरने वाले पानी के निकासी की ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे देवालय, गली, यातायात का मार्ग (सड़क), गड्ढा, मण्डप तथा चौराहे आदि में किसी प्रकार का गतिरोध अथवा अव्यवस्था न आ सके और न ही दुर्गन्ध आदि से वातावरण दूषित हो। रोधायन्ति तु ये मोहाद्बलाद्वापि कथञ्चन । दण्डयेत्तादृशान् राजा साहसेनोत्तमेन च ॥ 16 ॥ अहंकार अथवा मूर्खता अथवा दुराग्रहवश अपने घर के कूड़े-करकट, गन्दगी और दूषित जल से सार्वजनिक मार्ग, राजपथ तथा गली आदि में गतिरोध उत्पन्न करने वाले तथा वातावरण को दूषित-मलिन करने वाले गृहस्वामी को प्रशासन द्वारा दण्ड देकर अनुशासित करना चाहिए। परक्षेत्रस्य मध्ये तु सेतुर्न प्रतिषिध्यते । महागुणोऽल्पबाधश्च वृद्धिरिष्टा क्षये सति ॥ 17 ॥ दूसरे के क्षेत्र में सेतु-निर्माण से उस क्षेत्र के स्वामी को होने वाली हानि की अपेक्षा आस-पास के क्षेत्र वालों को अधिक लाभ मिलने की सम्भावना होने पर सेतु-निर्माण का प्रतिषेध नहीं किया जा सकता; क्योंकि यहां एक की साधारण हानि के बदले, बहुतों को उपज में वृद्धि के रूप में भारी लाभ मिलने वाला है। राज्य 'बहुजन हिताय' तथा 'बहुजन सुखाय' होता है। सेतुस्तु द्विविधः प्रोक्तः खेयो बन्ध्यस्तथैव च। तोयप्रवर्तनात् खेयो बन्ध्यः स्यात्तन्निवर्तनात् ॥ 18 ॥ सेतु दो प्रकार का होता है—1. खेय तथा 2. बन्ध्य। पानी के आने-जाने की समुचित व्यवस्था के रूप में बनाया जाने वाला सेतु 'खेय' कहलाता है और पानी के बहाव को एकदम रोकने के लिए बनाया जाने वाला सेतु 'बन्ध्य' कहलाता है। नान्तरेणोदकं सस्यं नश्येदभ्युदकेन तु। य एवानुदके दोषः स एवाभ्युदके स्मृतः ॥ 19 ॥ जिस प्रकार जल के बिना उपज नहीं हो सकती, उसी प्रकार अधिक जल आ जाने से उपज नष्ट हो जाती है। इस प्रकार दोनों—जल का अभाव और जल की आवश्यकता से अधिकता-कृषि-उपज के लिए हानिकारक होती है। इन दोनों नारदस्मृति / 189
प्रकार के दोषों के निवारण के लिए, अर्थात् केवल अपेक्षित जल की आपूर्ति के लिए सेतु का निर्माण करना चाहिए। पूर्वप्रवृत्तमुत्सन्नमपृष्ट्वा स्वामिनं तु यः। सेतुं प्रवर्तयेत् कश्चिन्न स तत् फलभाग् भवेत् ॥ 20 ॥ क्षेत्र के स्वामी की अनुमति प्राप्त किये बिना, दूसरे क्षेत्र में स्थित पुराने, टूटे- फूटे अथवा उखड़े-पुखड़े, अर्थात् क्षतिग्रस्त होने से उपयोग में न आ पाने वाले सेतु बांध आदि की मरम्मत कराने वाला अथवा नये बांध अथवा पुलिया आदि का निर्माण कराने वाला व्यक्ति क्षेत्र स्वामी से न तो ख़र्च वसूल कर सकता है और न ही उस पुलिया से अपने खेत की सिंचाई का लाभ उठा सकता है। मृते तु स्वामिनि पुनस्तद्वंश्ये वाऽपिमानवे। राजानमामन्त्र्य ततः प्रकुर्यात् सेतुकर्म तत् ॥ 21 ॥ क्षेत्र के स्वामी अथवा उसके उत्तराधिकारियों की खोज करने पर भी उनके न मिलने पर और उस क्षेत्र में पहले से विद्यमान ध्वस्त पुलिया-बांध की मरम्मत अथवा नये बांध का निर्माण आवश्यक होने पर प्रशासन द्वारा इस कार्य के निर्वहण के लिए निर्माण कार्य कराना सर्वोत्तम है, अन्यथा लिखित अनुमति के उपरान्त ही इस दिशा में प्रवृत्त होना चाहिए। अतोऽन्यथा क्लेशभाक्स्यान्मृगव्याधानुदर्शनात् । इषवस्तस्य नश्यन्ति यो विद्धमनुविध्यति ॥ 22 ॥ प्रशासन से सेतु-निर्माण का अनुरोध अथवा अनुमति प्राप्त किये बिना निर्माण- कार्य करने वाला व्यक्ति एक प्रकार से संकट को निमन्त्रण देता है, क्योंकि दूसरे क्षेत्र में किसी प्रकार का प्रवेश अथवा हस्तक्षेप अनधिकार चेष्टा होती है। जिस प्रकार व्याध द्वारा पहले से ही अपने बाणों से विद्ध मृग को अपने बाणों से बाँधने वाला अपने समय, बल और बाणों को व्यर्थ गंवाता है, मृग पर व्याध का ही अधिकार होता है, उसी प्रकार दूसरे के क्षेत्र में सेतु आदि निर्माण कराने वाला भी अपने समय, साधन और ऊर्जा को व्यर्थ करता है। उसके द्वारा किये गये निर्माण के लिए उसके विरुद्ध क़ानूनी कार्यवाही की जा सकती है। अशक्तप्रेतनष्टेषु क्षेत्रिकेष्वनिवारितः । क्षेत्रं चेद्विकृषेत् कश्चिदश्नुवीत स तत् फलम् ॥ 23 ॥ किसी क्षेत्र के मूल स्वामी के अशक्त, दिवंगत, अपराध के दण्ड-भय से लुप्त (लापता) हो जाने पर तथा स्वयं मूल स्वामी, उसके परिवार के किसी सदस्य अथवा उत्तराधिकारी द्वारा दखल, रोक टोक न किये जाने पर दूसरे के क्षेत्र में उपज बोने उगाने वाले को फल पाने का अधिकार मिल जाता है। परती भूमि का उपयोग कोई दोष नहीं। 190 / नारदस्मृति
विकृष्यमाणे क्षेत्रे चेत् क्षेत्रिकः पुनराव्रजेत् । खिलोपचारं तत्सर्वं दत्त्वा स्वक्षेत्रमाप्नुयात् ॥ २४ ॥ किसी व्यक्ति के क्षेत्र में दूसरे व्यक्ति द्वारा कृषि-कार्य- हल चलाने, बीज बोने तथा सिंचाई करने आदि- किये जाने पर उपज पकने तैयार होने से पहले ही आ पहुंचने वाले क्षेत्र के स्वामी को खेत बोने वाले व्यक्ति द्वारा किये गये ख़र्च का तथा उसके श्रम के मूल्य का भुगतान करने के उपरान्त ही अपने क्षेत्र पर क़ब्ज़ा पाने का अधिकार बनता है। तदष्टभागापचयाद्यावत् सप्त गताः समाः। सम्प्राप्ते त्वष्टमे वर्षे भुक्तं क्षेत्रं लभेत सः ॥ २५ ॥ दूसरे के क्षेत्र में किराये पर कृषि-कर्म- जोतना, बोना, सींचना, काटना तथा देखभाल-बचाव आदि- करने वाला कृषि की उपज के अथवा वृक्षों के फलों के नष्ट हो जाने पर भावी लाभ की आशा से सात वर्षों तक निरन्तर धरती का भाड़ा चुकाता रहता है तथा क्षेत्र का स्वामी क्षेत्र को उपजाऊ बनाने व फलों को सड़ने से बचाने के लिए कोई उद्यम नहीं करता, कोई ख़र्च नहीं करता, एक प्रकार से पूर्णतः उदासीन और निरपेक्ष बना रहता है, प्राप्त आय को मुफ़्त की कमाई मानकर सन्तुष्ट रहता है, तो आठवें वर्ष किरायेदार ही उस क्षेत्र, उपवन आदि का स्वामी बन जाता है। संवत्सरेणार्धखिलं खिलं तद्भूतैरस्त्रिभिः । पञ्चवर्षविसन्नं तु स्यात् क्षेत्रमटवीससमम् ॥ २६ ॥ एक वर्ष तक ख़ाली पड़ा रहने वाला, अर्थात् कुछ भी न बोये जाने वाला खेत 'अर्धखिल', तीन वर्षों तक लगातार ख़ाली पड़ा रहने वाला खेत 'खिल' तथा लगातार पांच वर्षों तक ख़ाली पड़ा रहने वाला खेत 'अरण्य-सदृश' कहलाता है। क्षेत्रं त्रिपुरुषं यत् स्यात् गृहं वा स्यात् क्रमागतम् । राजप्रसादादन्यत्र न तद्भोगः परं नयेत् ॥ २७ ॥ तीन वर्षों तक किसी खेत अथवा मकान का क़ब्ज़ा रखने वाले (बिना किराया चुकाये अथवा किसी प्रकार का इकरारनामा किये) व्यक्ति का उस पर स्वामित्व मान लिया जाता है। हां, यदि इस अवधि में वह सम्पत्ति सरकार द्वारा अधिगृहीत हो जाती है अथवा स्वामित्व के विवाद के सम्बन्ध में कोई अधिसूचना जारी की जाती है, तो स्थिति भिन्न हो जाती है, अन्यथा स्वामित्व स्वतः सिद्ध माना जाता है। उत्क्रम्य तु वृतिं यत्र सस्यघातो गवादिभिः । पालः शास्यो भवेत्तत्र न चेच्छक्त्या निवारयेत् ॥ २८ ॥ क्षेत्र की रक्षा के लिए नियुक्त व्यक्ति द्वारा शक्ति और साधन होने पर भी कृषि नारदस्मृति / 191
की हानि कर रहे गाय बैल आदि पशुओं को हटाने भगाने का उद्यम न करने पर उसे यथोचित रूप से दण्डित करना चाहिए। समूलसस्यघाते तु तत् स्वामी सममाप्नुयात्। वधेन पालो मुच्येत दण्डं स्वामिनि पातयेत्॥ २९॥ गाय बैल आदि पशुओं द्वारा पूरी उपज खाये जाने अथवा रौंदे जाने के रूप में नष्ट किये जाने पर क्षेत्र के स्वामी को जहां रक्षक को दण्ड देना चाहिए, वहां पशुओं के स्वामी को, न केवल क्षेत्रपाल को अपनी हानि की भरपाई करनी चाहिए, अपितु प्रशासन को दण्ड के रूप में निर्धारित धन राशि का भुगतान भी करना चाहिए। गौः प्रसूता दशाहं च महोक्षो वाजिकुञ्जरौ। निवार्याः स्युः प्रयत्नेन तेषां स्वामी न दण्डभाक्॥ ३०॥ दस दिन की प्रसूता गाय तथा बलवान् एवं उच्छृंखल-बन्धन में न रखे जा सकने वाले-अश्व, गज, वृषभ आदि द्वारा कृषि-शस्य की हानि किये जाने पर क्षेत्रपाल को अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए उन्हें क्षेत्र में घुसने से रोकना चाहिए। ऐसे पशुओं के स्वामी से हानि की भरपाई की मांग नहीं की जा सकती। माषं गां दापयेद्दण्डं द्वौ माषौ महिषी तथा। अजाविके सवत्से तु दण्डः स्यादर्धमाषकः॥ ३१॥ गाय, भैंस और अपने बच्चे (मेमने) सहित भेड़ बकरी द्वारा कृषि की हानि किये जाने पर क्रमशः एक माशा (ग्राम), दो माशा और आधा माशा स्वर्ण, दण्ड के रूप में इनके स्वामी को देय होता है। अदण्ड्या हस्तिनोऽश्वाश्च प्रजापाला हि ते मताः। अदण्ड्याऽऽगन्तुकी गौश्च सूतिका वाऽभिसारिणी॥ ३२॥ गजों और अश्वों द्वारा उपज के खाने-खराब करने पर भी उन्हें दण्डित नहीं करना चाहिए; क्योंकि वे प्रजापालक होने के कारण किसी भी कारण से दण्डनीय नहीं हैं। इस प्रकार बाहर से खरीदकर लायी गयी, सद्यःप्रसूता अथवा वृषभ के साथ आयी गाय भी कृषि शस्य को खाने-उजाड़ने के लिए कदापि दण्डनीय नहीं होती; क्योंकि ऐसी गाय भी दण्ड की सीमा के बाहर होती है। नष्टा भग्ना च लग्ना च वृषभः कृतलक्षणः। प्रोक्तं तु च्छिद्रनासायां वसन्त्यां तु चतुर्गुणम्॥ ३३॥ गाय-भैंस आदि चराने वाले पशुपालक के झुण्ड से बिछुड़ी, घायल तथा पैरों में लगी चोट के कारण चलने में असमर्थ गाय द्वारा तथा गायों को गर्भिणी बनाने के लिए चिह्नित और छोड़े गये सांड द्वारा हुई कृषि शस्य की हानि के लिए, न इन पशुओं को और न ही रक्षक को दण्ड देना चाहिए और न ही इनके स्वामियों से 192 / नारदस्मृति
भरपाई की मांग करनी चाहिए। हां, नथुनों की रस्सी तुड़ाकर खेत में घुस आने वाले और कृषि की हानि करने वाले बैल को न रोकने वाले रक्षक से हानि का चार गुना दण्ड के रूप में वसूल करना चाहिए। सन्नानां द्विगुणः प्रोक्तो वसतां तु चतुर्गुणः। प्रत्यक्षचारकाणां तु चौरदण्डः स्मृतो नृणाम् ॥ 34 ॥ दूसरे के खेत में घुसकर उसकी उपज को खाकर तृप्त-मस्त हुई और पूरी रात वहीं आराम करती गाय को ढूंढ़ते-फिरते गोपालक से खेत की हानि का दुगुना तथा दूसरे के खेत की उपज को खाती गाय को अनदेखा करने वाले गोपालक से चार गुना वसूल करना चाहिए, परन्तु अपनी उपस्थिति में गाय को दूसरे की उपज को खाने से निवारण न करके प्रोत्साहित करने वाले पशुपालक को तो चोर के लिए निर्धारित दण्ड द्वारा दण्डित करना चाहिए। या नष्टाः पालदोषेण गावः क्षेत्रं यदाप्नुयुः। न तत्र गोभिनां दण्डः पालस्तं दण्डमर्हति ॥ 35 ॥ गायों के रक्षक द्वारा गायों को नियन्त्रण में न रखने अथवा उनकी सही ढंग से देखभाल न करने के दोष के कारण गायों के दूसरे के खेतों में घुसकर फ़सल खाने-उजाड़ने के लिए गायों के मालिक को नहीं, अपितु रखवाले को ही उत्तरदायी ठहराना चाहिए और उसी को तदनुरूप दण्डित करना चाहिए। राजग्राहगृहीतो वा वज्राशनिहतोऽपि वा। अथ सर्पेण दष्टो वा वृक्षाद्वा पतितो भवेत्॥ 36 ॥ व्याघ्रादिभिर्हतो वापि व्याधिभिर्वाप्युपद्रुतः । न तत्र दोषः पालस्य न च दोषोऽस्ति गोभिनाम् ॥ 37 ॥
- राजपुरुषों द्वारा पकड़े गये, 2. बिजली गिरने से मर गये, 3. सांप के काटने से मृत, 4. वृक्ष अथवा वृक्ष की शाखा के गिरने से उसके नीचे दबकर मरे,
- व्याघ्र आदि हिंसक जीवों का शिकार बने अथवा विभिन्न रोगों की विषमता से तथा दैवी आपत्ति-भूकम्प, भयंकर आंधी-तूफान, गड्ढे में गिरना तथा पशुओं में मची भगदड़ आदि-में प्राण छोड़ने वाले पशुओं के लिए न तो पशुपालक को और न ही पशुओं के स्वामी को दोषी ठहराया जा सकता है। गोभिस्तु भक्षितं धान्यं यो नरः प्रतियाचते। सामन्तानुमते देयं धान्यं यत्तत्र भक्षितम् ॥ 38 ॥ यदि क्षेत्र का स्वामी अपने क्षेत्र में घुसे दूसरे के पशुओं द्वारा किये गये अपनी उपज के विनाश की भरपाई की मांग करता है और सामन्त इससे सहमति प्रकट करते हैं, तो गोपालक को उसकी मांग को पूरा करना चाहिए, अर्थात् क्षतिपूर्ति में टाल-मटोल नहीं करनी चाहिए। नारदस्मृति / 193
गावस्तु गोभिन्ना देया धान्यं तत् कर्षिकस्य तु। एवं हि विनयः प्रोक्तो गोपैः सस्यावपातनात् ॥ ३९ ॥ वस्तुतः पशुओं के स्वामियों को उनके पशु लौटाना और दूसरों के खेतों में घुसने वाले पशुओं द्वारा उत्पात मचाने की क्षतिपूर्ति करना गोपालक का ही कर्तव्य और दण्ड है। ग्रामोपान्ते च यत् क्षेत्रं विवीतान्ते महापथे। अनावृते चेत्तन्नाशे न पालस्य व्यतिक्रमः ॥ ४० ॥ गांव के आस-पास अथवा समीप के खेतों, बगीचों से सटे खेतों व राजमार्ग के दोनों ओर के खेतों तथा पशुओं के चरने-घूमने के लिए निर्धारित खेतों में पशुओं के घुस जाने तथा उपज को खाने-रौंदने के लिए गोपालक को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता। पथि क्षेत्रे वृत्तिः कार्या यामुष्ट्रो नावलोकयेत् । न लंघयेत् पशुर्वाश्वो न भिन्द्याद्यं च सूकरः ॥ ४१ ॥ राजमार्ग के दोनों ओर पड़ने वाले क्षेत्रों के स्वामियों को अपने खेत के चारों ओर ऊंची दीवार खड़ी करनी चाहिए, ताकि ऊंट, गाय, बैल और अश्व आदि पशु उधर की उपज को देख ही न सकें। इसके अतिरिक्त उसे अपने खेत के चारों ओर मुदृढ़, बाड़-कांटेदार तार आदि लगानी चाहिए, ताकि पशु खेत में घुस ही न सकें। गृहक्षेत्रं च दृष्टे द्वे वासहेतू कुटुम्बिनाम् । तस्मात्तं नोत्क्षिपेद्राजा तद्विमूलं कुटुम्बिनाम् ॥ ४२ ॥ परिवार वाले गृहस्थों के लिए गृह और क्षेत्र दो ऐसे आवश्यक संसाधन हैं जिनके बिना जीवन चल ही नहीं सकता। निवास के लिए सुविधाजनक स्थान गृह है और आजीविका को चलाने का साधन क्षेत्र है। एक विश्राम का आधार है, तो दूसरा श्रम का। अतः राजा को इन दोनों को कभी नहीं छीनना चाहिए। इन दोनों में से किसी एक का भी छीना जाना असन्तोषजन्य विद्रोह का कारण बन सकता है। वृद्धे जनपदे राज्ञो धर्मः कोशश्च वर्धते। हीयते हीयमाने च वृद्धिहेतुमतः श्रयेत् ॥ ४३ ॥ वस्तुतः जनपद और जनता की सम्पन्नता-विपन्नता में ही राजा की सम्पन्नता- विपन्नता निहित है। अभाव-पीड़ित जनता पर शासन करने वाला राजा कभी सुख और शान्ति का जीवन व्यतीत नहीं कर सकता। अतः राजा को सदा प्रजा की उन्नति और समृद्धि की कामना व चिन्ता करनी चाहिए। ॥ चतुर्थ अध्याय का एकादश प्रकरण समाप्त ॥
- स्त्री-पुरुष-योग विवाहादिविधः स्त्रीणां यत्र पुंसां च कीर्त्यते। स्त्रीपुंसयोगनामैतद्विवादपदमुच्यते ॥ 1 ॥ दो भिन्न परिवार के स्त्री और पुरुष के विवाह-विधि से एक हो जाने का नाम 'स्त्री-पुरुष-योग' है। यहां भी आपसी मनमुटाव और कलह के कारण विवाद उत्पन्न हो जाते हैं, जिसे सुलझाने के लिए व्यवहार का आश्रय लिया जाता है। इसी का नाम 'स्त्री-पुरुष-योग' है। स्त्रीपुंसयोस्तुसम्बन्धे वरणं प्राग् विधीयते। वरणाद् ग्रहणं पाणेः संस्कारोऽथ द्विलक्षणः ॥ 2 ॥ स्त्री और पुरुष अथवा कन्या और बालक अथवा वधू और वर के परस्पर योग से पूर्व वरण-लड़की के लिए लड़के का और लड़के के लिए लड़की का चुनाव-होता है। इन चुनाव पर मोहर लगाने की क्रिया का नाम सगाई अथवा वाग्दान है, अर्थात् लड़की और लड़के के माता-पिता द्वारा अपने बच्चों के लिए उपयुक्त जीवनसाथी चुन लेने को सार्वजनिक करना है। यह इस दिशा का प्रथम चरण है। इसके उपरान्त द्वितीय चरण है-अग्नि के समक्ष दोनों-लड़की और लड़के-द्वारा जीवनपर्यन्त एक-दूसरे का साथ निभाने की प्रतिज्ञा करना। इसी का नाम पाणिग्रहण-लड़के द्वारा लड़की का हाथ पकड़ना, उसके भरण-पोषण का दायित्व लेना, उसे अपने व्यक्तित्व का भागी बनाना-है। यही विवाह एवं सप्तपदी कहलाता है। इस प्रकार स्त्री और पुरुष के सम्बन्ध के जुड़ने के दो चरण हैं- चुनाव और प्रतिज्ञा अथवा वरण और धारण। तयोरनियतं प्रोक्तं वरणं दोषदर्शनात्। पाणिग्रहणमन्त्रश्च नियतं दारलक्षणम् ॥ 3 ॥ वरण अथवा वाग्दान (सगाई) किये जाने पर लड़की लड़के का योग नहीं हो जाता है। योग तो विवाह में मन्त्रोच्चारण के उपरान्त ही होता है। अतः यदि सगाई के उपरान्त लड़की-लड़के में किसी दोष का पता चल जाता है, तो सम्बन्ध तोड़ा जा सकता है, परन्तु विवाह हो जाने (सम्भोग-क्रिया हो जाने) के उपरान्त दोनों में किसी दोष के दीखने पर सम्बन्ध विच्छेद नहीं किया जा सकता। विवाह नारदस्मृति / 195
के उपरान्त लड़का-लड़की पति पत्नी बन चुके होते हैं। ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परिग्रहे। सजातिः श्रेयसी भार्या सजातिश्च पतिः स्त्रियाः ॥ 4 ॥ चारों—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—वर्णों के लड़कों के लिए सवर्ण लड़की से पाणिग्रहण ही वाञ्छनीय एवं शुभ होता है, अर्थात् ब्राह्मण लड़के का ब्राह्मण लड़की से, क्षत्रिय लड़के का क्षत्रिय लड़की से पाणिग्रहण ही उत्तम रहता है। भिन्न वर्ण और जाति के लड़के द्वारा भिन्न जाति और वर्ण की लड़की का पाणिग्रहण उपयुक्त नहीं माना जाता। ब्राह्मणस्यानुलोम्येन स्त्रियोऽन्यास्तिस्र एव तु। शूद्रायाः प्रातिलोम्येन तथान्ये पतयस्त्रयः ॥ 5 ॥ अनुलोम क्रम से ब्राह्मण लड़के को ब्राह्मण लड़की के अतिरिक्त अन्य तीन—क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—लड़कियों से भी विवाह करने का अधिकार है। इसी प्रकार शूद्र लड़की को शूद्र लड़के के अतिरिक्त अन्य तीन वर्णों के लड़के को भी पति बनाने का अधिकार है। द्वे भार्ये क्षत्रियस्यान्थे वैश्यस्यैका प्रकीर्तिता। वैश्याया द्वौ पती ज्ञेयाविकोऽन्यः क्षत्रियापतिः ॥ 6 ॥ इसी प्रकार क्षत्रिय बालक, क्षत्रिया बालिका के अतिरिक्त दो अन्य वर्णों— वैश्य और शूद्र—की बालिकाओं से—विवाह कर सकता है। वैश्य अपने वर्ण की वैश्य बालिका के अतिरिक्त शूद्रा से भी विवाह कर सकता है। इस प्रकार वैश्या स्त्री के दो अन्य पति—क्षत्रिय और ब्राह्मण—तथा क्षत्रिया का एक अन्य पति—ब्राह्मण— हो सकता है। आ सप्तमात् पञ्चमाद्वा बन्धुभ्यः पितृमातृत्तः। अविवाह्याः सगोत्राः स्युः समानप्रवरास्तथा ॥ 7 ॥ पितृपक्ष की सात पीढ़ियों और मातृपक्ष की पांच पीढ़ियों को छोड़कर ही लड़का लड़की का विवाह सम्बन्ध स्थिर करना चाहिए। सपिण्डों और सगोत्रियों में रक्त-सम्बन्ध होने के कारण विवाह सम्बन्ध उचित नहीं; क्योंकि इससे स्वस्थ एवं बल बुद्धि सम्पन्न सन्तान के उत्पन्न होने की सम्भावना के आगे प्रश्नचिह्न लग जाता है। परीक्ष्य पुरुषः पुंसत्वे निजैरेवाङ्गलक्षणैः। पुमांश्चेदविकल्पेन स कन्यां लब्धुमर्हति ॥ 8 ॥ अपने शरीर के लक्षणों से कन्या के लिए चुने जा रहे लड़के के शरीर की तुलना और जांच परख करने पर व उसके पुरुषत्व का निश्चय हो जाने के उपरान्त ही उसे कन्या देने का विचार बनाना चाहिए, अर्थात् सच्चे अर्थों में पुरुष—कन्या 196 / नारदस्मृति
को सन्तुष्ट कर पाने वाला—सिद्ध एवं निश्चित होने वाले बालक को ही कन्या को ग्रहण करने का अधिकारी समझना चाहिए। सुबद्धजत्रुजान्वस्थिः सुबद्धांसशिरोरुहः । स्थूलघाटास्तनूक्त्वग्विलग्नगतिस्वरः ॥ ९॥ रेतोऽस्योत्प्लवते नाप्सु ह्लादि मूत्रं च फेनिलम् । पुमान् स्याल्लक्षणैरेतैर्विपरीतैस्तु षण्ढकः ॥ १० ॥ निम्नोक्त लक्षणों वाले बालक को पुरुष और इन लक्षणों से रहित को नपुंसक समझना चाहिए—
- जंघाओं और घुटनों की हड्डी का सुदृढ़ और सुसम्बद्ध होना।
- कन्धों की भीतरी अस्थियों का बलशाली होना।
- मस्तक के ऊपर घने, काले और लम्बे केशों का होना।
- ग्रीवा के पिछले भाग का स्थूल होना।
- शरीर की त्वचा पर घने बालों का उगना।
- व्यक्ति की चाल में स्फूर्ति और तीव्रता का होना।
- स्वर का गम्भीर और मधुर होना।
- वीर्य का पानी के ऊपर स्थिर रहना, डूब बह न जाना तथा
- मूत्र का स्वाभाविक रूप से निकलना तथा उसका झाग लिये रहना। चतुर्दशविधः शास्त्रे षण्ढो दृष्टो मनीषिभिः । चिकित्स्यश्चाचिकित्स्यश्च तेषामुक्त्तो विधिः क्रमात् ॥ ११॥ शरीर-वैज्ञानिकों ने चौदह प्रकार के नपुंसक माने हैं। उनमें कुछ चिकित्सा द्वारा आरोग्य प्राप्त कर सकते हैं, अर्थात् नपुसंकत्व को पुंसत्व में बदला जा सकता है, परन्तु कुछ भेद ऐसे हैं, जिनमें चिकित्सा द्वारा भी कोई परिवर्तन नहीं आ पाता। कितना और कैसा भी उपचार क्यों न कर लिया जाये, नपुंसकता दूर नहीं हो पाती। नपुंसकता के निम्नोक्त चौदह भेद हैं। निसर्गषण्ढो वध्रश्च पक्षषण्ढस्तथैव च । अभिशापाद् गुरो रोगाद्देवक्रोधात्तथैव च ॥ १२ ॥ ईर्ष्याषण्ढश्च सेव्यश्च वातरेता मुखेभगः । आक्षिप्तो मोघबीजश्च शालीनोऽन्यापतिस्तथा ॥ १३ ॥
- जन्मजात—लिंग और अण्डकोश रहित।
- वध्र—दाढ़ी-मूंछ-रहित।
- पक्षषण्ढ—एक पक्ष---शुक्ल अथवा कृष्ण—में रति भोग करने में समर्थ और दूसरे पक्ष में सर्वथा अशक्त ।
- अभिशप्त—गुरु अथवा महात्मा आदि के शाप से नष्ट पुंसत्व। नारदस्मृति / 197
- रोग विकार—किसी रोग के कारण पुंसत्व का नष्ट हो जाना।
- दैवी प्रकोप—किसी देवता के प्रकोप से पुंसत्व गंवा बैठना।
- ईर्ष्याषण्ढ—स्त्रियों के प्रति विद्वेष, हीनभावना अथवा घृणा आदि के कारण उत्तेजना खो देना।
- हीनता-ग्रस्त—स्त्रियों की सेवा करने से उन्हें भोगने में अरुचि, असामर्थ्य, भय, लज्जा एवं बेचैनी अनुभव करना।
- वातरेता—सम्भोग में प्रवृत्त होते ही वीर्य का स्खलित हो जाना।
- मुखेभग—भग में लिंग प्रवेश से भयभीत और मुख-मैथुन अथवा गुदा-मैथुन में रुचि रखना—एक प्रकार के अन्धविश्वास (वहम) का शिकार।
- आक्षिज—सम्भोग करने पर भी वीर्यपात न कर पाना। वीर्य का न निकलना।
- मोघबीज—वीर्य में सन्तानोत्पादक शुक्राणुओं का अभाव।
- शालीन—स्त्री संसर्ग के समय लिंग का उत्थित-उत्तेजित ही न होना।
- अन्यापति—अपनी पत्नी से भोग करने में असमर्थ, उसके सामने उत्तेजित न होने वाला, परन्तु दूसरी स्त्रियों से भोग करने में सफल। तत्राद्यावप्रतीकारौ पक्षाख्यो मासमाचरेत्। अनुक्रमात्तु यस्यान्य कालः सम्वत्सरः स्मृतः ॥ 14 ॥ उपर्युक्त चौदह प्रकार के नपुंसकों में से प्रथम दो—लिंगविहीन तथा श्मश्रु- विहीन—को तो सर्वथा असाध्य ही समझना चाहिए। इनकी तो कोई चिकित्सा ही नहीं है। पक्षषण्ढ की एक मास तक और दूसरे षण्ढों की एक साल तक चिकित्सा करके परिणाम की प्रतीक्षा करनी चाहिए। ईर्ष्याषण्ढादयोयेऽन्ये चत्वारः समुदाहृताः । त्यक्तव्यास्ते पतितवत् क्षतयोन्या अपि स्त्रिया ॥ 15 ॥ यद्यपि नारी विद्वेष, नारी सेवा, वातरेता तथा मुत्स्वेभग आदि नपुंसकों की स्थिति में अनुकूल परिवेश, उपयुक्त चिकित्सा, सहानुभूति तथा मनोवैज्ञानिक उपचार आदि अपनाकर सुधार लाया जा सकता है, तथापि इन्हें पतितों के समान समझकर त्याग देना चाहिए; क्योंकि इनकी मानसिकता को स्थायी रूप में बदलना कदापि सम्भव नहीं। कुण्ठाग्रस्त व्यक्ति कभी सफल सम्भोग नहीं कर पाता। अक्षिममोघबीजाभ्यां कृतेऽपि प्रतिकर्मणि। पतिरन्यः स्मृतो नार्या वत्सरार्धं प्रतीक्ष्य तु ॥ 16 ॥ विवाह करने पर पत्नी के साथ सम्भोग-क्रिया में लिंग उत्थित न कर पाने वाले (उत्तेजनाविहीन) तथा शीघ्रपात के रोगी और सन्तानोत्पत्ति के लिए अपेक्षित शुक्राणुओं से हीन वीर्य वाले पति को उपचार, चिकित्सा आदि के लिए छह महीने 198 / नारदस्मृति
की अवधि देनी चाहिए। इसके पश्चात् भी अनुकूल परिणाम न निकलने पर स्त्री को उसका परित्याग करके, दूसरे समर्थ पुरुष से विवाह कर लेना चाहिए। शालीनस्यापि धृष्टस्त्रीसंयोगाद् भृश्यते ध्वजः। तं हीनवेषमन्तस्त्रीबालान्धाभिरुपाचरेत् ॥ 17 ॥ स्त्री सम्पर्क के समय उत्थित लिंग को वीर्यपात हुए बिना स्थिर न रख पाने वाले पुरुष को, उसकी स्त्री के द्वारा सुन्दर, परन्तु भद्दी वेशभूषा वाली स्त्री अथवा भोली-भाली आकर्षक लड़की आदि को दिखाकर उसकी वासना को उद्दीप्त करने और उत्तेजना को बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। वस्तुतः कभी-कभी शालीन पुरुष (अत्यधिक शालीनता के कारण नपुंसक बना) थोड़ी स्वतन्त्रता तथा अपनी पत्नी का सहयोग-प्रोत्साहन पाकर सहज एवं सामान्य स्थिति में आ जाता है। अन्यस्या यो मनुष्यः स्यादमनुष्यः स्वयोजिति। लभेत सान्यं भर्तारमेतत् कार्यं प्रजापतेः ॥ 18 ॥ प्रजापति ने अन्य स्त्रियों के साथ सम्भोग में समर्थ, परन्तु अपनी पत्नी के सौन्दर्य, उद्धत स्वभाव, उच्च शिक्षा, सम्पन्न मायका तथा सामाजिक प्रतिष्ठा अथवा अन्यान्य किन्हीं कारणों से उससे सम्भोग करने में व उसे तृप्त-सन्तुष्ट करने में सर्वथा असमर्थ पुरुष को छोड़कर दूसरे समर्थ पुरुष से विवाह करने का स्त्री को अधिकार प्रदान किया है। अपत्यार्थं स्त्रियः सृष्टाः स्त्रीक्षेत्रं बीजिनो नराः। क्षेत्रं बीजवते देयं नाबीजी क्षेत्रमर्हति ॥ 19 ॥ सन्तान की उत्पत्ति के लिए स्त्रियों की सृष्टि हुई है। इस प्रकार स्त्री क्षेत्र है और पुरुष बीज धारण करने वाला है। वीर्यहीन पुरुष का क्षेत्र (स्त्री) को ग्रहण करने (विवाह करने) का कोई अधिकार नहीं है। पिता दद्यात् स्वयं कन्यां भ्राता वाऽनुमते पितुः। पितामहो मातुलश्च सकुल्या बान्धवास्तथा ॥ 20 ॥ कन्या का दान पहले तो स्वयं उसके पिता को या फिर कन्या के भ्राता को या फिर कन्या के पिता की अनुमति से कन्या के पितामह, मातुल, साकुल्य - चाचा अथवा चाचा के लड़के-आदि निकट सम्बन्धी अथवा अन्यान्य जाति बन्धु को करना चाहिए। इस सम्बन्ध में विष्णु ने अपनी स्मृति में माता को कन्यादान के अधिकारियों में एक तो सबसे पीछे फेंक दिया है और फिर उसके साथ शर्तें भी जोड़ दी हैं। उदाहरणार्थ, माता के स्वस्थ होने, परिवार से सौमनस्य रखने तथा पति की सेवा में रत (सम्भोग से तृप्त करने) रहने वाली होने पर ही उसे कन्यादान का अधिकार है। इन योग्यताओं से रहित होने पर अपनी कन्या के दान का अधिकार उसे नहीं, नारदस्मृति / 199
अपितु उसके जाति-बन्धुओं को होता है- यथोक्तसर्वाभावे माता दद्यात् यदि प्रकृतिस्था वृत्तस्था पतितल्पमुपास्ते चेत्। तस्यां चासत्यामवृत्तस्थायां च समान जातीयाः। माता त्वभाव सर्वेषां प्रकृतौ यदि वर्तते। तस्यामप्रकृतिस्थायां दद्युः कन्यां सनाभयः ॥ 21 ॥ उपर्युक्त सभी-भ्राता, पितामह तथा मातुल आदि-के अभाव में मानसिक रूप से स्वस्थ होने पर माता कन्यादान कर सकती है, परन्तु माता के मानसिक रूप से विकारग्रस्त होने पर यह दायित्व कुटुम्बी अथवा सपिण्डीजनों को ही निभाना चाहिए। टिप्पणी-उपर्युक्त कन्या के दाताओं के अधिकारी सम्बन्धियों में पिता के उपरान्त-जीवित न होने पर अथवा असमर्थ अथवा अनिच्छुक होने पर-दूसरा स्थान भ्राता को और तृतीय स्थान माता को दिया गया है-पिता दद्यात् कन्यां स्वयम्। स्वयं ग्रहणमन्यनिरपेक्षप्रामाण्यार्थम्। पित्रा अनुज्ञातो भ्राता वा, पितुरभावे माता वा। तदभावे पितामहः। इस कथन से स्पष्ट है कि पिता के जीवित होते उसकी आज्ञा से कन्या का भाई अथवा माता-पिता कन्यादान कर सकते हैं, परन्तु पिता के न रहने पर या दिवंगत होने अथवा प्रवासित होने पर पहला अधिकार केवल माता का है। माता के भी जीवित न होने पर यह अधिकार दादा, नाना आदि को मिलता है। एक अन्य विचारणीय तथ्य यह है कि माता की पात्रता के सम्बन्ध में लगायी गयी शर्त-मानसिक रूप से स्वस्थ होनी चाहिए-अन्य सम्बन्धियों पर नहीं लगायी गयी। वस्तुतः यह मातृत्व का घोर अपमान है। पिता के उपरान्त दूसरा स्थान तो माता को ही मिलना चाहिए, परन्तु पुरुषप्रधान समाज यह सब कैसे सहन कर सकता है ? ऐसी उदारता कैसे दिखा सकता है ? यदा तु नैव कश्चित् स्यात् कन्या राजानमाश्रयेत्। अनुज्ञया तस्य वरं प्रतीत्य वरयेत् स्वयम्॥ 22 ॥ किसी भी अभिभावक-पिता, भ्राता, माता, पितामह तथा मातुल-के अतिरिक्त बन्धु बान्धव और सपिण्डी आदि के न होने पर कन्या द्वारा राजा को अपना संरक्षक एवं अभिभावक मानकर उसके प्रशासन द्वारा अभिभावकविहीन कन्याओं के संरक्षण के लिए मनोनीत अधिकारी की अनुमति एवं सहमति प्राप्त कर स्वयं ही अपने लिए अपनी इच्छानुसार वर की खोज करनी चाहिए। सवर्णमनुरूपं च कुलशीलवयः श्रुतैः। सह धर्मं चरेत्तेन प्रजाश्चोत्पादयेत्ततः ॥ 23 ॥ अभिभावकविहीन कन्या को अपनी ही जाति के कुलीन, चरित्रवान्, सुन्दर 200 / नारदस्मृति
आयु, विद्या और गुणों की दृष्टि से सही लगने वाले युवक को ढूंढकर उससे विवाह कर लेना चाहिए। इस प्रकार ऐसी कन्या को अपने उद्यम से ही सन्तान उत्पन्न कर अपना घर बसाना चाहिए। प्रतिगृह्य च यः कन्यां वरो देशान्तरं व्रजेत्। त्रीनृतून् समतिक्रम्य कन्यान्वं वरयेद्वरम्॥ 24 ॥ यदि अभिभावकविहीन कन्या चुने हुए वर के द्वारा धोखे का शिकार हो जाती है, अर्थात् उसका पति उसे लौटने का आश्वासन देकर विदेश चला जाता है अथवा अपने ही देश में बिना कुछ बताये कहीं अन्यत्र चला जाता है, तो ऐसी स्त्री को तीन ऋतुओं तक, अर्थात् छः मास तक अपने पति के लौटने की प्रतीक्षा करनी चाहिए। इस अवधि में उसके न लौटने और न ही कोई सूचना देने पर स्त्री किसी दूसरे युवक के वरण करने को स्वतन्त्र होती है। इसमें किसी प्रकार का कोई अनौचित्य नहीं है। कन्या नर्तुमुपेक्षेत बान्धवेभ्यो निवेदयेत्। ते चेन्न दद्युस्तां भर्त्रे ते स्युर्भ्रूणहभिः समाः॥ 25 ॥ अभिभावकविहीन कन्या के ऋतुमती हो जाने पर उसे इस तथ्य को गुप्त न रखकर अपने समीप-दूर के सभी सम्बन्धियों को बताना चाहिए और उनसे अपने लिए उपयुक्त वर की खोज का निवेदन करना चाहिए। इस तथ्य को जानने के उपरान्त भी निश्चेष्ट रहने वाले, अर्थात् कन्या के लिए उपयुक्त वर की खोज न करने वाले बन्धु-बान्धव भ्रूणहत्या के दोषी होते हैं। यावन्तश्चर्तवस्तस्याः समतीयुः पतिं विना। तावत्यो भ्रूणहत्याः स्युस्तस्य यो न ददाति ताम्॥ 26 ॥ मातृपितृविहीन कन्या के अभिभावकों को यह स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि कन्या के युवती हो जाने की जानकारी प्राप्त करने के उपरान्त भी कन्या के लिए यथाशीघ्र उपयुक्त वर की व्यवस्था न करने वाले दूर-समीप के बन्धु-बान्धव कन्या की व्यर्थ जाने वाली ऋतुओं की संख्या के अनुरूप भ्रूणहत्या के दोषी बनते हैं, अर्थात् कन्या जितनी बार ऋतुमती होती है और अपने दुर्भाग्य पर रोती है तथा सोचती है कि वह विवाहिता होती, तो पति के संग से फलवती हो सकती थी, अब उसका ऋतुमती होना व्यर्थ जा रहा है, उतनी बार की भ्रूणहत्या का पाप बन्धु- बान्धवों को लगता है। अतोऽप्रवृत्ते रजसि कन्यां दद्यात् पिता सकृत्। महदेनः स्पृशेदेनमन्यथैवं विधिः सताम्॥ 27 ॥ कन्या की ऋतुओं को सार्थक बनाने के उद्देश्य से कन्या के ऋतुमती होने से पूर्व ही उसके पिता भ्राता आदि को उसका विवाह कर देना चाहिए, अन्यथा पिता नारदस्मृति / 201
आदि अभिभावक पाप के भागी होते हैं। सकृदंशो निपतति सकृत् कन्या प्रदीयते। सकृदाह ददानीति त्रीण्येतानि सतां सकृत्॥ २८॥ सज्जनों को यह सदैव स्मरण रखना चाहिए कि निम्नोक्त तीन कार्य एक ही बार किये जाते हैं, बदले पलटे नहीं जाते। जो एक बार कह दिया, वह अटल और स्थिर होता है। अतः मुंह खोलने से पूर्व भली प्रकार सोच-विचार कर लेना चाहिए। ये तीन हैं—
- पैतृक सम्पत्ति का विभाजन, 2. कन्यादान तथा 3. धन सम्पत्ति के दान का संकल्प। ब्राह्मादिषु विवाहेषु पञ्चस्वेष विधिः स्मृतः। गुणापेक्षं भवेद्दानमासुरादिषु च त्रिषु॥ २९॥ पांच – ब्राह्म, प्राजापत्य, आर्ष, दैव और गान्धर्व—प्रकार के विवाहों में कन्या का दान एक बार किया जाता है, अर्थात् एक बार जिसे दे दिया, दे दिया। प्रथम दान को ही अन्तिम माना जाता है, परन्तु इसके विपरीत तीन - आसुर, राक्षस और पैशाच-प्रकार के विवाहों में वर की योग्यता एवं गुणवत्ता के आधार पर देने के संकल्प को बदला जा सकता है, अर्थात् यदि एक व्यक्ति को कन्या देने का वचन दे दिया और उसके उपरान्त पहले वाले से अधिक दूसरा योग्य वर मिल गया, तो अभिभावक अपने वचन को बदल सकता है। कन्यायां दत्तशुल्कायां ज्यायांश्चेद्वर आव्रजेत्। धर्मार्थकामसंयुक्तं वाच्यं तत्रानृतं भवेत् ॥ ३०॥ कन्या का शुल्क ग्रहण करने के पश्चात्, अर्थात् धन लेकर कन्या देने का समझौता करने के उपरान्त भी, यदि पहले से अधिक योग्य वर मिल जाता है, तो पहले वालों को पैसा लौटाकर सम्बन्ध विच्छेद किया जा सकता है। इसमें किसी प्रकार का कोई दोष नहीं। टिप्पणी- याज्ञवल्क्य व मनु आदि स्मृतिकारों ने तो कन्या के शुल्क को ग्रहण करते समय अथवा ग्रहण करने के पश्चात् पहले से अधिक प्रशस्त वर के मिलने पर सम्बन्ध विच्छेद करने के लिए अभिभावकों द्वारा मिथ्याभाषण को— कन्या को ही यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं, अब उसे विवश तो नहीं किया जा सकता आदि-अनुचित अथवा दोषपूर्ण नहीं माना। कन्यायां प्राप्तशुल्कायां शुल्कग्रहण काले प्रशस्यतरः प्रार्थनीयो यद्या- गच्छेत्, तत्र धर्मादियुक्तं शीलवती, कुलरूपवती चेत्याद्यनृतमपि प्रयोजनार्थं वक्तव्यम्। नात्रानृत वचने दोषः। अन्य आह—गृहीतशुल्कायां प्रशस्यतरो यद्यान्य आगच्छेत् तत्र धर्मादि- 202 / नारदस्मृति
युक्तमविधेया अविनेया अतिविरूपा च तस्मात् तव न ददामीति शुल्कप्रदाने नास्त्यनृतदोषः। स्पष्ट है कि कन्या को अधिक उपयुक्त वर देने की दृष्टि से पहले प्रस्ताव को भंग करने के लिए झूठे बहाने बनाने में भी दोष नहीं माना गया। हमारे विचार में कालान्तर में कुछ दुष्ट अभिभावकों द्वारा अपने लोभ की पूर्ति के लिए इस झूठ का जमकर दुरुपयोग किया जाने लगा। नादुष्टां दूषयेत् कन्यां नादुष्टं दूषयेद्वरम्। दोषं तु सति नागः स्यादन्योन्यं त्यजतास्तयोः॥ ३१॥ दोष-रहित कन्या अथवा वर में सम्बन्ध स्थिर हो जाने के उपरान्त छिद्रान्वेषण अथवा दोष-दर्शन जहां सर्वथा अनुचित है, वहां स्पष्ट दोष दिखाई देने पर कन्या अथवा वर के त्यागने अथवा सम्बन्ध-विच्छेद करने में कोई दोष अथवा अनौचित्य नहीं है। दत्वा न्यायेन यः कन्यां वराय न ददाति ताम्। अदुष्टश्चेद्दरो राज्ञा स दण्ड्यस्तत्र चौरवत्॥ ३२॥ भली प्रकार सोच विचार करके विधिपूर्वक कन्या का वाग्दान करने के उपरान्त वर में किसी दोष के न होने पर तथा वर पक्षवालों के किसी अपराध के न करने पर भी अपने वचन से मुकरने वाले, अर्थात् वाग्दत्ता कन्या का विवाह न करने वाले कन्या के अभिभावक को प्रशासन द्वारा चोर के लिए निर्धारित दण्ड से दण्डित करना चाहिए। यस्तु दोषवतीं कन्यामनाख्याय प्रयच्छति। तस्य कुर्यान्नृपो दण्डं पूर्वसाहसचोदितम्॥ ३३॥ किसी दोष- असाध्य रोग से पीड़ित, बोलने में हकलाना तथा चलने में लड़खड़ाना आदि-से ग्रस्त कन्या के दोष को छिपाकर धोखे से उसे किसी के मत्थे मढ़ने वाले, अर्थात् वर पक्षवालों को अंधेरे में रखने वाले कन्या के अभिभावक (पिता आदि) को पूर्वसाहस का दण्ड देना चाहिए। अकन्येति तु यः कन्यां ब्रूयाद् द्वेषेण मानवः। स शतं प्राप्नुयाद्दण्डं तस्या दोषमदर्शयन्॥ ३४॥ किसी अक्षतयोनि कन्या को भुक्त (पुरुष विशेष से सम्बन्ध रखने वाली) कहकर कलंकित करने वाले, परन्तु अपने आरोप को सिद्ध करने के लिए प्रमाण न जुटा सकने वाले व्यक्ति से सौ पण दण्ड के रूप में वसूल करने चाहिए। प्रतिगृह्य तु यः कन्यामदुष्टामृत्सृजेन्नरः। स विनेयस्त्वकामोऽपि कन्यां तामेव चोद्वहेत्॥ ३५॥ दोषरहित कन्या के ग्रहण की सहमति देकर, अकारण उसका परित्याग करने नारदस्मृति / 203