भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

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पृष्ठ 189

अभिज्ञातैश्च वल्मीकस्थलनिम्नोन्नतादिभिः। केदाराराममार्गैश्च पुराणैः सेतुभिस्तथा ॥ ५ ॥ सीमा के निर्धारण के कुछ अन्य लक्षण इस प्रकार हैं—

  1. वृद्ध लोगों द्वारा प्रयोग में लाये जाने वाले ऊंचे स्थान अथवा रेत के टीले का होना।
  2. स्थान का ऊंचा-नीचा होना। जानकारों को स्मरण रहता है कि अमुक का क्षेत्र ऊंचा था व अमुक का क्षेत्र नीचा था।
  3. क्षेत्र का उर्वर-अनुर्वर होना।
  4. सेतु के समीप अथवा दूर होना।
  5. सिंचाई-सुविधा का सुलभ होना-न होना तथा
  6. उद्यान की ओर जाने वाले मार्ग का पुराना अथवा नया होना आदि। निम्नगापहतोत्सन्ननष्टचिह्नासु भूमिषु। तत्प्रदेशानुमानाच्च प्रमाणैर्भोगदर्शनैः ॥ ६ ॥ नदी के स्रोत से धरती के डूब जाने के कारण सीमाचिह्नों के नष्ट हो जाने पर वृद्धजनों द्वारा तर्क, युक्ति, अनुमान, क्षेत्र के आकार-प्रकार, वर्गफल तथा अन्य क्षेत्रों की सीमा से दूरी, समीपता आदि के अतिरिक्त लिखित रिकार्ड से पूर्व- पश्चिम में लम्बाई-चौड़ाई आदि को ध्यान में रखते हुए सीमा का निर्धारण करना चाहिए। अथ चेदनृतं ब्रूयुः सामन्तास्तद्विनिश्चये। सर्वे पृथक् पृथग्दण्ड्या राज्ञा मध्यमसाहसम् ॥ ७ ॥ सीमा-निर्धारण के लिए मनोनीत वृद्ध पुरुषों द्वारा पक्षपात करने, असत्य- भाषण करने तथा जान-बूझकर ग़लत दृष्टिकोण अपनाने पर उन सबको पृथक्- पृथक् मध्यम साहस के लिए निर्धारित दण्ड से दण्डित करना चाहिए। प्रत्येकं तु जघन्यास्ते विनेयाः पूर्वसाहसम्॥ अर्थात् भूमि से सम्बन्धित किसी भी कार्य—सीमाविवाद का निपटारा तथा कृषि-चोरी के विवाद आदि—के लिए मनोनीत वृद्ध पुरुषों द्वारा मिथ्याभाषण करने पर प्रत्येक सदस्य को शारीरिक तथा आर्थिक दण्ड देकर उन्हें भविष्य में ऐसा न करने के लिए प्रशिक्षित करना चाहिए। गणवृद्धादयस्त्वन्ये दण्डं दाप्याः पृथक् पृथक् । विनेयाः प्रथमेन स्युः साहसेनानृते स्थिताः ॥ ८ ॥ भूमि-कार्य में प्रामाणिक माने जाने वाले गोपालक, व्याध, साधु, कृषिजीवी तथा अन्य वनवासी लोगों द्वारा असत्य का पक्ष ग्रहण करने तथा दुराग्रही होने पर उन्हें भी पृथक्-पृथक् प्रथम साहस के लिए निर्धारित दण्ड देकर भली प्रकार सही नारदस्मृति / 187