भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 304 में से

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पृष्ठ 188
  1. सीमा-बन्ध सेतुकेदारमर्यादाविकृष्टाकृष्टनिश्चये । क्षेत्राधिकारो यस्तु स्याद्विवादः क्षेत्रजस्तु सः ॥ 1 ॥ सेतु और कृषिक्षेत्र की अनिश्चित एवं अनिर्णीत सीमा के निर्धारण से सम्बन्धित तथा क्षेत्र एवं भू-भाग पर अधिकार को लेकर उठने वाला विवाद क्षेत्रज अथवा 'सीमा-बन्ध' विवाद कहलाता है। क्षेत्रसीमाविवादेषु सामन्तेभ्यो विनिश्चयः । नगरग्रामगणिनो ये च वृद्धतमा नराः ॥ 2 ॥ क्षेत्र की सीमा के सम्बन्ध में दो अथवा अधिक व्यक्तियों में मतभेद उत्पन्न होने अथवा विवाद उठने पर आस-पास रहने वाले प्रतिष्ठित एवं सदाचारी पञ्चों को अथवा नगर, ग्राम और गणराज्यों की सीमा की प्रामाणिक जानकारी रखने वाले वृद्धजनों-अधिक से अधिक आयु वालों-को मध्यस्थ बनाना चाहिए। ग्रामसीमासु च बहिर्ये स्युस्तत्कृषिजीविनः । गोपशाकुनिकव्याधा ये चान्ये वनजीविनः ॥ 3 ॥ समुन्नयेयुस्ते सीमां लक्षणैरुपलक्षिताम् । तुषाङ्गारकपालैश्च कूपैरायतनैर्द्रुमैः ॥ 4 ॥ सीमा निर्णय में साधक कुछ अन्य व्यक्ति और कुछ चिह्न इस प्रकार हैं-
  2. ग्राम की सीमाओं पर रहने वाले और कृषि आदि से अपनी आजीविका चलाने वाले लोग।
  3. पशु चराने वाले गोपालक।
  4. पशुओं का शिकार करने वाले, व्याध आदि।
  5. पक्षियों को पकड़ने वाले बहेलिये-चिड़ीमार तथा
  6. वनों में रहने वाले चोर, डाकू तथा साधु, महात्मा आदि।
  7. चिह्नों (उपलक्षणों) के रूप में द्रष्टव्य वस्तुएं हैं-तुष (भूसा), कोयला, पत्थर, हड्डी, खोपड़ी आदि. प्राचीनकाल में सीमा को चिह्नित करने के लिए सीसा, पत्थर, खोपड़ी, कोयला आदि का प्रयोग किया जाता था; क्योंकि ये पदार्थ दीर्घकाल तक नष्ट नहीं होते। धरती के नीचे दबे इन पदार्थों को खोजकर इनके आधार पर सीमारेखा निश्चित करनी चाहिए। इन लक्षणों के अतिरिक्त कूप, तालाब, जोहड़ और वृक्षों की स्थिति को भी सीमा के निर्धारण का आधार बनाना चाहिए। 186 / नारदस्मृति