नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 190, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंमार्ग पर लाना और अनुशासित करना चाहिए। नैकः समुन्नयेत् सीमां नरः प्रत्ययवानपि। गुरुत्वादस्य कायस्य क्रियैषा बहुषु स्थिता ॥ ९ ॥ किसी एक व्यक्ति के नितान्त सत्यनिष्ठ, योग्य, अनुभवी, विश्वसनीय और प्रामाणिक होने पर भी सीमा निर्धारण का कार्य उस अकेले व्यक्ति से कदापि नहीं कराना चाहिए। वस्तुतः यह कार्य इतना महत्त्वपूर्ण है कि इसे किसी अकेले को सौंपा ही नहीं जा सकता। इसके लिए गहन विचार-विमर्श की अपेक्षा होती है, जो एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा ही सम्भव है। एकश्चेदुन्नयेत् सीमां सोपवासः समाहितः। रक्तमाल्याम्बरधरः क्षितिमारोप्य मूर्धनि ॥ १० ॥ यदि परिस्थितिवश नितान्त योग्य, सुपरीक्षित, सत्यनिष्ठ एवं प्रतिष्ठित व्यक्ति को अकेले ही सीमा निर्धारण का कार्य सौंपा जाता है, तो उसे उस दिन उपवास रखना चाहिए, लोहित वस्त्र धारण करने चाहिए तथा सिर पर मिट्टी और हाथ में भाला लेकर समर्पित कार्य का निर्वहण करना चाहिए, अर्थात् भगवान् से न्याय और सत्य की रक्षा में सहायक होने की प्रार्थना करते हुए निरपेक्ष भाव से कर्तव्य-पालन करना चाहिए। यदि च न स्युर्ज्ञातारः सीमायाश्च न लक्षणम्। तदा राजा द्वयोः सीमामुन्नयेदिष्टतः स्वयम् ॥ ११ ॥ सीमा के चिह्नों के मिट जाने और पता न चल पाने पर तथा सीमा के जानकारों के भी सुलभ न होने अथवा अपनी असमर्थता प्रकट करने पर, प्रशासन को दोनों पक्षों को सुनकर अपने विवेक से दोनों क्षेत्रों की सीमा का निर्धारण कर देना चाहिए। एतेनैव गृहोद्याननिपानायतनादिषु। विवादविधिराख्यातस्तथा ग्रामान्तरेषु च ॥ १२ ॥ आवासीय भू खण्ड, उद्यान, पानीयशाला, देवस्थान, पशुचारणभूमि, ग्रामों की भूमि तथा राजकीय और निजी भूमि के सम्बन्ध में उत्पन्न विवाद में सीमा- निर्धारण की इसी विधि को अपनाना चाहिए। सीमामध्ये तु जातानां वृक्षाणां क्षेत्रयोर्द्वयोः। फलपुष्पं च सामान्यं क्षेत्रस्वामिषु निर्दिशेत् ॥ १३ ॥ दो स्वामियों के दो क्षेत्रों की सीमा के मध्य में उत्पन्न वृक्षों के फल-पुष्पादि पर दोनों का समान अधिकार होता है। दोनों को बांटकर अथवा अपने-अपने क्षेत्र में पड़ने वाली शाखाओं पर लगने वाले फल लेने चाहिए। अन्यक्षेत्रोपजातानां शाखास्त्वन्यत्र संस्थिताः। स्वामिनस्ता विजानीयादन्यक्षेत्रविनिर्गताः ॥ १४ ॥ 188 / नारदस्मृति