नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 201, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंकी अवधि देनी चाहिए। इसके पश्चात् भी अनुकूल परिणाम न निकलने पर स्त्री को उसका परित्याग करके, दूसरे समर्थ पुरुष से विवाह कर लेना चाहिए। शालीनस्यापि धृष्टस्त्रीसंयोगाद् भृश्यते ध्वजः। तं हीनवेषमन्तस्त्रीबालान्धाभिरुपाचरेत् ॥ 17 ॥ स्त्री सम्पर्क के समय उत्थित लिंग को वीर्यपात हुए बिना स्थिर न रख पाने वाले पुरुष को, उसकी स्त्री के द्वारा सुन्दर, परन्तु भद्दी वेशभूषा वाली स्त्री अथवा भोली-भाली आकर्षक लड़की आदि को दिखाकर उसकी वासना को उद्दीप्त करने और उत्तेजना को बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। वस्तुतः कभी-कभी शालीन पुरुष (अत्यधिक शालीनता के कारण नपुंसक बना) थोड़ी स्वतन्त्रता तथा अपनी पत्नी का सहयोग-प्रोत्साहन पाकर सहज एवं सामान्य स्थिति में आ जाता है। अन्यस्या यो मनुष्यः स्यादमनुष्यः स्वयोजिति। लभेत सान्यं भर्तारमेतत् कार्यं प्रजापतेः ॥ 18 ॥ प्रजापति ने अन्य स्त्रियों के साथ सम्भोग में समर्थ, परन्तु अपनी पत्नी के सौन्दर्य, उद्धत स्वभाव, उच्च शिक्षा, सम्पन्न मायका तथा सामाजिक प्रतिष्ठा अथवा अन्यान्य किन्हीं कारणों से उससे सम्भोग करने में व उसे तृप्त-सन्तुष्ट करने में सर्वथा असमर्थ पुरुष को छोड़कर दूसरे समर्थ पुरुष से विवाह करने का स्त्री को अधिकार प्रदान किया है। अपत्यार्थं स्त्रियः सृष्टाः स्त्रीक्षेत्रं बीजिनो नराः। क्षेत्रं बीजवते देयं नाबीजी क्षेत्रमर्हति ॥ 19 ॥ सन्तान की उत्पत्ति के लिए स्त्रियों की सृष्टि हुई है। इस प्रकार स्त्री क्षेत्र है और पुरुष बीज धारण करने वाला है। वीर्यहीन पुरुष का क्षेत्र (स्त्री) को ग्रहण करने (विवाह करने) का कोई अधिकार नहीं है। पिता दद्यात् स्वयं कन्यां भ्राता वाऽनुमते पितुः। पितामहो मातुलश्च सकुल्या बान्धवास्तथा ॥ 20 ॥ कन्या का दान पहले तो स्वयं उसके पिता को या फिर कन्या के भ्राता को या फिर कन्या के पिता की अनुमति से कन्या के पितामह, मातुल, साकुल्य - चाचा अथवा चाचा के लड़के-आदि निकट सम्बन्धी अथवा अन्यान्य जाति बन्धु को करना चाहिए। इस सम्बन्ध में विष्णु ने अपनी स्मृति में माता को कन्यादान के अधिकारियों में एक तो सबसे पीछे फेंक दिया है और फिर उसके साथ शर्तें भी जोड़ दी हैं। उदाहरणार्थ, माता के स्वस्थ होने, परिवार से सौमनस्य रखने तथा पति की सेवा में रत (सम्भोग से तृप्त करने) रहने वाली होने पर ही उसे कन्यादान का अधिकार है। इन योग्यताओं से रहित होने पर अपनी कन्या के दान का अधिकार उसे नहीं, नारदस्मृति / 199