नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 202, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपितु उसके जाति-बन्धुओं को होता है- यथोक्तसर्वाभावे माता दद्यात् यदि प्रकृतिस्था वृत्तस्था पतितल्पमुपास्ते चेत्। तस्यां चासत्यामवृत्तस्थायां च समान जातीयाः। माता त्वभाव सर्वेषां प्रकृतौ यदि वर्तते। तस्यामप्रकृतिस्थायां दद्युः कन्यां सनाभयः ॥ 21 ॥ उपर्युक्त सभी-भ्राता, पितामह तथा मातुल आदि-के अभाव में मानसिक रूप से स्वस्थ होने पर माता कन्यादान कर सकती है, परन्तु माता के मानसिक रूप से विकारग्रस्त होने पर यह दायित्व कुटुम्बी अथवा सपिण्डीजनों को ही निभाना चाहिए। टिप्पणी-उपर्युक्त कन्या के दाताओं के अधिकारी सम्बन्धियों में पिता के उपरान्त-जीवित न होने पर अथवा असमर्थ अथवा अनिच्छुक होने पर-दूसरा स्थान भ्राता को और तृतीय स्थान माता को दिया गया है-पिता दद्यात् कन्यां स्वयम्। स्वयं ग्रहणमन्यनिरपेक्षप्रामाण्यार्थम्। पित्रा अनुज्ञातो भ्राता वा, पितुरभावे माता वा। तदभावे पितामहः। इस कथन से स्पष्ट है कि पिता के जीवित होते उसकी आज्ञा से कन्या का भाई अथवा माता-पिता कन्यादान कर सकते हैं, परन्तु पिता के न रहने पर या दिवंगत होने अथवा प्रवासित होने पर पहला अधिकार केवल माता का है। माता के भी जीवित न होने पर यह अधिकार दादा, नाना आदि को मिलता है। एक अन्य विचारणीय तथ्य यह है कि माता की पात्रता के सम्बन्ध में लगायी गयी शर्त-मानसिक रूप से स्वस्थ होनी चाहिए-अन्य सम्बन्धियों पर नहीं लगायी गयी। वस्तुतः यह मातृत्व का घोर अपमान है। पिता के उपरान्त दूसरा स्थान तो माता को ही मिलना चाहिए, परन्तु पुरुषप्रधान समाज यह सब कैसे सहन कर सकता है ? ऐसी उदारता कैसे दिखा सकता है ? यदा तु नैव कश्चित् स्यात् कन्या राजानमाश्रयेत्। अनुज्ञया तस्य वरं प्रतीत्य वरयेत् स्वयम्॥ 22 ॥ किसी भी अभिभावक-पिता, भ्राता, माता, पितामह तथा मातुल-के अतिरिक्त बन्धु बान्धव और सपिण्डी आदि के न होने पर कन्या द्वारा राजा को अपना संरक्षक एवं अभिभावक मानकर उसके प्रशासन द्वारा अभिभावकविहीन कन्याओं के संरक्षण के लिए मनोनीत अधिकारी की अनुमति एवं सहमति प्राप्त कर स्वयं ही अपने लिए अपनी इच्छानुसार वर की खोज करनी चाहिए। सवर्णमनुरूपं च कुलशीलवयः श्रुतैः। सह धर्मं चरेत्तेन प्रजाश्चोत्पादयेत्ततः ॥ 23 ॥ अभिभावकविहीन कन्या को अपनी ही जाति के कुलीन, चरित्रवान्, सुन्दर 200 / नारदस्मृति