भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 203, कुल 304 में से

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पृष्ठ 203

आयु, विद्या और गुणों की दृष्टि से सही लगने वाले युवक को ढूंढकर उससे विवाह कर लेना चाहिए। इस प्रकार ऐसी कन्या को अपने उद्यम से ही सन्तान उत्पन्न कर अपना घर बसाना चाहिए। प्रतिगृह्य च यः कन्यां वरो देशान्तरं व्रजेत्। त्रीनृतून् समतिक्रम्य कन्यान्वं वरयेद्वरम्॥ 24 ॥ यदि अभिभावकविहीन कन्या चुने हुए वर के द्वारा धोखे का शिकार हो जाती है, अर्थात् उसका पति उसे लौटने का आश्वासन देकर विदेश चला जाता है अथवा अपने ही देश में बिना कुछ बताये कहीं अन्यत्र चला जाता है, तो ऐसी स्त्री को तीन ऋतुओं तक, अर्थात् छः मास तक अपने पति के लौटने की प्रतीक्षा करनी चाहिए। इस अवधि में उसके न लौटने और न ही कोई सूचना देने पर स्त्री किसी दूसरे युवक के वरण करने को स्वतन्त्र होती है। इसमें किसी प्रकार का कोई अनौचित्य नहीं है। कन्या नर्तुमुपेक्षेत बान्धवेभ्यो निवेदयेत्। ते चेन्न दद्युस्तां भर्त्रे ते स्युर्भ्रूणहभिः समाः॥ 25 ॥ अभिभावकविहीन कन्या के ऋतुमती हो जाने पर उसे इस तथ्य को गुप्त न रखकर अपने समीप-दूर के सभी सम्बन्धियों को बताना चाहिए और उनसे अपने लिए उपयुक्त वर की खोज का निवेदन करना चाहिए। इस तथ्य को जानने के उपरान्त भी निश्चेष्ट रहने वाले, अर्थात् कन्या के लिए उपयुक्त वर की खोज न करने वाले बन्धु-बान्धव भ्रूणहत्या के दोषी होते हैं। यावन्तश्चर्तवस्तस्याः समतीयुः पतिं विना। तावत्यो भ्रूणहत्याः स्युस्तस्य यो न ददाति ताम्॥ 26 ॥ मातृपितृविहीन कन्या के अभिभावकों को यह स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि कन्या के युवती हो जाने की जानकारी प्राप्त करने के उपरान्त भी कन्या के लिए यथाशीघ्र उपयुक्त वर की व्यवस्था न करने वाले दूर-समीप के बन्धु-बान्धव कन्या की व्यर्थ जाने वाली ऋतुओं की संख्या के अनुरूप भ्रूणहत्या के दोषी बनते हैं, अर्थात् कन्या जितनी बार ऋतुमती होती है और अपने दुर्भाग्य पर रोती है तथा सोचती है कि वह विवाहिता होती, तो पति के संग से फलवती हो सकती थी, अब उसका ऋतुमती होना व्यर्थ जा रहा है, उतनी बार की भ्रूणहत्या का पाप बन्धु- बान्धवों को लगता है। अतोऽप्रवृत्ते रजसि कन्यां दद्यात् पिता सकृत्। महदेनः स्पृशेदेनमन्यथैवं विधिः सताम्॥ 27 ॥ कन्या की ऋतुओं को सार्थक बनाने के उद्देश्य से कन्या के ऋतुमती होने से पूर्व ही उसके पिता भ्राता आदि को उसका विवाह कर देना चाहिए, अन्यथा पिता नारदस्मृति / 201