भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

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पृष्ठ 207

अष्टौ विवाहा वर्णानां संस्कारार्थं प्रकीर्तिताः । ब्राह्मस्तु प्रथमस्तेषां प्राजापत्यस्तथापरः ॥ ३८ ॥ आर्षश्चैव हि दैवश्च गान्धर्वश्चासुरस्तथा। राक्षसोऽनन्तरस्तस्मात् पैशाचस्त्वष्टमः स्मृतः ॥ ३९ ॥ चारों वर्णों के लोगों के विवाह के निम्नोक्त आठ भेद हैं—ब्राह्म, प्राजापत्य, आर्ष, दैव, गान्धर्व, आसुर, राक्षस तथा पैशाच। सत्कृत्याहूय कन्यां तु दद्यात्ब्राह्मोत्वलंकृताम्। सह धर्मं चरेत्युक्त्वा प्राजापत्यो विधिः स्मृतः ॥ ४० ॥ ब्राह्म विवाह में कन्या का पिता वर को निमन्त्रित करके उसे अपनी सुभूषित और अलंकृता कन्या सादर समर्पित करता है। प्राजापत्य विवाह में कन्या का पिता वर को कन्या समर्पित करते हुए उन दोनों को मिलकर धर्मानुचरण करने का निर्देश देता है। वस्त्रगोमिथुनाभ्यां तु विवाहस्त्वार्ष उच्यते। अन्तर्वेद्यां तु दैवः स्याहृत्विजे कर्म कुर्वते ॥ ४१ ॥ वरपक्ष से वस्त्र, गाय और वृषभ आदि लेकर कन्या का विवाह करना आर्ष विवाह कहलाता है तथा ऋत्विक् कर्म करने वाले को दक्षिणा के रूप में कन्यादान करना दैव विवाह कहलाता है। इच्छन्तीमिच्छतः प्राहुर्गान्धर्वं नाम पञ्चमम्। विवाहस्त्वासुरो ज्ञेयः शुल्कसंव्यवहारतः ॥ ४२ ॥ एक-दूसरे पर अनुरक्त लड़के-लड़की को दोनों के माता-पिता द्वारा विवाह बन्धन में बांध देना गान्धर्व विवाह कहलाता है तथा शुल्क लेकर कन्या का दान, अर्थात् कन्या को बेचना—उपयुक्त पात्रता की अपेक्षा शुल्क की राशि को महत्त्व देना—आसुर विवाह कहलाता है। प्रसह्यहरणादुक्तो विवाहो राक्षसस्तथा। सुप्तप्रमत्तोपगमात् पैशाचस्त्वष्टमोऽधमः ॥ ४३ ॥ कन्या तथा उसके माता-पिता की इच्छा-अनिच्छा, सहमति-विमति आदि की अपेक्षा किये बिना बलपूर्वक कन्या का हरण करके, उससे विवाह कर लेना राक्षस विवाह कहलाता है तथा सोयी हुई, मूर्च्छित अथवा प्रमत्त स्त्री से सम्भोग करके उसे विवाह के लिए विवश-सहमत करना पैशाच विवाह कहलाता है, जो क्रम की दृष्टि से आठवें स्थान पर है। एषां तु धर्म्याश्चत्वारो ब्राह्माद्याः समुदाहृताः । साधारणः स्याद् गन्धर्वस्त्रयोऽधर्म्यास्ततः परे ॥ ४४ ॥ उपर्युक्त आठ प्रकार के विवाहों में प्रथम चार—ब्राह्म, प्राजापत्य, आर्ष तथा नारदस्मृति / 205