नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 208, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंदैव—धर्मसम्मत हैं। पांचवां गान्धर्व विवाह साधारण है, अर्थात् उसे न धर्मसम्मत कहा जा सकता है और न ही धर्म विरुद्ध। अन्य तीन--आसुर, राक्षस तथा पैशाच—अधर्म और पाप-रूप होने से निन्दनीय एवं त्याज्य हैं। परपूर्वाः स्त्रियस्त्वन्याः सप्त प्रोक्ता यथाक्रमम्। पुनर्भूर्स्त्रिविधा तासां स्वैरिणी तु चतुर्विधा ॥ 45 ॥ एक से अधिक पुरुषों से सम्बन्ध रखने वाली स्त्रियों के सात प्रकार भेद हैं—इनमें तीन प्रकार की स्त्रियों को 'पुनर्भू' और चार प्रकार की स्त्रियों को 'स्वैरिणी' माना जाता है। कन्यैवाक्षतयोनिर्या पाणिग्रहणदूषिता । पुनर्भूः प्रथमा प्रोक्ता पुनः संस्कारमर्हति ॥ 46 ॥ विवाह से पूर्व अक्षतयोनि और केवल विवाहित पति से दूषित होने वाली और उसे छोड़कर फिर से दूसरे पुरुष से विवाह करने वाली प्रथम 'पुनर्भू' कहलाती है। अभिप्राय यह है कि विवाह के उपरान्त पति के किसी दोष, असाध्य रुग्णता, मस्तिष्क-विकृति तथा नपुंसकता आदि के प्रकट हो जाने पर उससे सम्बन्ध- विच्छेद करके दूसरे पुरुष से विवाह करने वाली स्त्री पूर्वपति की भुक्ता होने के कारण पुनर्भू मानी जाती है। कौमारं पतिमुत्सृज्य या त्वन्यं पुरुषं श्रिता। पुनः पत्युर्गृहंमियात् सा द्वितीया प्रकीर्तिता ॥ 47 ॥ अपने कुमार (छोटी आयु) पति की विवाहिता युवती अन्य पुरुष से सम्बन्ध रखती हुई पति के युवा होने पर उसके पास लौट आने वाली स्त्री दूसरे प्रकार की 'पुनर्भू' कहलाती है। कुछ प्रदेशों में छोटी आयु के लड़कों की बड़ी आयु की लड़कियों से विवाह करने और लड़कों के युवा होने तक लड़कियों के ज्येष्ठ आदि की भुक्ता बने रहने की प्रथा है। उसी के सन्दर्भ में उक्त कथन है। असत्सुः देवरेषु स्त्री बान्धवैर्या प्रदीयते । सवर्णाय सपिण्डाय सा तृतीया प्रकीर्तिता ॥ 48 ॥ पति की अकालमृत्यु हो जाने पर और देवर आदि के न होने पर अथवा उसके द्वारा ग्रहण को उद्यत न होने पर किसी सगोत्री अथवा सपिण्डी से विवाहित होने वाली स्त्री तीसरे प्रकार की 'पुनर्भू' कहलाती है। स्त्री प्रसूताप्रसूता वा पत्यावेव तु जीवति। कामाद्या संश्रयेदन्यं प्रथमा स्वैरिणी तु सा ॥ 49 ॥ पति के जीवित होते हुए सन्तानवती अथवा निस्सन्तान स्त्री अपने असमर्थ पति से असन्तुष्ट होने के कारण उसका परित्याग कर, अपनी कामवासना की तृप्ति 206 / नारदस्मृति