भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 209, कुल 304 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 209

के लिए पर-पुरुष से सम्बन्ध स्थापित करने वाली प्रथम प्रकार की 'स्वैरिणी' कहलाती है। मृते भर्त्तरि सम्प्राप्तान्देवरान्दीनपास्य या। उपगच्छेत् परं कामात् सा द्वितीया प्रकीर्तिता ॥ 50 ॥ पति की मृत्यु के उपरान्त योग्य देवरों द्वारा उसके वरण को सहमत, उनकी उपेक्षा करके अपनी रुचि के पुरुष का आश्रय ग्रहण करने वाली द्वितीय प्रकार की 'स्वैरिणी' होती है। प्राप्ता देशाद्धनक्रीता क्षुत्पिपासातुरा च या। तवाह्मित्युपगता सा तृतीया प्रकीर्तिता ॥ 51 ॥ धन से ख़रीदी गयी, दूसरे देश से आयी हुई, अर्थात् आश्रयविहीन तथा भूख-प्यास से आकुल-व्याकुल स्त्री अपने को शरण देने वाले पुरुष के प्रति कृतज्ञ भाव से समर्पित होने वाली-'आपने मुझे सहारा दिया है, अब मैं आपकी दासी हूं, आपके यथेष्ट भोग के लिए उपस्थित हूं,' इस प्रकार के भावों को प्रकट करने वाली-स्त्री तृतीय प्रकार की 'स्वैरिणी' कहलाती है। देशधर्मौ निरपेक्ष्य स्त्री गुरुभिर्या प्रदीयते। उत्प्रभसाहसान्यस्मै अन्त्या सा स्वैरिणी स्मृता ॥ 52 ॥ माता-पिता आदि पूज्य अभिभावकों द्वारा देश-धर्मानुसार उपयुक्त मानकर चुने गये वर की उपेक्षा करके अपने मनोऽकूल जीवनसाथी का आश्रय लेने का दुस्साहस करने वाली स्त्री चतुर्थ प्रकार की 'स्वैरिणी' कहलाती है। टिप्पणी—माता-पिता के मान-सम्मान तथा लड़के की जाति, धर्म, आयु शिक्षा-दीक्षा, कुल-परिवार तथा सामाजिक स्थिति आदि किसी बात की चिन्ता किये बिना, मन के मीत से प्रेमविवाह करने वाली आजकल की लड़कियों को चतुर्थ प्रकार की 'स्वैरिणी' मानना चाहिए। पुनर्भूर्वा विधिस्त्वेष स्वैरिणीनां प्रकीर्तितः। पूर्वा पूर्वा जघन्यासां श्रेयसी तूत्तरोत्तरा ॥ 53 ॥ पुनर्भू और स्वैरिणी स्त्रियों के स्वरूप और भेदों आदि के वर्णन को यहीं विराम दिया जाता है। यहां इतना और समझ लेना चाहिए कि पुनर्भू से पूर्व-पूर्व निन्दनीय है, अर्थात् तृतीया—विवाह के उपरान्त पति की अकालमृत्यु हो जाने पर और देवरों के न होने पर पर-पुरुष से विवाह करने वाली की अपेक्षा युवा पति की ओर न लौटने वाली द्वितीया और उसकी अपेक्षा प्रथमा—जीवित पति का परित्याग करने वाली अधिक निन्दनीय है। तृतीया का तो मात्र इतना ही दोष है कि उसने आत्मसंयम को अव्यावहारिक मानकर पुनर्विवाह को ही व्यावहारिक समझा। द्वितीया पुनर्भू यदि अपने को भोगने वाले के प्रति समर्पित हो जाती है, तो उसका नारदस्मृति / 207