नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 210, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंभी दोष इतना ही माना जायेगा कि उसका विवाहित तो कोई और है, उसके प्रति भी उसका कुछ कर्तव्य बनता है, परन्तु इसके लिए अकेली स्त्री को दोषी न मानकर प्रचलित प्रथा की भी निन्दा करनी होगी। इस प्रकार इस द्वितीया की अपेक्षा जीवित पति से समझौता न कर पाने वाली स्त्री को सर्वथा निकृष्ट मानना होगा। विवाह के उपरान्त पुरुष में आये दोष को तो दैवी विधान समझना चाहिए और विवाह पूर्व के किसी दोष की भली प्रकार जांच परख न करने के लिए स्वयं अपने परिवार वालों को और अन्ततः भाग्य को दोषी मानना चाहिए। हां, छल कपट अथवा धोखा-धड़ी की बात अलग है। इसी प्रकार चार प्रकार की स्वैरिणी स्त्रियों में उत्तरोत्तर को निकृष्ट माना गया है। पुरुष की नपुंसकता अथवा असमर्थता को जीवन-भर के लिए सहन न कर पाने और पर-पुरुष का आश्रय लेने को स्त्री की विवशता मानना चाहिए और इसके लिए विवाह करने वाले पुरुष को दोषी ठहराना चाहिए। देह की क्षुधा की तृप्ति की इच्छा भी तो जीवन धर्म है। संयम-नियम का उपदेश देना सरल है, निभाना टेढ़ी खीर है। गुप्त रूप से पर पुरुष से सम्बन्ध रखने की अपेक्षा, तो दूसरा विवाह कहीं अधिक उचित पग है। हां, इससे पूर्वपति की नाक अवश्य कटती है, उसका पुंसत्व कलंकित होता है, जो होना ही चाहिए। इस प्रथम स्वैरिणी की अपेक्षा द्वितीय स्वैरिणी-देवरों को धता बताकर मनोऽनुकूल पुरुष का वरण करने वाली-उसकी अपेक्षा तृतीया-आश्रयदाता का वरण करने वाली और उसकी भी अपेक्षा चतुर्थी स्वैरिणी-माता पिता, देश काल प्रथा, मर्यादा आदि का अतिक्रमण कर प्रेमविवाह करने वाली अधिक निकृष्ट है। टिप्पणी—हमारे विचार में तो केवल चतुर्थ प्रकार की स्वैरिणी को ही स्वैरिणी कहना उचित है। नपुंसक पति के परित्याग को तो स्वेच्छाचरण नहीं माना जा सकता। द्वितीय स्वैरिणी की भी परिवारजनों के व्यवहार से असन्तुष्ट होकर बाहर जाने की विवशता को समझने पर स्थिति भिन्न हो सकती है। तृतीय स्वैरिणी को तो स्वैरिणी कहना ही सर्वथा अनुचित है। इतिहास में ऐसे असंख्य उदाहरण मिलते हैं-जहां नदी, कूप आदि से निकालने वाले चोर डाकुओं, आततायियों तथा दुराचारियों से सम्मान, प्राण आदि की रक्षा करने वाले, भय, आतंक से मुक्त करने वाले वीर एवं उदार पुरुषों के प्रति कृतज्ञतावश अथवा उनके गुणों पर मुग्ध होकर स्त्रियों ने उनसे विवाह कर लिया। ऐसी स्त्रियों को 'स्वैरिणी' कहना तो मानवता का अपमान ही करना होगा। अपत्यमुत्पादयितुस्तासां या शुल्कतो हृता। अशुल्कोपहतायां तु क्षेत्रिकस्यैव तत्फलम्॥ 54 ॥ उपर्युक्त सात प्रकार की स्त्रियां -तीन प्रकार की पुनर्भू और चार प्रकार की 208 / नारदस्मृति