नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 247, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपना विवेक नहीं खो देना चाहिए, उसे धैर्य और सहनशीलता का परिचय देना चाहिए। हां, दोनों में अधिक दोष प्रथम व्यक्ति का माना जायेगा और वह अधिक दण्ड का भागी है। दूसरे का क्रोध तो क्रिया की प्रतिक्रिया मात्र है—यह प्रथम विधि है। द्वयोरापन्नयोस्तुल्यमनुबध्नाति यः पुनः। स तयोर्दण्डमाप्नोति पूर्वो वा यदि वोत्तरः ॥ 10 ॥ किसी मध्यस्थ द्वारा कलह विवाद करने वाले दो व्यक्तियों को शान्त कर दिये जाने पर अथवा अपने आप शान्त हो जाने पर, फिर से भड़क उठने वाला व्यक्ति बड़ा अपराधी माना जाता है। ऐसा व्यक्ति परवर्ती—क्रिया की प्रतिक्रिया के रूप में उग्रता बरतने वाला—होने पर भी पूर्ववर्ती—विवाद प्रारम्भ करने वाला माना जाना तथा तदनुरूप दण्डित किया जाना चाहिए—यह दूसरी विधि है। यहां शान्त हो जाने वाले विवादी को दण्ड नहीं दिया जाता। श्वपाकमेदचाण्डालव्यङ्गेषु वधवृत्तिषु। हस्तिपव्रात्यदासेषु गुर्वाचार्यातिगेषु च ॥ 11 ॥ मर्यादातिक्रमे सद्यो घात एवानुशासनम्। नय तद्दण्डपारुष्ये स्तेयमाहुर्मनीषिणः ॥ 12 ॥ मनीषियों के अनुसार निम्नोक्त तुच्छ व्यक्तियों—1. चाण्डाल, 2. पाखण्डी— वेद-विरुद्ध आचरण करने वाले, अशोककालीन एक सम्प्रदाय से सम्बद्ध व्यक्ति, 3. बधिर, आदि विकलांग, 4. व्याध—जीव-हत्या से आजीविका चलाने वाले, 5. महावत—हाथियों का पालन करने वाले, 6. व्रात्य—पतित होने से उपनयन संस्कार के अयोग्य घोषित, आचारभ्रष्ट तथा 7. दास आदि द्वारा अपने पूज्य आचार्यों, स्वामियों, प्रतिष्ठित महानुभावों तथा वृद्ध जनों का अपमान करने पर इनकी बेतों से पिटाई करनी चाहिए। हां, इनके द्वारा अपने आदरणीय सम्बन्धी—चाचा, मामा आदि आचार्य तथा शिष्य की पत्नी—का गमन करने पर इनका तत्काल वध कर देना चाहिए, अन्य किसी दण्ड के विषय में तो सोचना ही नहीं चाहिए। यह तीसरी विधि है। यमेव ह्यतिवर्त्तेत नीचः सन्तं जनं नृषु। स एव विनयं कुर्यान्न तद्विनयभाग् नृपः ॥ 13 ॥ समाज के निम्न वर्ग के किसी व्यक्ति द्वारा उच्च वर्ग के किसी व्यक्ति का अपमान किये जाने पर नीच व्यक्ति को दण्ड देने का अधिकार अपमानित होने वाले उच्च वर्ग के व्यक्ति का होना चाहिए, राजा द्वारा इसमें किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए—यह चतुर्थ विधि है। टिप्पणी—दण्ड की किसी रूपरेखा को निश्चित न करके, उसके स्थान पर नारदस्मृति / 245