नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 246, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंदण्ड पारुष्य के भी तीन प्रकार भेद हैं—मृदु, मध्यम तथा उत्तम। हाथों (मुक्कों) तथा पैरों से पीटना मृदु दण्ड-पारुष्य है, लाठियों, रस्सियों तथा पत्थरों से पीटना मध्यम तथा चाकू, छुरी और तलवार आदि से क्षत विक्षत करना उत्तम दण्ड-पारुष्य कहलाता है। हीनमध्योत्तमानां तु द्रव्याणामपकर्षणात्। त्रीण्येव साहसान्याहुस्तत्र कण्टकशोधनम्॥६॥ जिस प्रकार हीन, मध्यम और उत्तम पदार्थों की छीना-झपटी के आधार पर साहस तीन प्रकार का है, उसी प्रकार अपराध के दण्ड के रूप में 'कण्टकशोधन' कहलाने वाले दण्ड-पारुष्य के भी उपर्युक्त तीन—मृदु, मध्यम तथा उत्तम—भेद हैं। विधिः पञ्चविधस्तूक्त एतयोरुभयोरपि। विशुद्धिर्दण्डभाक्त्वं य तत्र संवध्यते यथा॥७॥ इन दोनों—साहस और दण्ड-पारुष्य—की समान रूप से पांच विधियां हैं, जिनका परिचय आगे दिया जा रहा है। यहां इतना समझ लेना चाहिए कि दोनों— अपराध और दण्ड—का अभिन्न सम्बन्ध है, अर्थात् अपराध किये जाने पर ही दण्ड-प्रवर्तन होता है, अन्यथा नहीं। निरपराध को दण्डित करना, तो अपराध को जन्म देने-जैसा पाप है। इसके अतिरिक्त एक अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि दण्ड का उद्देश्य क्रूरता बरतना कदापि नहीं, अपितु इसका उद्देश्य सुधारना है। यही कारण है कि एक ही अपराध करने वाले विभिन्न स्थितियों के व्यक्तियों को दण्ड देने में अन्तर किया जाता है। पारुष्यदोषावृतयोर्युगपत्सम्पवृत्तयोः । विशेषश्चेन्न दृश्येतं विनयः स्यात् समस्तयोः॥४॥ निर्दोष अथवा निरपराध को क्रोधावेश में आकर भद्दी गालियां देना अथवा उसकी पिटाई करना, दोनों ही समान रूप से दण्डनीय अपराध हैं। इन दोनों में किसी प्रकार का कोई अन्तर नहीं करना चाहिए। निर्दोष को मानसिक रूप से (गाली-गलौच द्वारा) तथा शारीरिक रूप से (पिटाई द्वारा) पीड़ित करने वाले को एक समान दण्ड देना चाहिए। पूर्वमाक्षारयेद् यस्तु नियतं स्यात् स दोषभाक्। पश्चाद् यः सोऽप्यसत्कारी पूर्वे तु विनयो गुरुः॥९॥ तर्जनी आदि से किसी को फटकारने, डांटने डपटने और डराने में पहल करने वाला तो अपराधी माना ही जाता है, उसकी फटकार को सहन न करके दुगुने वेग से उस पर प्रत्याक्रमण करने वाले को भी सज्जन नहीं माना जा सकता। अभिप्राय यह है कि यदि एक व्यक्ति क्रोधवश उन्मादग्रस्त हो गया है, तो दूसरे को 244 / नारदस्मृति